Tuesday, June 24, 2008

ओ बिहार! के कुछ पुराने, पुरनिया कौतुक..

पता नहीं तेईस वर्ष तक किस प्रशासनिक पेंच के फेर में उड़ीसा के साथ फंसे बिहार को बंगाल से मुक्ति और भारतीय नक़्शे पर स्‍वतंत्र जगह पहली अप्रैल, 1912 को मिली. मिली-जुली आबादी थी तब 3.8 करोड़. नवगठित प्रांत ने अपना प्रशासकीय राज-काज शुरू किया तो टेंट में रोकड़ था कुल सवा करोड़ रुपये. पुनर्गठन से पहले बंगाल में न खरचे जा सके मद से साढ़े पांच लाख की अतिरिक्‍त मदद मिली. इस तरह कुल आरंभिक 1.305 रोकड़ से बिसमिल्‍लाह हुआ; जिसमें 85 लाख तो नए प्रांत के कामकाज को शुरू करवाने में ही खर्च हो जाना था, बचे हुए में से बारह लाख को जमा रोकड़ की तरह रखते हुए बकिया का तैंतीस लाख ही- जहां जो बनाना-बिगाड़ना था- खरचे और पानी के लिए उपलब्‍ध था!

सबसे ज़्यादा आमदनी भू-राजस्‍व से आती थी (1923-13 में 1,57,39,000 रु.), उसके बाद नंबर उत्‍पाद करों से होनेवाली आय का था. 1928-29 तक हालांकि उत्‍पाद करों ने भू-राजस्‍व को पीछे छोड़ दिया था. फिर भी अन्‍य प्रांतों की तुलना में राजस्‍व की वृद्धि दर यहां काफी कम थी. इस राह में सबसे बड़ा रोड़ा, समझनेवाले स्‍थायी बंदोबस्‍तवाली जंमीदार प्रथा को बताते रहे.. 1919-20 में पूरे प्रदेश में कुल 1,11,885 जागीरें (एस्‍टेट्स) थीं, जिनमें स्‍थायी बंदोबस्‍तवालों की संख्‍या थी 1,00,027. माने सबसे ऊपर ब्रितानी सरकार के सीधे प्रबंधन वाली 324 जागीरों से अलग, स्‍थायी बंदोबस्‍त वाली जंमिदारियों का ही बोल-बाला था. 20,000 एकड़ से अधिक की जागीरवाली रियासतों की संख्‍या थी 474, जबकि नब्‍बे फीसदी जागीर 500 एकड़ से कमवाली थी.

जमींदार बाबू साहब शौकीन तबियत के लोग हुआ करते थे. संगीत, शिकार, मोटर चलाने में सुखी रहनेवाले. इससे फुरसत मिलती तो पूजा-पाठ, धार्मिक आयोजन, यज्ञ आदि में व्‍यस्‍त रहते. एकाध (जैसे आरा के हरि जी का परिवार) को छोड़कर किसी की भी उद्योग-धंधे में खास रुचि नहीं थी..

बिहार से लेबर माइग्रेशन (स्‍थानीय ज़बान में ‘दौरा’) उन्‍नीसवीं सदी के आखिर से ही फलता-फूलता रहा है. इन विदेशिया मजदूरों के कारण ही बिहारी ग्रामीण इलाकों में मनिऑर्डर अर्थव्‍यवस्‍था की नींव पड़ी. 1887 ई. में ही गया जिले में 7,22,070 रुपये मनिऑर्डर से आया था. 1896-97 में मुजफ्फरपुर में 15 लाख रुपये आया था जो 1910 ई. में बढ़कर 34 लाख रुपये हो गया. यह माइग्रेशन कलकत्‍ता और असम के चाय-बागानों तक ही सीमित नहीं था, लोग फिजी और मारीशस तक निकल रहे थे. 1901-11 के लिए दौरान उपनिवेशों के लिए 11,676 लोग भर्ती किये गये जिनमें आधे से अधिक बिहार के थे और उसमें भी 3,473 तो सिर्फ़ शाहाबाद जिले के थे.

उद्योग उन दिनों बिहार में गिने-चुने ही थे. सबसे बड़ी टाटा आयरन एंड स्‍टील कंपनी (टिस्‍को) का नाम आता है, फिर दूसरा बड़ा उद्योग था जमालपुर का ईस्‍टर्न इंडियन रेलवे वर्कशॉप्‍स. 1922 में टिस्‍को में कार्यरत 40,000 लोगों की तुलना में जमालपुर में काम करनेवालों की संख्‍या थी करीब 12,000..

शिक्षा का सीन माशाअल्‍ला था. जो जैसा था उसमें उच्‍च शिक्षा पर पूरी तरह ऊंची जातियों और अशराफ मुसलमानों का बर्चस्‍व था. हां, कुछेक धनी-मानी कुर्मी-यादव-कोइरी परिवार के छात्र भी इस क्षेत्र में प्रवेश पा रहे थे. सबसे ज़्यादा दलितावस्‍था दलितों और लड़कियों की थी. मिडिल स्‍कूल में 1922 तक में दलित उपस्थिति सिर्फ़ 1, और 1927 तक में वह बढ़कर 2 हुई! हाईस्‍कूलों में ऐसे दलित छात्रों की संख्‍या 1927 में 0.3 फीसदी (प्रति हजार सिर्फ़ 3) थी. स्‍कूलों और कॉलेजों में दूर-दूर तक दलित छात्रों का नामोनिशान तक नहीं था.

प्रसन्‍न कुमार चौधरी, श्रीकांत लिखित 'बिहार में सामाजिक परिवर्तन के कुछ आयाम', वाणी, 2001 से साभार.

3 comments:

  1. किताब सही है ।

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  2. guru, masthead men jo fotoiyaa hai n usaka gb bahut kam kar dejiye. kholne men hi 8.5 rupya chalaa jaataa hai.

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  3. @बाबू विजयशंकर, आपके बोझदार बच्‍चे मास्‍ट से हटा लिये गये हैं..

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