Friday, June 20, 2008

अभी-कभी कैसी पुकार..?

लगता है अभी कहीं कोई आवाज़ नज़दीक से पुकार रही है.. महीन, हल्‍की.. मैं कान गड़ाये सुनता हूं अब पहुंच रही है, कब पहुंच रही है.. पहुंचा ही चाहती है? लेकिन पहुंचती नहीं. या पहुंचती भी होगी तो मुंहअंजोर में नये पत्‍तों की सरसराहट, या दस महीने के बच्‍चे की सी फुसफुसाहट के किसी ऐसे झिलमिल दुश्‍वारियों में पहुंचती होगी जिसे मैं अपनी चेतना में थाह नहीं पाता.. गुज़र गयी के अचंभे और गुज़रेगी ही अभी-कभी की भोली उम्‍मीद में अकबकया उंगलियों पर पल गिनता हूं.. एक-दो-तीन.. तीन-दो-एक.. झपकियों, उनींदे, अचकचाये क्षणों के खालीपने को खाली-खाली-से सुरों से सजाता तकता रहता हूं, लेकिन नहीं आती. क्‍या, कौन, कैसी आवाज़ का फ़रेब है जिसमें धड़कते नंगे दिल को तश्‍तरी पर सजाये, कनपटी पर कोई अफ्रीकी नगाड़ा सुनता मैं बैठा होता हूं? कोई तुक है? क्‍या सुख है?..

जाने फिर भी क्‍या है कि उम्‍मीद की कमज़ोर, मलिन, कैसे-कैसे तक़लीफ़ों को जी चुकी डोंगी, छलावे के झिलमिल पानी में रात दर रात फिर-फिर बाहर निकल आती है.. कि आसगांव जायेंगे, उजासगांव जायेंगे. कल नहीं पाये तो क्‍या आज रस्‍ते में आवाज़ का वह जामुन भरा-भरा ज़रूर कहीं मिलेगा! पीछे कहीं कोई फीक़ी हंसी हंसके कहता है धत्‍त्! डोंगी हंसी को अनसुना करती पानी में छप्‍प् निकल चलती है..

मैं चेहरे पर हाथ फेरता बुदबुदाता हूं क्‍या आवाज़ है, कैसी आवाज़ है जो पुकार-पुकार रही है, और एक ज़रा सी दूरी पार नहीं कर पा रही?..

6 comments:

  1. guru jee, awajwaa kaa to pataa nahin mudaa aapkaa andaaze bayan to gajab hai mahaaraaj , majaa aa jaataa hai.

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  2. nahi samjhe na....ye Andar ki Awaj hai, kameej ka button thora dheela kijye kya pata nikal aaye ;)

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  3. लेकिन हम तो पहुंच गई है पुकार....।

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  4. shabdon ka jaadu kya hota hai..ise padhkar pata chata hai.

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  5. आवाज़ सच में महीन, हल्की होगी....बड़े दिनों बाद पतनशील से ऊँची बोल रही है....

    मन की गाँठ आप बहुत निपुणता से बाँधते हैं....

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