Wednesday, June 25, 2008

बारिशी अंधेरे में बिन भांग एक उलट दोपहर के चित्र..

सरपट भागते घोड़े नहीं दीखते, जाने कौन किसकी सवारी होती कि बारिशी जत्‍था पलक झपकते में बांग्‍ला स्‍कूल के पिछवाड़े से लाल्‍टू के घरवाले मैदान तक पहुंचता, सबको अपनी चपेट में लिये-लिये और अगले मिनट संकरे डेली मार्केट की दुकानों के कमज़ोर टीनों पर अपनी गोलियां पटपटाता! झारसुगुड़ा से लाये कपड़े के थानों और संबलपुरिया साड़ि‍यों से घिरा मेघनाथ एस्‍बेस्‍टस के बजते छत के नीचे ट्यूब की टिमटिमाती रोशनी में घबराया-दुबका बैठा होता, मानो अब-तब में जब कभी भी उसके दुकान की छत गिरे, मृत्‍यु का वरण वह वहीं दुकान के अंदर करे, घर लौटने की हड़बड़ाहट में साइकिल पर प्रतिकूल हवाओं और बारिश से जूझते हुए सेक्‍टर पंद्रह के अपने मकान तक के रास्‍ते के कीचड़-कादो में नहीं..

काली गाय को नाथकर मंदिर के पीछेवाला मैदान पार करा सोमारु भी, अचक्‍के में चल आयी इस बरसाती हमले में, एकदम अकबकाया गइया पर चिचियाकर मंदिर की दिशा में भाग खड़ा होता.. पत्‍ते इकट्ठा करने पीपल के पेड़ पर चढ़ा ब्रृजभूषण का बेटा नंदन तो वहीं ऊपर शाखों में फंसा रोने लगता! जबकि उसका रोना पेड़ के नीचे खड़ी शांत व निस्‍पृह जनार्दन की गाय और तापस का झबरा कुत्‍ता ‘गोपा’ तक सुनते नहीं होते.. और सुनते होते भी, तो उसे सीरियसली लेते नहीं..

रुना आंटी के घर के आगे पता नहीं कब की और किसकी छोड़ी एक पुरनिहा एम्‍बेसेडर कार का मुरचाइल अस्थि-पिंजर होता, जो दुस्‍साहस में नंगे देह बारिश की मारों को झेलता और उफ़्फ़ तक न करता! उसके सामनेवाले हरे मैदानी टुकड़े में, पहले से ही भरे बड़े गड्ढे के भूरे पानी पर पट-पट बारिश की तीरें छूटतीं.. जंगले की सलाखों में आंख और गाल धंसाये बाबुन कहता- भूल के भी गड्ढे के पास मत जाना.. गड्ढे के खोह में सात सांप छिपे हैं!

घर में सब कुशल मंगल होता.. मतलब मैदान में फुटबाल खेलते हुए फिसलकर किसी बेटे के घुटने पर चोट आयी न होती, न रसोई में चूल्‍हे के पीछे सांप का कोई बच्‍चा गोला डालकर छिपा होता, और न ही मर्तबान के अचार में फफूंद पड़ा होता, फिर भी पता नहीं क्‍यों मां, मुंह पर आंचल रखकर लंबी आह छोड़ती.. बाबूजी सीमेंट के नंगे फ़र्श पर बगल में बाल्‍टी में भिगोया आम लिये बैठे होते और बादामी का गुठली चूसते हुए, बाहर से भींजकर कीचड़-सने गोड़ से लौटे मनोज को देखकर बरजते- का लेने लौटे हो, छोहाड़ा परसाद? बहरिया अभी और मजा करते?

मनोज, जो कुछ लेने नहीं लौटा होता, मगर सामने आम की बाल्‍टी देखकर अब लौटने की सार्थकता समझ आयी की अनकही समझदारी में चटपट बाबूजी के बगल चुका-मुकी जाकर बैठ जाता.. और फिर दीदी बरजने लगतीं कि कीचड़-कादो के गोड़ से घर गंदा कर रहा है, तो गुठली चाभते हुए बाबूजी- दीदी को नहीं, पता नहीं किसे संबोधित करते हुए- मुस्‍की काटकर जवाब देते बरसात में घर गंदायेगा नहीं तो क्‍या अगरबत्‍ती का धुआं छोड़ेगा?..

गुलाब के पौधों से लगे छोटे गलियारे में स्‍टैंड पर लगी चुमकी के बाबा की एटलस साइकिल चुपचाप खड़ी बरसात के चोट सहती होती, जबकि परदा खिंचे खिड़कियों पर नज़र ताने-ताने मेरी आंखें दुखने लगतीं, मगर फिर भी चुमकी का कोई पता न चलता.. झमाझम होती ऐसी बरसात में तीन-तीन दिन गुजर जाते और चुमकी का चेहरा देखे बिना मैं भयानक उदासी और घबराहटों के बाद बारिश से नफ़रत करने लगता.. ऐसी बेहया बरसात को कैसे सांप का ज़हर पिला दूं की रणनीति बुनने लगता.. ओह, फिर भी बारिश कहां थमती?

10 comments:

  1. चुका मुकी कि चुकु मुकु ? और चेहररा लिखने से चेहरा ज़्यादा अच्छे से दिखा ...

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  2. बारिश का अच्छा-जीवंत चित्रण... तस्वीर भी कमाल की.

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  3. ऐसी बेहया बरसात को कैसे सांप का ज़हर पिला दूं--ye aap hi kah saktey hain..aur kisi ke bas ka hai nahi..

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  4. बेहतरीन चित्र खेंचा है बारिश का..आनन्द आ गया. लगे रहो, महाराज.

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  5. A Real & Live snap shot from some forgotten monsoon day in a forlon town ..exceptionally brilliant ..like, always !!
    Wonderful sketch ..of real life.
    Regards,
    L

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  6. बाल्टी में भीगे आम! वे भी क्या दिन होते थे! फ्रिज से निकालकर आम खाने में वह मजा कहाँ है?बाल्टियाँ तो अब भी हैं परन्तु फ्रिज के होते हुए आम उनमें जाने से आनाकानी करते हैं।
    घुघूती बासूती

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  7. naye fotoo men to 'golshan kumar sudeep' lag rahe hain parmod ji! mast hai, ek tho sigritiya hamako bhee badhaiye!

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