Friday, June 27, 2008

सुबह-सुबह की अचकन में तीन बिम्‍ब..


अनजाने देहातों के जगर-मगर, पहाड़ के लम्‍बे विस्‍तार और जाने कैसी, किन-किन अंधेरों से गुज़रती पगडंडियों के बाद का दृश्‍य क्‍या होगा? दूर तक निकली आयी दौड़ों की थकान, हंफनी के बाद फिर कोई नयी दौड़ होगी? या अवकाश-सदृश भी कुछ होगा?..

पता नहीं किस जंगल के अस्‍तबल या कारख़ाने के ज़ि‍बहघर से छूटकर भागा था घोड़ा. सांस खींचे तीन रातें भागता रहा था, अब एक पहचाने पेड़ के नीचे दम लेने को खड़ा था, थाहता उत्‍तर जाऊं कि दक्खिन. पेड़ के ऊपर अल-कबीर का नियन साइन चढ़ा था, नियन साइन में बिजली के तलवार जड़े थे. घोड़ा उत्‍तर-दक्खिन थाहने का आदी था, ऊपर के बारे में समाज ने उसे शिक्षित नहीं किया था..

गेंहू, जवार के बाद, हे ईश्‍वर, अब वृष्टिजल का कारोबार भी करवा ही डालो, बहरियाओ मुल्‍क से, करवाओ निर्यात बरसात के पानी का, बिक्री के सूचकांक में, मालिक, ऊपर चढ़वाओ. क्‍योंकि ऐसा है प्रभु, धन्‍य हैं इस देश के लोग, अभी तक सन्‍न कहां हो पा रहे हैं. जोरू छीन जायेगी तो कहेंगे ईश्‍वर की यही माया थी, घर का नल और सुबह का कलकल छीनेगा तब शायद कुछ और करेंगे, ऊपर तककर, हे ईश्‍वर, तुमको याद नहीं करेंगे?

4 comments:

  1. उत्तर-दक्खिन थाहने के आदी तो सारे गधे हो गए...घोड़ा कहाँ है जो उत्तर-दक्खिन थाहे...ब्रिष्टिजल का कारोबार तो पहले से चल रहा है..निर्यात भी होने लगता...लेकिन बचा कहाँ है निर्यात करने के लिए?

    ईश्वर के नाम सब कुर्बान...नहीं?

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  2. एकबारगी लगता है कि तीनो बिम्ब सामने हैं, आँखों के सामने लेकिन फ़िर ..... मन कि गांठ है... ऐसे थोड़े ही खुलेगी

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  3. अजीब हाल है !
    हमेशा घोड़ा ही क्यों सोचे ? सवार क्यों नहीं सोचता ? किस जंग का योद्धा है वो जहां हलाक करना या शहीद होना ही ज़रूरी है । योद्धा को सोचने की ज़रूरत नहीं ?
    घोड़ा सोचेगा तो खाएगा कब ? खाएगा नहीं तो दौड़ेगा कैसे ? दौड़ेगा नहीं तो मुल्कों मुल्कों , शहरों शहरों फतह कैसे होगी?

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  4. अजित जी घोड़ा ही कुछ करेगा। सवार तो सनका पड़ा है। एक दिन यही घोड़ा भागता हुआ न्यूज़ चैनलों के दफ्तर आएगा और रिपोर्टरों को लाद कर हल्दी घाटी को मार करता हुआ कच्छ के रण में ले जा कर पटक देगा। पूछ में डीजीकैम को बांधे घोड़ा रा्स्ते भर उनकी फिल्म बनायेंगा और ले जाकर एफटीआई के आर्काईव में रख

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