Sunday, June 29, 2008

कितना समझता और सही चाहता है भारतीय मध्‍यवर्ग?..

भारतीय मध्‍यवर्ग में एक काफी बड़ा तबका है जिसे लगता है देश के विकास के रास्‍ते में पता नहीं ये किसान और आदिवासी क्‍यों रोड़ा बन रहे हैं. ऐसे तबकों की यहां-वहां आहुति हो जाये, सो ही बेहतर. इस तबके को गुजराती विकास के नाम पर राज्‍य के एक पुराने, बड़े समुदाय का राज्‍य की मुख्‍यधारा से कट जाना स्‍थानीय विकास की कोई बड़ी कीमत नहीं लगी, और उस सबक को देश के दूसरे हिस्‍सों में भी लागू करने की वह कामना करता हो तो इसमें ख़ास ताज़्ज़ुब नहीं. हममें बहुत लोग हैं जो भारत को तरक़्क़ी के अमरीकी मॉडल की ओर बढ़ता देखने में ही देश का सर्वोपरि हित समझते हैं.. और इस मॉडल के प्रति ज़ाहिर किया गया कोई भी संशय, सवाल चट तरक़्क़ी-विरोधी, और उससे ज़रा आगे जाकर राष्‍ट्रदोह में बदल जाता है!

समाज-चिंतक व बुद्धिजीवी (जिनकी संख्‍या अपने देश में वैसे भी दिनोंदिन कम होती जा रही है) अशीष नंदी भारत के इस मध्‍यवर्ग से बहुत खुश नहीं हैं जो विकास पाने के लिए तानाशाही वृत्तियों को देश के कंधे पर बिठा रहा है. भारत के सामने क्‍या आसन्‍न चुनौतियां हैं के जवाब में उनका कहना है कि मौज़ूदा आर्थिक व सामाजिक दृष्टि यह है कि समाज के निचले तबके का दस प्रतिशत भाड़ में जाये. हमें बड़ी खुशी होगी अगर यह समूची आबादी किसी तरह बिला जाये, मर जाये! हमारे वित्‍तमंत्री समेत हम सबों के अंदर यह धारणा पैठ गयी है कि गरीबी से पिंड छुड़ाने का इकलौता रास्‍ता ‘विकास’ और औद्योगिकरण है, मानो सा‍माजिक परिवर्तन का एक यही मॉडल हो जिसके बारे में हम जानते हों. दुनिया की छह फ़ीसदी आबादी वाला अमरीका दुनिया की तीस फ़ीसदी स्‍त्रोतों का भक्षण करता है. लेकिन हम दुनिया की छह फ़ीसदी आबादी नहीं हैं. अमरीका बनने के लिए हमें दुनिया के बाकी सब लोगों की हत्‍या कर डालनी होगी और संसार के सभी स्‍त्रोतों की लूट पर काबिज होना होगा तब भी हम अमरीकी जीवन-स्‍तर को हासिल नहीं करेंगे!

राष्‍ट्रीय राज्‍य की धारणा हिंदू धारणा नहीं है. यह उन्‍नीसवीं सदी की यूरोपीय खोज है, और खुद यूरोप इसकी जड़ता से बाहर आ चुका है, जबकि हम अब तक इससे चिपके हुए हैं. जैसाकि रवींद्रनाथ ठाकुर ने कभी कहा था, भारत में राष्‍ट्र बनाने की कोशिश कुछ वैसी ही है जैसे स्वित्‍ज़रलैण्‍ड की अपने लिये नौसेना खड़ी करने की कोशिश. एक अनुमान के अनुसार, 28 वर्षों में गंगा खत्‍म हो जायेगी. पता नहीं तब शायद इस मध्‍यवर्ग की आंखें खुले जो एक ख़ास इनकमग्रुप में शामिल होकर अपने को मध्‍यवर्ग मान रहा है, मूल्‍य उसके मध्‍यवर्गीय नहीं..

तहलका के ताज़ा अंक में भारतीय मध्‍यवर्ग के बारे में यह और अन्‍य काफी सारे दिलचस्‍प विचार रख रहे हैं अशीष नंदी. आप पढ़ि‍ये, और सोचिये..

एक और वजह है जिससे श्री नंदी इन दिनों फिर से ख़बरों में हैं.. गुजराती चुनाव में मोदी की जीत के बाद टाइम्‍स ऑफ़ इंडिया में उनके लिखे एक लेख पर अहमदाबाद के ‘बुद्धिजीवियों’ ने उनके खिलाफ़ अदालत में मुकदमा दायर किया, और उस विरोध के विरोध में इन दिनों एक हस्‍ताक्षर अभियान चला हुआ है.. नंदी के पक्ष में चल रहे हस्‍ताक्षर अभियान का लिंक यह रहा..

(ऊपर अशीष नंदी की फ़ोटो तहलका से साभार)

7 comments:

  1. आशीष जी की चिंताएं वाजिब हैं और इसलिए उनका विरोध हो रहा है

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  2. मध्य वर्ग ऐसा चाहता है? कभी बात होती है कि उच्च वर्ग और उद्योगपति ऐसा चाहते हैं. अब बात हो रही है कि मध्य वर्ग ऐसा चाहता है. कुछ 'विद्वान' कहते हैं कि सत्तर प्रतिशत आबादी सबसे बड़ी कंज्यूमर कम्यूनिटी है. मध्य वर्ग से भी बड़ी. और यही कारण है कि जनसँख्या वृद्धि पर लगाम लगाने की बात अब नहीं होती.

    देश जहाँ पर खडा है वहां विभिन्न 'विद्वानों' के मत आपस में टकरायेंगे. और यह जरूरी भी है. ऐसे में किसी एक 'विद्वान' के मत को पूरी तरह से ठीक मान लेना शायद जल्दबाजी होगी. आख़िर आने वाला बदलाव (चाहे वो किसी भी तरफ़ ले जाए), बहुत महत्वपूर्ण है. और इतने बड़े बदलाव को तमाम तरह के आकलन और सोच का सामना करना ही पड़ेगा. ऐसा नहीं है कि ये केवल हमारे देश में होगा. दुनियाँ के सभी देशों में ऐसा ही हुआ है. देश के विकास का मॉडल अमेरिकी हो, देशी हो, यूरोपियन हो या फिर मंगल ग्रह से लाया गया हो, इतने बड़े देश की बहुत बड़ी आबादी के हाँ के बिना स्वीकार नहीं किया जायेगा.

    जरूरत है, हमें तय करने की, कि हमारे लिए क्या ठीक है.

    और एक बात. आज ही पता चला कि अहमदाबाद में भी 'बुद्धिजीवी' रहते हैं....:-)

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  3. हम समझते हैं कि भारत को अमेरिकी मॉडल पर ले जाने की सोच (या साजिश) पूंजीपतियों और उनके पैरवीकारों की है। उन पैरवीकारों में राजनेता भी शामिल है और दलाल किस्‍म के बुद्धिजीवी भी।

    मध्‍य वर्ग की विडंबना यह है कि वह अपने सुख-दु:ख में इतनी डुबी रहती है कि उसे किसानों व आदिवासियों के बारे में सोचने का मौका ही नहीं मिलता। हालांकि जब किसान व आदिवासी नहीं रहेंगे तो इससे सबसे अधिक कष्‍ट शहरी मध्‍य व निम्‍न वर्ग को ही होगा।

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  4. बिल्कुल सही कह रहे हैं आप,बहुत ही प्रभावशाली लेख ....thanks

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  5. Nice post...middle-class aspires to be in the higher league in future and naturally aligns with them...in process it forgets the poor...

    That's why the comments like 'ye jhuggi jhopdi wale' are not uncommon in middle class drawing rooms.

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  6. नई फोटो शानदार है
    कुछ कुछ जेम्स बांड जैसी
    आवाज में अभी खनक है
    सिगरेट पीना कम कीजिये हुज़ूर

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  7. क्या किसान मध्यवर्ग के नहीं हो सकते? गुजरात आकर देख जाएं.


    गुजरात में बुद्धीजिवी? मजाक कर रहें है आप.

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