Thursday, June 26, 2008

क्‍या हम अर्जेंटीना से सबक ले सकते हैं?..

ऐसा क्‍यों है कि कोई चींटी हाथ या कंधे पर अपना खेल दिखाती दिखती है तो हम बड़ी सफाई से उसका खेल विफल कर देते हैं, जबकि शहर-शहर, देश भर में चल रहे आततायी आर्थिक खेलों की सच्‍चायी देखने की जगह, बाज़ार में छातों के बदले भावों मात्र में उलझकर रह जाते हैं.. उसके बाद यह नहीं होता कि बाज़ार या सड़क पर कहीं अपने गुस्‍से का इज़हार करें, बजाय घर आकर पसर लेते हैं? आर्जेंटीना से कोई सबक नहीं ले सकते? कल नाओमी क्‍लाइन की लिखी, एवी लेविस डायरेक्‍टेड एक डॉक्‍यूमेंट्री (द टेक) देखते हुए चिंताओं की इन्‍हीं पगडंडियों में टहल रहा था.. फ़ि‍ल्‍म काम से बहरियाये मजदूरों का बंद फैक्‍टरियों पर कब्‍जा करने व मजदूर कॉपोरेटिव की शक्‍ल में उन फैक्‍टरियों की दुबारा शुरुआत करने की मूल कहानी के साथ-साथ अर्जेंटीना, व समूची दुनिया में नियो-लिबरल इकॉनमी के काम के तौर-तरीकों के पोल-पट्टी भी उतारती है.. और यह काम नाओमी काफी सीधे व धारदार अंदाज़ में करती हैं! ज़रा कुछ नमूने देखिये..

फ़ि‍ल्‍म के एकदम शुरू में शाम की नियन रोशनी में जगमगाते ब्‍युनेस आयरस (आर्जेंटीना की राजधानी) के कुछ एरियल शॉट्स हैं.. बैकग्राउंड में नैरेटर की पंक्तियां हमें बताती है- ऊपर से देखने पर ब्‍युनेस आयरस अब भी यूरोप या उत्‍तरी अमरीका ही लगता है.. चमचमाती कंपनी के लोगोस खरीदारियों के लिए आपको उकसातीं, बड़े भीमकाय बैंकों के टॉवर सेविंग और इन्‍वेस्‍टमेंट की आपको सूरतें बताते.. लेकिन नीचे.. बैंक्स सुरक्षात्‍मक स्‍टील के कवचों में बंद हैं, दरवाज़े और दीवारों पर लोगों ने नारों की पुताई कर रखी है (बैंक के मुख्‍य दरवाज़े पर हमें ‘लुटेरे!’ पेंट किया दीखता है.. फिर कचड़े में खोजायी करते बच्‍चे दिखते हैं). डिज़ाइनर लेवल्‍स पहने ये बच्‍चे कभी अमरीकी फास्‍ट फुड खाया करते थे, अब कचड़ों में खाने की चीज़ें ढूंढ रहे हैं. यह कोई ऐसा-वैसा गरीब देश नहीं.. बल्कि एक अमीर देश जिसे गरीब बना दिया गया!..

फ़ि‍ल्‍म पांचवे दशक के दरमियान काली-सफ़ेद एक पुराने फुटेज के इस्‍तेमाल से मीरामार रेसोर्ट पर अलग-अलग उम्र के पर्यटकों की नयी-नयी बन रही अमीरी के आराम व इतमिनान की कुछ तस्‍वीरें दिखाती है.. नैरेटर की आवाज़ हमें सूचित करती है- पचास वर्ष पहले, कैनेडा और ऑस्‍ट्रेलिया के तर्ज़ पर अर्जेंटीना फर्स्‍ट वर्ल्‍ड के पायदान चढ़ रहा था. उन स्‍वर्णिम वर्षों के शासक, ह्युआन पेरोन ने अमरीकी व यूरोपियन मॉडल पर देश का निर्माण किया; बड़े सार्वजनिक उद्यम और मेड-इन-अर्जेंटीना फैक्‍टरी अर्थव्‍यवस्‍था इसकी रीढ़ थे. नतीजा अर्जेंटीना का मध्‍यवर्ग समूचे लातिनी अमरीका का सबसे संपन्‍न तबका बना. यहां से थोड़ा नब्‍बे के दशक और राष्‍ट्रपति कारलोस मेनेम के शासन में फास्‍ट-फॉरवर्डी छलांग लगाते हैं.. मेनेम ने भी देश का कायाकल्‍प किया, मगर अबकी बार, इंटरनेशनल मनिटरी फंड के रूलबुक में बतायी नीतियों के पीछे-पीछे चलते हुए: सार्वजनिक उद्यमों में कटौती की, मजदूरों की छंटनी की, कॉरपोरेट्स को गोद में बिठाया सार्वजनिक संपत्ति जहां-जिसको बेच सकते थे, उसका बेधड़क धंधा किया. अर्जेंटीना में इसे ‘द मॉडल’ की ताज़पोशी मिली.. ‘टाइम’ जैसी अंतर्राष्‍ट्रीय अमरीकी पत्रिकाओं के मुख्‍यपृष्‍ठ पर ‘मेनेम मिराकल’ जैसे कवर-स्‍टोरीज़ छपे.. (आईएमएफ के तत्‍कालीन मै‍नेजिंग डायरेक्‍टर को हम एक मीटिंग संबोधित करते, सबको बताते सुनते हैं कि कैसे अर्जेंटीना, सच्‍चे अर्थों में, बड़े ही मजबूत आधारों पर नयी सदी में प्रवेश कर रहा है!)..

अगले ही क्षण एवी लेविस की आवाज़ हमें आगे की सच्‍चायी का खुलासा करती बताती है कि ग़लत. कि मेनेम मिराकल नहीं डिसास्‍टर साबित हुआ. आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे पहुंच गयी. उसने एक पूंजीवादी वाईल्‍ड वेस्‍ट की स्‍थापना कर दी थी. लोग बेरोजग़ारी के जाल में फंस गए थे, जबकि राष्‍ट्रीय संपत्ति कहीं किसी भी दिशा में जाने को मुक्‍त हो गयी थी. और अर्जेंटीनी मुद्रा जैसे ही नीचे गिरना शुरू हुई, ठीक यही हुआ भी. बहुराष्‍ट्रीय कंपनियां देश का 40 बिलियन डॉलर्स कैश उड़ाकर रातों-रात चंपत हो गयीं. ऐसी कोई नीति नहीं थी जो उनके हाथ बांधती, उन्‍हें रोकती. सरकार घबरायी और उसने देश के सभी बैंक अकांउटों को फ्रीज़ कर दिया. नतीजा यह हुआ कि आम अर्जेंटीनी मुंह बाये अमीरों को अपना पैसा लेकर भागते देखते रहे, जबकि खुद उनके जीवन भर के बचत पर ताला चढ़ गया! आम लोगों से यह बात पची नहीं. जल्‍दी ही, लाखों लोग सड़कों पर उतर चुके थे, और नारा लगा रहे थे- ‘इनमें से एक-एक को जाना होगा!’ उनकी मंशा लगभग-लगभग पूरी हुई. इन अर्थों में कि महज़ तीन हफ़्तों में अर्जेंटीना ने पांच राष्‍ट्रपतियों का चेहरा देखा. और ठीक उसी महीने जिसमें एनरॉन ने अपने को दिवालिया घोषित किया, अर्जेंटीना भी उसी राह गयी, दुनिया के इतिहास की सबसे बड़ी सर्वसंप्रुभता संपन्‍न डिफॉल्‍ट का चेहरा बनी आर्जेंटीना! एक देश जो अपने कर्जों से मुकर रहा था, बैंक जो लोगों को अपनी बचत तक नहीं पहुंचने दे रहे थे.. पूंजीवाद के सामान्‍य नियमों से स्‍वयं व्‍यवस्‍था मुंह चुरा रही थी!..

इस तरह से, अर्जेंटीना में सड़कों पर उतरा जनज्‍वार व विरोध किसी एक राजनीतिक या उसकी नीतियों के खिलाफ़ नहीं था.. यह लोगों द्वारा समूचे ऐसे विकासी मॉडल का अस्‍वीकार था.. वही जो सियाटल से शुरू होकर दक्षिण अफ्रीका तक अलग-अलग जगहों में हो रहा है.. जिस तरह से यह नवउदारवादी आर्थिक नीतियां वैश्विक हैं, उसी तरह से उनका विरोध भी..

अपने यहां भी महंगाई बढ़ने के सारे बांध खुल गये हैं, रुपये का अवमूल्‍यन भी अपनी राह है ही.. लेकिन विरोध और विद्रोह के हमारे तेवर क्‍यों नहीं?.. सोचना शुरू कीजिये, हमारा-आपका टाईम अब शुरू हो गया है..

(ऊपर की फ़ोटो में फ़ि‍ल्‍ममेकरद्वयी क्‍लाइन और लेविस साथ बैठे हैं)

10 comments:

  1. सोचना कठिन काम है, हम तो जहाँ बहा लिए जाएँ वहाँ बह जाते हैं। :(
    घुघूती बासूती

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  2. लेकिन विरोध और विद्रोह के हमारे तेवर क्‍यों नहीं?

    क्यों नहीं?

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  3. Pramod bhai,
    Kaam ki jaankaari ke liye shukriya. Dilli mein is documentary ko kahan se haasil kiya ja sakta hai ?
    Sanjay Joshi

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  4. @संजय प्‍यारे, मैंने नेट से ही उतारकर देखा, कहो तो लिंक फॉरवर्ड कराऊं?

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  5. जोरदार पोस्ट, लेकिन यहाँ की जनता तो धर्म की अफ़ीम खाये बैठी है, इससे सड़क पर उतरकर क्रांति की अपेक्षा करना कुछ ज्यादा ही होगा :( पूरी तरह से लुट-पिट जाने पर हम अधिक से अधिक एक सरकार की बलि लेते हैं बस, फ़िर चादर तानकर 5 साल के लिये सो जाते हैं…

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  6. समय तो कब से शुरू हो चुका है प्रमोदभाई, मगर दीगर मुल्कों में जो तेवर आम जनता के बीच से तैरते हुए आते हैं और देश की फिज़ा बदल जाती है वे तेवर जिस चेतना की उपज है उसे कहां से लाएं ?

    हमारा समाज चेतनाहीन है। थोड़ी-भुसी जो बुद्धिजीवी तबका दिखाता है उसे मैं हीनचेतना कहूंगा।
    चेतना का साक्षरता और शिक्षा से कोसों दूर का रिश्ता है इसलिए इन दोनों शब्दों के सहारे भी बात को खारिज़ नहीं किया जा सकता है।
    चेतना आती है मिसालों से , उदाहरणों से । हाल के बरसों में समाज के किसी तबके से (साहित्य , राजनीति, समाजसेवा) कोई उदाहरण, कोई मिसाल ऐसी सामने नहीं आई जो समाज के लिए चेतना बने।
    अच्छी पोस्ट । अर्जेंटीना के बहाने जो प्रश्न उठाया , जबर्दस्त है।

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  7. Please forward me also the link of Naomi klien film on Argentina.
    Jawarimal Parakh
    jparakh@hotmail.com

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  8. " चेत मच्छीँदर गोरख आया "
    बहुत सही बात उठाई है
    - लावण्या

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