Friday, June 20, 2008

फिर लड़की से बातचीत.. माने एकालाप

चाहता तो लड़की की आंखों में गहरे झांक कर, उसकी आत्‍मा लूट कर, निर्मोही परदेसी की तरह किसी नये गंतव्‍य की ओर निकल लेता; मगर जाने मन में कैसे तो मानवीय उद्रेक थे कि एडवेंचरस नादिर शाह की तरह निर्मम आचरण करने की जगह, मैं अंधे सूरदास की तरह कोमलाकांक्षी बना रहा, लड़की की बजाय, कमरे की सूनी दीवारों पर न टंगे चित्रों को निरखता, उनके घटियापे पर उदास होता रहा. इसीलिए, स्‍वाभाविक था लड़की ने जब पूछा कैसा महसूस कर रहा हूं, तो मैं एकदम से उखड़ गया. अरे, क्‍या मतलब है कैसा महसूस कर रहा हूं? जहां-जहां पहुंच रहा हूं, बारिश बंद हो जा रही है, ऐसे में आदमी क्‍या खाक़ होलुलु महसूस करेगा? और मेज़ के उधर बैठी मुंह के आगे पेंसिल घुमाती तुम खामख़ा खुद को बहुत भाव मत दो कि तुम्‍हारी तीन फीक़ी मुस्‍की से मैं ये और वो महसूसने लगूंगा! हद है?.. इसी तरह का लड़की की बाबत कुछ अंट-शंट सोचता मैं कमरे से निकलने को छटपटाने लगा- वैसे ही जैसे ईराक से ढेरों फौजी निकलने को अकुलाते रहे होंगे- मगर तभी लड़की की हाथ की कुछ पुर्चियों को देखकर याद आया कि लड़की डॉक्‍टर है, और फ़ि‍लहाल वह लजाते हुए मुझे भले देख रही हो, उसका लजाकर देखना एक दिल-लुटवैये से ज़्यादा एक मरीज़ की तरफ देखना भी हो सकता है?..

मन में इस बोझिल ख़्याल के उठते ही, अधउठा मैं, वापस कुर्सी में धंस गया.. एक बेचारी नज़र से लड़की को देख, पता नहीं क्‍यों तो भावुक होने लगा. महसूस करने का जो एक रफ़, स्‍केची स्‍टेटमेंट मैंने लड़की के आगे पेश किया होगा, उसका मोटा-मोटी खाक़ा कुछ इस तरह का है:

क्‍या बताऊं, क्‍या महसूस करता हूं, डाक्‍टर? बताना संभव है? आप झेल पाओगी? पटना में छह सौ रुपये का कमरा लेकर बिन-बिजली अंधेरी अकेली बरसाती रातें गुज़ारी हैं तुमने? या बिहार शरीफ में बासी आलू की तरकारी खाकर कभी बीमार पड़ी हो कि तुम्‍हें बतलाऊं मैं क्‍या महसूस करता हूं? भगवतीचरण वर्मा के ‘भूले-बिसरे चित्र’ में दबाकर रखे तीन सौ रुपये थे, और घर में वही उतने ही पैसे थे जो मोहनदास इस वादे के साथ ले गए थे कि अगली सुबह पहले काम की तरह वापस कर देंगे, और आज अट्ठारह साल हो रहे हैं फिर मोहनदास का चेहरा नहीं दिखा और आप पूछती हैं मैं क्‍या महसूस करता हूं?

दांत के डाक्‍टर की कुर्सी में फंसा व्‍यक्ति डाक्‍टर को अपने चमकते, तेज़ औज़ारों के साथ छेड़छाड़ करता देख मरीज़ क्‍या महसूस करता है इससे क्‍या फर्क़ पड़ता है? शोमा चौधुरी कैसे-कैसे तो तीखे मर्मस्‍पर्शी सवाल किये जा रही थी जिसका वित्‍तमंत्री निहायत अमानुषिक, फूहड़ जवाब दिये जा रहे थे, उससे किसी को फर्क़ पड़ा था? नब्‍बे के दशक से लगभग समूची दुनिया की बौद्धिकता जब पूरी तरह अमरीका व वॉशिंगटन कंशेंसस के आगे न केवल घुटने टेक चुकी हो, बल्कि फुदक-फुदक कर उसकी तरफदारी, तीमारदारी में नित नये तर्क ढूंढ-ढूंढ कर ला रही हो, बता रही हो कि विकास के अमरीकी मॉडल से अलग इस भूखंड के पर विकास की अन्‍य कोई सूरत एक्सिज़्ट ही नहीं करती; वैसे में चॉम्‍स्‍की और तारिक अली जैसे कुछ सिरफिरे न केवल समीक्षा व आलोचना का धारदार-जोरदार बिगुल बजाये-जिलाये रखे हों, बल्कि शावेज़ और मोरालेस की निहायत छोटी, अर्थहीन दुनिया में दुनिया के व्‍यापक अर्थ भी ढूंढ लेते हों?.. जबकि मैं अपने सादे भटकाव तक को ठीक-ठीक अर्थपूर्ण बना पाने में असफल रह जा रहा हूं और फिर भी आप ज़ि‍द करती हैं कि मैं आपको बताऊं कि क्‍या महसूस करता हूं? क्‍या बताऊं क्‍या महसूस करता हूं?..

2 comments:

  1. समझ मे नही आ रहा कि किस पर टिपियाये , आपके लडकीके घूरने पर , वित्तमंत्री पर नादिर शाह पर,सूरदास पर,उसके पेंसिल घुमाने पर या आपको दो चार बडे बडे इंजेक्शन ना लगाने पर, या फ़िर पटना मे आपके खाये बासी आलू पर.या फ़िर इस पर एक समीति बैठा दे :)

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  2. टिपियाने के दृष्टिकोण से कठिन पोस्ट है, क्या बताऊँ कैसा कैसा महसूस कर रहा हूँ. वैसे अब एक एक करके लिंक्स पर जाऊँगा, शायद स्थितियां सुधरें.

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