Tuesday, June 17, 2008

तीन अविस्‍मरणीय महान विदेशी कवितायें..


||एक||
सल्‍वादोर डाली का भेदभरा चित्र था या
मालिक-मकान का बढ़ा हुआ पित्‍त था
सूखी बारिश में हरहरा मचल रहा था
या शायद वजह थी कहीं हंगरी के किसी
छोटे शहर मेरी कविताओं की चर्चा हुई थी
सोफ़े पर मैं गदबद फिसल रहा था
माथे पर मोमबत्‍ती की लौ की मुकुट
चढ़ाये, ओहो, कैसा तो चमक रहा था
रसोई में पक रहा था, छत पर कूक रहा था.

||दो ||
इस गली में दुबारा फिर कभी
वापस मत आना, प्रिये, कितनी बार
याद दिलाऊंगा गली में तीन चिरकुट
हैं, चार सियार, आठवां स्‍वयं मैं हूं
और पंद्रह वर्ष पहले से
जानती हो विश्‍वसनीय नहीं हूं
वैसे ही जैसे इस देश के चुनाव
देहात की शिक्षा, महानगरों में संस्‍कृति
और हमारी हाथ की लक़ीरों में
प्‍यार विश्‍वसनीय नहीं है.

||तीन||
खेत में गोभी का फूल
खिला है, बैल के माथे गूमड़
सिपाही के चूतड़ पर फुंसी
फली है, मेरी छाती में,
प्रिये, कविता कलकल!
पिछली सदी के पूर्वार्द्ध के यूगोस्‍लावी (या रोमैनियन?) महाकवि अंद्रेई दानिशोविच की दुर्भाग्‍यवश अप्राप्‍य रही आयी रचनाओं से कुछ चुनिंदा अंश. हालांकि एक साहित्यिक सट्टेबाज मित्र इन पंक्तियों का मूल स्‍पैन के किसी देहात में चिन्हित करने की ज़ि‍द कर रहे हैं. मगर मैं उनकी इस ज़ि‍द को बहुत सीरियसली ले नहीं रहा हूं, क्‍योंकि इस ऊलजुलूल बिना पर तो इन पंक्तियों की ऑरिजिन तो रक्‍सौल और राऊरकेला तक में ठेली जा सकती है?

13 comments:

  1. ओहो ऐसी भूली हुई कविताओं को मोमबत्ती का प्रकाश दिखाया ..कविवर की और पढ़ने वालों की आत्मा कूकने लगेगी । देसी नही विदेशी कवितायें ही सिर्फ लिखा कीजिये अब ...
    दाली , दानिशोविच , प्रमोदोविच ..नाम में क्या रखा है ?

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  2. घंटा, अपनी कविता को बदेसी कह कर कसीदे क्‍यों कढ़वाना चाहते हो भाई।

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  3. @ब्‍ला, भाई-कसाई?
    आप बला के ब्‍ला-ब्‍ला हो, भाई, हो? घंटा तो हो ही? चिंता न करें, आपको पहचान रहा हूं, फुरसत निकलेगी तो आपकी शान में भी कसीदे पढ़ता हूं. तबतक ब्‍ला-बला परवान चढ़ाये रखें, बिलाइयेगा मत.. और कसीदा सस्‍वर ही पढ़ूंगा.

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  4. kavita ke baarey me vichar vyatk karney me svaym ko ashaay mehsuus kar rahi huun...kintu pratyakshaa ke comment pe to vaari jaaun...

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  5. वाह दूसरी कविता खास तौर से पसंद आयी पर चिरकुट शब्द वहां भी इस्तेमाल हुआ है ? चित्र भी सुंदर है....

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  6. प्रमोद जी जो अलस्का मे दार्जियोशिन्कोव की कविता सुनाई थी यहा वो खास कविता कैसे भूल गये ,
    यू कही पतझड मे गिरा कोई पत्ता

    फ़िर से याद दिलाता है मुझे

    पेडो की पतनशीलता की

    जैसे अदरक की गांठ

    निकल आई हो

    जमी से फ़िर बाहर

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  7. @ओहो, अरुण, अहा, कैसे तो दार्जियोशिन्‍कोव की याद आ गयी? मगर अलास्‍का से ही थे, कि अज़रबैजान से? खासतौर पर फिर में नुक़्ता वाला प्रयोग तो सोने में सुहागा ही था, नहीं? जैसे सिंघाड़े में छोहाड़ा!

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  8. हमने भी छाप डाली झेलिये जी http://pangebaj.com/?p=64

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  9. बड़े दिनों बाद कमेंटियाए हैं हम यहां पर...
    झकझोर जबरजोर कबित्‍त...
    जरा फिर लडियाए हैं...
    प्रतयक्षा जी सही बोली हैं...
    प्रमोदोविच सिंहोवस्‍की अजदकायेवा...

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  10. @नंदिनीजी,
    बड़े दिनों बाद कमेंट की हैं यह सब तकल्‍लुफ़ रहने दीजिये, हम भी तो आजकल बड़े दिनों बाद ही कुछ कला-कलमकारी भी तो कर रहे हैं.. यह बताइये, आइसक्रीम खाने साथ कहां चलियेगा? ज़ारवेत्‍स्‍की स्‍त्रवायेना चौक, या जालंधर के माल रोड पर? इसी बहाने आपका चेहरा दिख जायेगा, और हमारी ओर से चंद जाने कैसी तो महान-महत्‍तम कवितायें ठिल जायेंगी?

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  11. हमसे भी तो पूछो आईसक्रीम खाने के लिए :) श्रीमान प्रमोदोविच सिंहोवस्‍की अजदकायेवा फ्राम पोलेंड.

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  12. नही तो जारवेत्‍स्‍की स्‍त्रावायेना चौक.... ना ही जालंधर के माल रोड...
    कभी इंदौर आइएगा... तो राजबाडा की कचौडी खाएंगे साथ साथ....
    या हमही कभी बंबई आयेंगे... तो बतायेंगे...

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  13. किसी से कौनौ पाप हो गया का?

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