Saturday, June 28, 2008

संडे के एह, गिरिधारी.. ओह, बिरिजबिहारी!

बनवारी, गजोधर, गिरिधर, बिहारी.. या प्रीतकुमारी.. नाम में क्‍या रखा है? भावना में रखा है.. कोई याद किया गया, वह महत्‍वपूर्ण है.. लेकिन नहीं ही भी है.. पूछिये तो याद करने के नेह में आत्‍मा किस कदर नहायी होती है, वह महत्‍वपूर्ण है.. या स्‍वर.. या स्‍वर के अंदर आरोह-अवरोह के विविधरूपी ज्‍वर. ज़रूरी नहीं पक्‍का वही गायें, जिनकी आवाज़ में पक्‍की पगडंडियां व पक्‍के रस्‍ते हों.. कच्‍चे मुंड़ेर पर खड़े भी कभी-कभी पक्‍के का सपना बुन सकते हैं! नहीं बुन सकते? हो सकता है आप न बुन सकते हों, मगर मैं तो हर वक़्त कोशिश करता हूं.. कम से कम आवाज़ निकाल लेने भर के स्‍तर पर तो करता ही हूं..

तो बनवारी की दुनिया की नेहभरी याद की हमारी कोशिश पर ज़रा एक मर्तबा कान फेर के देखिये. और हां, फट से कान मोड़ मत लीजियेगा! हारमोनियम पर संगत कर रहे बाबू विकास पंडित शुरू में थोड़ा घबड़ा रहे थे, और सुर में आने में ठीक मात्रा में समय खा रहे थे. जल्‍दी ही हारमोनियम से घबराकर सिंथ के कीज़ पर लौटे तब कहीं जाकर कुछ-कुछ हमारी जुगलबंदी भी ऊपर उठते-उठते फटने से बच-बच गयी. जितना बची है, उसे अपनी कच्‍ची समझ में ढालते हुए हमारे पक्‍केपने की दाद दें.. हां, ऊपर-ऊपर दाद देते हुए ऐसा नहीं कि अंदर-अंदर साथ ही कुछ लोग यह भी सोचें कि स्‍वर की ऊंचाई है, ठीक है, मगर लिखायी क्‍या है? इसी लिखायी पर इतरा रहे हैं, इससे अच्‍छा तो समीर लिख लेता है? लिख ही लेते होंगे, भई, उनका पेट भरा होता है! गुलज़ार भी लिख लेंगे, उनकी तो गिलास भी भरी होती है. लेकिन खाली पेट मैं ऊंचा गाने के साथ-साथ ऊंचा सोच भी लूं, और साथ में जब बाबू विकास पंडित हारमोनियम की जलेबी फेर रहे हों (आवाज़ बीच-बीच में हमारे कंधे से नीचे झुककर माइक में ठेल दे रहे हों, उसका दु:ख तो ख़ैर, क्‍या कहें), यह कुछ आपको हमसे अतिशय अपेक्षा नहीं लगती? ससुर, संडे को गा रहे हैं, और फुलमतिया की जगह आपको सुना रहे हैं, काफी नहीं है?..

अब ज़्यादा दिमाग मत पेरवाइये, नीचे पेश है, धीरज और धरम से सुनिये: हे बनवारी! हो बनवारी..


4 comments:

  1. हा हा!! महाराज, क्या बतायें हे बनवारी..आज तो ओल का चोखा और लौकी की गुरिया ही चलेगी.

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  2. वाह ! क्या बात है !
    घुघूती बासूती

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  3. adhbhut pukaar!!!! banwaari pahunchey ki nahi ???

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  4. आप तो गा के चल गये और हियाँ स्साला बनवारी आके हम्को तंग करता है रोज. अब ओल कहाँ से लावें? एने त कनहूँ जमीनो नहीं लौकता है.

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