Tuesday, June 10, 2008

छोटे शहर में.. कुछ नोट्स..

बड़े शहरों के नियमित जीवन से बाहर छोटे शहरों में लौटना सुखी और दु:खी होना है.. ज़्यादा सोचने लगिये, तो दोनों मर्मांतक स्‍तर पर होना है. सुखी इसलिए कि स्‍वाद, शब्‍द, संवाद, संबंधों की एक दुनिया चट् पहुंच में उतर आती है, महानगरीय जीवन में जो अदृश्‍य व असंभव बना रहता है. दु:ख इसका कि चौतरफा रखरखाव व इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर के गड्ढे दीखते हैं (ऐसा नहीं कि महानगर में नहीं दिखते, या नहीं हैं).. लेकिन छोटे शहर में, यहां-वहां घूमते हुए महसूस होता है जैसे प्रशासकीय प्रबंधन के ढेरों ऐसे पहलू हैं, जिनका कोई देखवैया नहीं है, जहां, बड़े शहरों के बरक्‍स बहुत-बहुत ज़्यादा मात्रा में, लगता है मानो सर्वसामान्‍य बेहाली-बदहाली के भांवरों में भटकने को छोड़ दिये गए हों, और उनके जीवन में किसी बेहतरी के आने-लाने की बात, बदलता समय व उसका नियंता प्रशासन भूल गए हों!

एक चिरकुट पुराने कलाकार परिचित हैं (मित्र नहीं कहूंगा, क्‍योंकि उम्र में मुझसे बड़े हैं, चिरकुटई में तो हैं ही!).. सफ़ेद काग़ज़ पर इंडियन इंक से चिचरियां खींचकर मुग्‍ध-मदन बने रहते हैं. माया के केंद्र में विचरते हुए विस्‍तारण का कभी मोह सालता है तो प्रगतिशील लोरियों पर भी फिसल आते हैं.. मुक्तिबोध और शागाल की छेड़ने, व पीछे-पीछे अपनी छेरने लगते हैं.. इधर दो दिनों पहले फिर उनकी फिसलन से साक्षात हुआ तो मन में यह एक शेरनुमा चीज़ निकल आयी, आप भी नोश फ़रमायें:
प्रगतिशीलता उद्यम है, लगे रहें,
क्‍योंकि अवसरवादिता में दम है.
पता नहीं क्‍या है कि यह विशिष्‍टता भी, इस शक्‍ल में, छोटे शहरों में ही दिखती है. बच्‍चे को चुपवाते हुए, सड़क पर, ठेले पर तरकारी की खरीदारी करते हुए यह विशिष्‍ट साढ़े तीन से सवा चार फुटवाली एक नस्‍ल मिलती है, जिसकी ऊंचाई मेरे लिए गहरा नस्‍ली रहस्‍य है. अलग-अलग मौकों पर अलग-अलग लोगों की बातें सुनते हुए मैंने कुछ थियरीज़ बनाये हैं, मगर इस चार फुटिया मीनार के माथे और आंखों में जब कभी कोई हंसी देखता हूं, मेरी सारी थियरीज़ फेल हो जाती हैं!

चलते-चलते की ठेलमठेली में यह एक बिम्‍ब:

भीड़ के अनवरत के गजर-मजर में शहर खाली, इतना सूनसान क्‍यों लगता है? फर्लांग, मीटर कितने तो किलोमीटर गुज़र जाते हैं, एक अदद सुकूनदेह चेहरा नज़र नहीं आता. कहां गयी हैं अच्‍छी, नेक़, भलमनई, संवेदनशील लड़कियां? किस देवता की श्रद्धा में किस मंदिर लुकायी पड़ी हैं, किस रिक्‍शे किस सड़क हैं गुज़र रहीं? कौन सीढ़ी उतर रहीं किस छत पर खड़ी, नया ज्ञानोदय के ज्ञानदान से आगे, किस उलझाव से मुंहजोरी कर रही हैं, मुंह में बड़े-बड़े गोलगप्‍पे भर रही हैं? पता नहीं कभी कितना भर तो सोचती हैं, और जब सोचती हैं तो क्‍या सोचती हैं छोटे शहर की अच्‍छी, नेक़, भलमनई, संवेदनशील लड़कियां?

एक यह भी:
परमोद जी छूट आये बरेली से
तेल जैसे भर भहर आया तेली से!

9 comments:

  1. बहुत कम लोग हैं जो छोटे शहर से नोट निकाल लेते हैं....हमनें तो सुना है कि सारे नोट बड़े शहरों में ही पाये जाते हैं....


    परमोद जी छूट आये बरली से
    तेल जैसे भर भहर आया तेली से!

    ई बढ़िया रहा...

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  2. चारकोल चश्म बद्दूर ! आगे चार फुट्टी मीनार और एकाध नाव की सवारी भी रहे..
    ठेला ठेली शेर की ठेलमठाल पर ठीठीं कर सकते हैं ,बाकी शहर के बिम्ब पर इरशाद इरशाद !

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  3. 'चौतरफा रखरखाव व इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर के गड्ढे दीखते हैं (ऐसा नहीं कि महानगर में नहीं दिखते, या नहीं हैं).. लेकिन छोटे शहर में, यहां-वहां घूमते हुए महसूस होता है जैसे प्रशासकीय प्रबंधन के ढेरों ऐसे पहलू हैं, जिनका कोई देखवैया नहीं है, जहां, बड़े शहरों के बरक्‍स बहुत-बहुत ज़्यादा मात्रा में, लगता है मानो सर्वसामान्‍य बेहाली-बदहाली के भांवरों में भटकने को छोड़ दिये गए हों, और उनके जीवन में किसी बेहतरी के आने-लाने की बात, बदलता समय व उसका नियंता प्रशासन भूल गए हों!'

    मौजूदा समय में हमारे देश में शहरीकरण का यही सच है। इससे भी अधिक चिंता की बात है कि हमारे गांवों का स्‍वरूप भी अब इन छोटे शहरों जैसा ही होता जा रहा है- हर जगह चौतरफा रखरखाव व इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर के गड्ढे और उनका कोई देखवैया नहीं।

    बहुत बहुत धन्‍यवाद।

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  4. प्रणाम गुरूजी.
    दस दिनों बाद आज दर्शन दिए हैं.
    कंहा रहलू?
    अच्छी तरह से लिखी हुई पोस्ट से ये ज्ञात होता है किसी छोटे शहर मे मस्त छुट्टियाँ काट रहे थे.

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  5. शायद आप भी छुट्टी मनाने गए थे... बड़े शहर में वापिस आने पर स्वागत है...कहते हैं ढूँढने पर खुदा भी मिल जाता है...हमे भी तलाश है....गर न मिले तो.....

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  6. बहुते सही बिम्ब खींचे हैं. आप वापस आ गये, यह बड़ा सुखद है. अब जारी रहें, शुभकामनायें.

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  7. बड़े शहरों में कहां ...

    भीड़ के अनवरत के गजर-मजर में शहर खाली, इतना सूनसान क्‍यों लगता है? फर्लांग, मीटर कितने तो किलोमीटर गुज़र जाते हैं, एक अदद सुकूनदेह चेहरा नज़र नहीं आता. कहां गयी हैं अच्‍छी, नेक़, भलमनई, संवेदनशील लड़कियां?

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  8. प्रत्यक्षा की तरह हम भी कहूंगा कि चारकोल ज़िंदाबाद। बढ़िया रेखांकन हैं । एक नया शब्द सीखा-
    मुग्ध-मदन। हम खुशी से बौरा गए हैं इसे जानकर।
    हम आप पर मुग्ध हैं ....कौनो ग़लतफ़हमी तो नहीं पाल लेंगे न इसे पढ़कर ? छुट्टियों में और क्या गुल खिलाए हैं ? सुना बनारस गए थे ? इधर कब आना हो रहा है ? इन सभी सवालों का जवाब दिए बिना भी आप जी सकते हैं। आप ही राजा, आप ही बेताल....

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  9. मुग्ध मदन ने मुझे भी मस्त मोहन कर दिया है। बहुत ख़ूब। बेताल जीवन की यह पड़ताल पसंद आ रही है। फिरते रहिए और चरते रहिए। लौट के लिखते रहिए। मुग्ध मदन, प्रहसन और लहसन। ऐसा आयुर्वेदिक मसाला लगता है जैसे पढ़ कर बदन दर्द दूर हो जाए।

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