Monday, June 23, 2008

दुनिया की अमीरी के चिथड़े..या लिथड़े?

पता नहीं कहां-कहां की फटही में मूड़ी घुसाके तुरही बजाता रहता हूं. जबकि सतही से ज़रा ऊपर उठ कर कोई पुस्‍तकाकार रूपाकार भी सजा सकता था? दूसरे राजकमल और वाणी करते रहते, मैं पेंग्विन इंडिया के दफ़्तर से बाहर आ सकता था? या देखकर दूसरे सन्‍न रह जायें, मैं धन्‍य, ऐसी कोई फ़ि‍ल्‍म भी बना सकता था. सकता था? रात-रात जागकर मैं, ओह, कैसी तो गज़ब स्क्रिप्‍ट लिख लेता, मगर पैसा कौन लगा सकता था?.. यह लंचनंतर संतोष के डकार वाली कविता पंक्तियां नहीं हैं, दोपहर के भोजन से दूरी से उपजी मार्मिक, मरोड़कारी जेनुइन चिंतायें हैं..

कब यह सब होगा? निजी स्‍तर की तीन-चार लौमहर्षक कार्यवाइयां कब मैं एक्ज़ि‍क्‍यूट करूंगा? दूसरे कब कुछ करेंगे? दिल्‍ली में अपने पुराने संगी संगम के माथे चढ़ा रहता हूं, कि ससुर, नौकरी के पैसों से अघाये मत रहो, कुछ सार्थक विचार-मणि बाहर लाओ! संगम मुझे जवाब देने की जगह खांसी खांसने लगते हैं. जबकि अनिल और हर्षवर्द्धन से मैंने कल कहा कि इतनी आर्थिक, अर्थपूर्ण चिंतायें हैं आप लोगों के पास, यह वीडियो तक कैसे ट्रांसलेट हो, इसकी जुगत क्‍यों नहीं भिड़ाते, तो अनिल तो मुंह के आगे हाथ रखकर, संगम की ही तर्ज़ पर, खांसने लगे; हर्षवर्द्धन, अपने नाम को सार्थक करते हुए, हंसने लगे. पता नहीं मुझ पर हंस रहे थे या मेरी सलाह पर. बहुत बार मुझे भी अपने कहे पर हंसी आती है, मगर थोड़ी देर बाद- अनिल की तरह मुंह के आगे हाथ रखकर खांसने की जगह, मैं दिमाग़ में कुछ नया भांजने लगता हूं..

दो दिन पहले, अभय की दया (दया से ज़्यादा उसकी जेब के पैसों से) से एक किताब हाथ आयी (आकार वालों ने उसका हिंदी अनुवाद भी छापा है, मगर वह छह सौ की है, जबकि मैंने जो उठायी, अभय के जेब में जिसने एक सूराख़ बनायी, अंग्रेजी वाली वह महज डेढ़ सौ की थी, डेढ़ सौ से और ज़्यादा मज़ेदार यह था कि दिल्‍ली, चेन्‍नई की जगह उसे खड़गपुर के एक छोटे प्रकाशन ने छापा था).. और ‘विश्‍व अर्थव्‍यवस्‍था में ग़ैर-बराबरी और रोजग़ार- दोषी कौन’ के शुरू के दो अध्‍यायों से गुज़रने के बाद कुछ-कुछ बड़ा तृप्‍त हूं. आर्थिक विषयों वाली किताबों के साथ ज़्यादा दिक्‍कत यह होती है कि चार पन्‍नों के बाद इस तरह आंकड़ों के टेबल सजने लगते हैं कि मेरे जैसा खुद को समझदार लगानेवाला पाठक भी अकबकाकर खुद को मूर्ख महसूसने लगता है, और थोड़ी देर तक ऐसा महसूसते रहने के अनंतर, किताब के लेखक और प्रकाशक को मूर्ख समझकर किताब से बाहर चला आता है, और फिर बाहर ही आवारा टहलता रहता है!

माइकल डी येट्स की ‘नेमिंग द सिस्‍टम’ के साथ ऐसा नहीं है. मैं अभी भी किताब के अंदर ही हूं, और आखिर तक बना रहूंगा ऐसी उम्‍मीद बनी हुई है. सोवियत संघ के विघटन के बाद क्‍यूबा, दक्षिणी कोरिया, वेनेज़ुएला व बोलिविया जैसे कुछ देशों से अलग समूची दुनिया में जिस ग्‍लोबल नवउदारवादी अर्थव्‍यवस्‍था का एकछत्र राज है, और उसके पुरोधा इसे दुनिया से देर-सबेर गरीबी दूर करने का इकलौता मंत्र बताते घूम रहे हैं, किताब इस मंत्र के एक हज़ार प्रतिशत झूठ.. पूंजीवादी विस्‍तार के इतिहास और वर्तमान के क्रिया-व्‍यापारों की सरल, समीक्षा करती एक बड़ी तस्‍वीर हमारे सामने पेश करती है, जिसे पढ़ते हुए मुझे लग रहा था ऐसी सामग्री सभी राष्‍ट्रीय अख़बारों के मुखपृष्‍ठ पर छापा जाना चाहिये, लेकिन चूंकि वह हमारे-आपके हित में छपती नहीं, तो ऐसी सामग्री भूले से भी छापने से रहीं, मगर गांव के चौपालों पर खड़े होकर उन्‍हें सुनाया जाना तो चाहिये ही? गोवा में लोहिया के सम्‍मान की ख़बर लिये घूम रहे रवीश यह ज़ि‍म्‍मा उठा सकते हैं.. उठायेंगे? नहीं तो फिर बलिया, बलरामपुर के चौपालों तक बकिया ऐसे कौन छापामार सिपाही हैं जो इन ख़बरों को वहां तक पहुंचाने के लिए मुझे वहां टांगकर ले जायेंगे?..

दोषी कौन की सामग्री पर आनेवाले दिनों में और लिखूंगा..

तब तक के लिए ज़रा इस एक छोटे से टेबल पर आंख फेरिये:

Some Astonishing Facts
From a 1998 study by the United Nations

1. The richest fifth of the world’s people consume 86% of all products, while the poorest-fifth purchases 1.3%- everything from meat to paper and automobiles.

2. The three richest persons in the world have assets greater than the combined GDPs of the 48 poorest nations (note that this is a comparison of wealth to income). So, if the three richest persons sold their assets they could buy the total output of these 48 countries.

3. If the poorest 47% of the world’s people (2.5 billion persons) pooled their yearly incomes, they could just purchase the assets of the world’s wealthiest 225 individuals.

4. A tax of 4% levied on the wealth of these same 225 wealthy people would pay for basic and adequate health care, food, drinking water and safe sewers for every person on earth.
और विचारिये!

4 comments:

  1. 4. A tax of 4% levied on the wealth of these same 225 wealthy people would pay for basic and adequate health care, food, drinking water and safe sewers for every person on earth.


    And who is going to ensure that this tax of 4% would reach where it has to.....?

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  2. @शिव बाबू,

    सब जानते हैं ऐसा कभी माई के लाल होने नहीं देंगे, तो आपके सवाल पर चिंतित होने जैसी बात नहीं है.. यह महज़ आंकड़ों की मार्फ़त वस्‍तुस्थिति की तरफ इशारे की कोशिश है..

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  3. शिवकुमार जी, इसीलिए राजनीतिक बदलाव की बात होती है। ये 4 फीसदी टैक्स वही सरकार लगा सकती है जिसमें हमारे-आप जैसे आम लोगों की आवाज़ सुनने का माद्दा होगा और उन्हें वापस बुलाकर आम बनाने का भी अधिकार हमारे पास होगा। बिना वैकल्पिक राजनीति के कुछ नहीं हो सकता। ये बात तो आप भी अच्छी तरह जानते होंगे। और, विकल्प कहीं बने-बनाए नहीं मिलते। उन्हें रचना पड़ता है।

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  4. बड़ा विकट मामला है। गैर बराबरी दिन ब दिन बढ़ती जा रही है और कोई कुच्छ कर नहीं पा रहा है।


    आप सही में किसी दिन पेंग्विन इंडिया से बाहर निकलते दिखें। :)

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