Saturday, June 14, 2008

बना रहे.. जो भी है?..

ऐसी कोई विशेष आकुलता नहीं है, लेकिन लगता है बनारस में कुछ महीने गुज़ार लूं तो शायद मैं भी मुंह चुभलाता पान खाने लगूं (सब खाते हैं. रिक्‍शे पर बैठी सवारी मुंह की जुगाली करती रहती है, तो रिक्‍शेवाले सिपाही की उंगलियों पर भी कत्‍थे और चूने की रौनक रहती है).. हिंदी जगत की दूसरी अन्‍य ऐंड़े-बेंड़ेपन व मूर्खताओं की तरह बंदरों को जीवन में स्‍वीकार करके आपस में मुंह बिराने के खेल में धन्‍य हो लूं! चार कदम यह खेल और आगे निकले तो शायद अस्‍सी घाट की सीढ़ि‍यों पर, भांग की गोली के सुरीले रौ में, किसी मित्रवर को यह समझाने भी लगूं कि बंधुवर, बहुत छिनक रहे हो? छिनको मत, सब अविरल अजस्‍त्र धारा है, जब तक हो, मस्‍त रहो, बमभोले का सुमिरन करते, ठुमरी-दादरा ठेलते हुए यह समां और समय गुज़र जाने दो!..

बनारस की पतली गलियों के कचर-मचर की गहीनलोक में जीवन का कोई भी नाटकीय रुपांतरण असंभव नहीं लगता. हो सकता है इसी बहाने मुझे भी दो बंद गाने की समझ आ जाये? दुनिया सुलटाने की? फिर बीच सड़क यह सोचते सांस न अटके कि साइकिल रिक्‍शे पर से गुज़रकर जा रही है, या टेम्‍पोवाला सबको बेमतलब बनाता- जहां एकदम जगह नहीं है वहां भी जगह निकाले- जाने किस लयकारी में, आगे तीर की तरह निकला न केवल चला जा रहा है, बल्कि बकिया में से किसी की जान भी नहीं जा रही है! ओहोहो, अहाहा, कैसे तो कैसी जिजीविषा एकदम मूर्तिमान बनी रहती है..

वैसे कभी-कभी इसीमें ज़रा टिनहा-सा व्‍यतिक्रम भी आ जाता है.. कि रिक्‍शे और टेम्‍पो अचाही मोहब्‍बत में ठिल गये, कुछ तू-तड़ाक का व्‍यापार बुनने लगा.. कोई लघुकाया, संसार को माया मान रही महिला चपेटे में फंस गयी, मुंह से जाने किसको तो संबोधित करके तीन गाली निकालीं, फिर निकलते-निकलते सड़क के दूसरी छोर के मंदिर की दिशा में सिर-नमन का एक श्रद्धा सुमन भी ठेल दीं!

पता नहीं क्‍या है कि भाई लोग भांग की गोलियां खाते हैं, क्‍योंकि मैं तो बिना खाये नशे में था.. हो सकता है अभी भी हूं?

7 comments:

  1. अरे ये क्या यानी आप बनारस मे पतनशीलता की परिभाषाये खोज रहे थे, और हम समझे की आपको चीन वालो ने चीन की जेल मे बंद भारतीयो को (सजा देने के लिये)पतनशील साहित्य सुनाने के लिये पकड लिया है :) यानी अभी भी ये सजा (पतनशील साहित्य पढने की) हमे ही मिलती रहेगी :)

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  2. बना रहे रस..केवल चूना न मिले, इसे देखने की जरूरत है.

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  3. वाह साहब, कमाल है. क्या बात है. वैसे, डान, पान नहीं खाता ? ई बड़ा बुरा करता है.

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  4. गुरूजी प्रणाम.
    एक बार भंग खा ही लीजये.
    भंग खाए का जो नशा है वो बैगैर खाए के नशे से बहुत जियादा उम्दा है.
    और फ़िर मस्ती मे लिखिए पढने वाले भी मस्त होयेंगे.
    (ये सब अनुभव के आधार पर कहा है. मेरी ज्यादातर पोस्ट भंग खा के ही निकले है तभी तो.........)

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  5. ye sab tho sab jante hai,,,,,shayad aap hi thela gaye isme...isliye ram nahi paye.

    pan chublaiye aur bas na samjhne wali bat karte rahiye.

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  6. अब तो बूझा गया होगा कि आस पास का माहौल कितना असर डालता है. बिना खाये ही आ गये न नशे में. हर जगह साईकिल डुलाते अपनी मस्ती में निकलने का जुगाड़ नहीं होता-ससुर, माहौल चैंट ही जाता है. भारत है बाबू, चीन तो है नहीं.

    मस्त रहिये, झूमते रहिये और पान भी अब चुभला ही लिजिये. :)

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  7. कहा भी है-जो मजा बनारस में , वो पेरिस में न फ़ारस में।

    हमारे गुरू जी के बार पान न खाने की बात पर झल्ला गये थे। बोले-अरे इहां पान खाया कहां जाता है। यहां तो पान फ़ेरा जाता है।

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