Thursday, June 19, 2008

आंट वी स्‍पेशल? येस, वी आर?

कैसी भी तुलना का ख़्याल प्रहसन है.. सिर से पैर तक सब प्रहसन ही है, नहीं है?

पता नहीं शेर, लोमड़ी या सियार ऐसी चिंताओं में हलकान होते होंगे या नहीं कि आज फिर बारिश- वह कौन सी तो मोहब्‍बत थी की तरह- दिल भींजाने की जगह, दिल जलाकर निकल गयी? या चमरख बसाइन तकिये के नीचे दबाकर रखी डिब्‍बेवाली सुरती सिधर गयी तो उसके बाद वाली कहां से पायेंगे? इस बरसात में अरवी के पत्‍ते की पकौड़ी और लौकी का बजका खायेंगे, या फटही छाता झुलाते हुए यूं ही दिन में तीन मर्तबा बाज़ार जाकर किसी चूते हुए खपड़ैल के नीचे स्‍वयं को फलतुव्‍वै मलिनावस्‍‍था में पायेंगे? या कड़ाही से होता हुआ बजका हाथ और पेट में पहुंचकर आत्‍मा तर कर ही गया, और उसके अनंतर चाय की सुड़कारों से एक वरीय उच्‍चस्‍तरीयता को प्राप्‍त हो रहा हो, तब शेर, लोमड़ी या सियार- या केंचुआ, झींगुर, फतिंगा कोई भी- बीड़ी सुलगाकर नेपाली क्रांति की दशा-दिशा पर विचारमग्‍न होते होंगे, या परदा तानकर, महकव्‍वा चादर पर पसरे फूलकुमारी से गोड़, और दिल दबवाने को मुखातिब होते होंगे?

ओह, जब सुबहिया संवार झर-झर झरने, हररने को हो, उसकी जगह सूक्‍खल निर्झर के मूसल बरस रहे हों, तब क्‍या मन ऐसे ही व्‍यर्थ वितान बुनता है? जानवरों से मनुष्‍य के साम्‍य की कल्‍पना क्‍या किसी भी रूप में क्षम्‍य होगी? हो सकती है? अपने यूपी के होनहार हाईस्‍कूलिया बच्‍चों की तरह जानवरों के बीच ऐसा कभी हुआ है कि सरकार ने इम्‍तहान में नक़ल पर पाबंदी लगा दी तो तड़-तड़ बीस लाख लड़के मैदान मार ले गए! माने इम्‍तहान में पास होने से रह गए? और शर्म से कोई पंडिजी गड़ही में बूड़े भी नहीं? सामाजिक प्रतिक्रिया व शैक्षिक संस्‍कारी संवेदना का ऐसा उच्‍चस्‍तरीय तीक्ष्‍ण-तत्‍काली प्रदर्शन जानवरों में विरले लक्षित होगा. पता नहीं केरल व कलिंगवालों में कितना है, यूपी वालों में भदर-भदर के है. ऐसी तीक्ष्‍ण लक्ष्‍यकारी संवेदना..

और यह सिर्फ़ हाईस्‍कूल के तीक्ष्‍णमना बुद्धिवैभव कीर्तिमानी नौजवानों की ही बात नहीं है, मिडिल फेल उन गृहलक्ष्मियों की भी गौरवगाथा है जो सास के कमरे और आंगन में कपड़ा डालने के दरमियान इतनी मर्तबा आना-जाना करती हैं कि उतनी दूरी में अहमदशाह अब्‍दाली अफग़ानिस्‍तान से दिल्‍ली ही नहीं, धनबाद के कोयला खदान तक लूट आता, लेकिन इन गृहलक्ष्मियों से एक बार सवाल पूछ लें कि ओ धन्‍ये, जीवन में कितनी दफ़े धान के खेत से बाहर के संसार गयी हो? तो बेचारी (ज़्यादा सुकुमारी) चेहरा को ज़रा एक ओर मोड़े दांत से हल्‍के-हल्‍के होंठ काटती रहेगी, और लगेगा कि अब जवाब दे रही है तब दे रही है, लेकिन देगी नहीं, होंठ तो काटती ही रहेगी, बहुत हद तक आपका दिमाग भी काट आयेंगी!

किसी भी तरह के तुलनात्‍मक अध्‍ययन का ख़्याल दरअसल घृणास्‍पद है. जानवर- वह चाहे शेर हो या सियार या ससुर, कीड़े-फतिंगे- निहायत अस्तित्‍ववादी जीव हैं. गोड़ खुजाने, दुम हिलाने, या यहां-वहां कुछ बहा आने से ज़्यादा उन्‍हें दूसरे विषयों की चिंता नहीं सालती, जबकि मनुष्‍य, ख़ासतौर पर यूपी वाला, दिन में इतनी मर्तबा अमिताभ बच्‍चन और वह कैसे तो गजब हैं, और कितने तो अद्भुत हैं जैसी विहंगम चिंताओं से अपना दिमाग मांजता रहता है. और जब उसमें मंज जाता है तो उसके बाद इधर-उधर और पता नहीं कहां-कहां निरखने-अध्‍ययन करने के अनंतर भारतीय क्रिकेट की दशा-दिशा पर चिंतन करने लगता है!

2 comments:

  1. इधर आइये आप्को बचका खिलाते हैं. ;)

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  2. विष्णुभैया के पंचतंत्रपुराण के तमाम चौपाए ऐसी ही चिंताओं में फिक्रमंद नज़र आते हैं। महाभारत में भी जब तब वेदव्यास भाईसाब ने पक्षियों की वे सब चिंताएं उजागर की हैं जैसी मनई कभी नहीं करते। आज की तरह शाख पर अक्सर उल्लू ही नहीं, शुक सारिका भी बैठते थे और वे मनुश्यों की चिंताएं करते थे। आते-जाते राहगीरों के बारे मे उन्हें पता होता था कि कौन दिशा में कब उन्हें लुट जाना है। समझदार मिनख उनकी बानी जानकर अपना इरादा बदल भी देते थे।
    खुशवंतसिंह का कुत्ता जब तक ज़िंदा रहा , उन्ही की फिक्र में घुलता रहा कि उनके बाद उसका क्या होगा। उसे शायद कुत्तों और मनुश्यों की उम्र का फर्क नहीं पता था। जब उसकी घड़ी आई तो चल बसा। सरदार साहब सौ साल जियें।
    हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भी अपने निबंध एक कुत्ता और एक मैना में गुरुदेव के शांतिनिकेतनवासी कुत्ते की भावप्रवणता पर लिखा है साथ ही एक मैना दंपती का संवाद सुना । दोनों का चिंतन यही कहता था कि मनुश्य बेवकूफ है।
    दूर क्यों जाएं, कबाड़खाना वाले अशोक पांडे साहब का कुत्ता तो घोर चिंतन करता है। अशोकजी तो उसे ऋषितुल्य मानते हैं। दोनों में अक्सर संवाद भी होता है और अशोक जी उसकी राय पर अमल भी करते हैं।
    तो ये है साब...

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