Wednesday, June 25, 2008

द आर्ट ऑव.. मेसिंग अप..

पता नहीं ऐसा क्‍यों है कि अपने यहां आदमी माइक्रोफोन सामने आते ही रहता तो अपने उसी पुराने ज़मीन पर है, मगर उसकी आवाज़ जाने किन राजेश खन्‍नायी ऊंचाइयों-सच्‍चाइयों में जाकर छिप जाती है.. और फिर वहीं छिपी रहती है.. ऐसे शख्‍स के बारे में सोचकर लगता है वह फेल हुए बेटे का रिपोर्ट कार्ड हाथ में लेकर भी पता नहीं क्‍यों बात कुछ राजेश खन्‍ना के अंदाज़ में ही करेगा.. या गोभी के पुलाव की बात करते हुए पता नहीं उसे किस ऊदबिलाव में बदल देगा? आज सोचा तो आंसू भर आये की तर्ज़ पर आज बोल रहा हूं तो पता नहीं क्‍यों ज़बान भरभरा रही है.. आप सुनकर भर्राइयेगा नहीं.. और सोने रात का खाना खाकर ही जाइयेगा.. नहीं? ठीक है, मुझे खिलवाकर जाइयेगा..

9 comments:

  1. खाना तैयार है जी कल सुबह से , आ जाईये :)

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  2. किस तरफ, किस लिए और क्यूँ कर आपने गोभी पुलाव सिखाया-उस पर तो कुछ कहना नहीं मगर सुनते सुनते मेरे दिमाग का गोभी पुलाव बन गया. आप तो अकेले ही कम न थे फिर वो चिरकुट को काहे घुसने दिये भाई…. नीबू का शर्बत या मिर्चे का अचार-कौन था वो चिरकुट या शायद रसमलाई रहा हो.

    अब खाना खाकर सुत रहेंगे. भिनसहरा में जागेंगे तब फिर से सुनेंगे. शायद कब्जियत मिटे. :)

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  3. मदनमोहन जी के यादगार नग्में की पंक्ति दुरुस्त कर लें-
    आज सोचा तो आंसू भर आए
    मुद्दतें हो गई मुस्कराए...

    रही बात आपकी, तो भर्राहट साफ महसूस कर रहा हूं। अवसाद भी झांक रहा है उसके पीछे से। ऊंचाई-वूंचाई कुछ नहीं , बस, मैं और मेरी तनहाई....

    मां नहीं , बाप नहीं, बेटा नहीं, बेटी नहीं
    तू नहीं , मैं नहीं
    ये नहीं , वो नही....
    कुछ भी नहीं रहता है
    रहता है जो कुछ
    वो...
    खाली खाली कुर्सियां हैं
    खाली खाली तम्बू है
    खाली खाली डेरा है
    बिना चिड़िया का बसेरा है
    न तेरा है, न मेरा है...

    उसके बाद वायलिन की एक लंबी उदास टेर और फिर ख़ामोशी...

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  4. बढिया है जी । यूं कहें कि दिल बैठा जाता है आपके गोभी पुलाव से । ऊद बिलाव से और दिल बहलाव से । :(

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  5. @वडनेरकर बाबू,
    ग‍लतिया सुधरवाने का शुक्रिया, सरकार, बाकी सुच्‍चायी या लुच्‍चायी तो आप सूंघै लिये हैं?

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  6. Dheeraj rakhiye aapke blog se kisee saarthak post kee talash jaaree hai aur talaash pooree hote hee ...of..messing aapko bhaane lagega aur aapke dil par chhane lagegaa.

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  7. @इरफ़ान प्‍यारे, सार्थक कैसे पोस्‍ट की? सार्थकता तो सब तुमने सस्‍ते शेरों के नीचे दबा लिया है, यहां, ससुर, फिर हम सार्थकता कहां से लायें?

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  8. कला पक्षा के बारे में कभी तरीके से तो नहीं पढा लेकिन इस पाडकास्ट में चिरकुट ही मुख्य नायक लगे । सामने गोभी पुलाव के नाम पर बकबक और पर्दे के पीछे चिरकुट की उसके हिसाब से बहुत काम की चीज को कहने की तडप !!! वाह क्या अंदाज है ।

    हैडफ़ोन लगाकर ही इस पाडकास्ट में चिरकुट के संवादों को ठीक से सुना जा सकता है ।

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