Monday, June 16, 2008

चोरों और लुटेरों की

भारतीय लोकतंत्र किसके बूते सांस लेता, एक कदम दायें, और तीन कदम पीछे चलता है? जवाब है, गुंडों और लुटेरों के. पढ़ लीजिये. ध्‍यान से पढ़ि‍येगा. उत्‍तर-दक्षिण कहीं भी इस फलते-फूलते लोकतंत्र के किसी राज्‍य के ज़रा दबे-छिपे हिस्‍से की किताब के पन्‍ने पलटना शुरू कीजिये, पाइयेगा हर जगह कोई न कोई होनहार व काबिल गुंडा और लूटेरा समूह लोकतंत्र को मजबूत करने में सरकार के हाथ बंटा रहा है! सरकार बेचारी से ऐसा हो ही नहीं पाता कि बिना ऐसे काबिल समूहों के काबिल मदद के अपने को खड़ी कर ले. और खड़ी कर भी ले तो खड़ी रह सके!

इसके आगे बड़ी सीधी सी बात है कि सरकार अगर गुंडों व लुटेरों के समर्थन से अस्तित्‍व में आती है (और बनी रहती है) तो वह काम भी गुंडों व लुटेरों के हित में करेगी, न कि उस सर्वसामान्‍य चिरकुट जनता के जिससे उसे एक घेले का फ़ायदा नहीं होने जा रहा? इसीलिए बहुत सारे राज्‍यों में यह कहानी भी आमतौर पर देखियेगा कि कोई पगलेट आदमी, या समूह, जनहित में कोई इनिशियेटिव लेता है- मान लीजिए ऐसा कोई भी इनिशियेटिव जो सरकार के साथी-सहोदरों के हित में बिल खोदने लगे- तो सरकार की पहली प्रतिक्रिया क्‍या होती है? सरकार गुंडों के बचाव में आगे खड़ी हल्‍ला मचाना शुरू करती है कि देखिये, पगलेट तत्‍व जनता को उकसाने का काम कर रहे हैं! मामला थोड़ा और गंभीर होने लगे तो ऐसे तत्‍वों को ‘राष्‍ट्रविरोधी’ व्‍यापार में लिप्‍त देखा जाने लगता है. ज़्यादा तक़लीफ़ देने लगें तो ऐसे ‘उकसावेबाज’ आसानी से जेल में ठेल भी दिये जाते है (एक नहीं इस देश में बहुत सारे बिनायक सेन जेलों में बंद मिलेंगे), उसकी प्रतिक्रिया में इधर-उधर कुछ हल्‍ला होता है तो सरकार उसे कोई ख़ास भाव भी नहीं देती. जबकि यह आपको रेयरली दिखेगा कि असल गुंडे व लुटेरे (व हत्‍यारे) कभी जेल में ठेले जायें. ठेले जाते भी हैं तो वह मोस्‍टली किसी पॉवर बैलेंस की कार्यवाही का नतीजा होती है, या प्रशासनिक ‘अकुशलता’ का; और ऐसी गलती हो गयी भी होती है तो थोड़ा आगे जाकर उसे तत्‍परता से बहुत जल्‍दी दुरुस्‍त भी कर लिया जाता है!

2 comments:

  1. बिल्कुल सही फरमा रहे हैं. चिन्ता का विषय है मगर सब कुछ चलता जा रहा है.

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  2. अईसेही चल रहा है देश। चलता रहेगा क्या?

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