Tuesday, July 1, 2008

भाई मेरे.. या बहिनी.. चाहते क्‍या हो?..

आज पहली तारीख है, लेकिन लगातार हो रही बारिश का यह दूसरा दिन है. कम से कम मेरे शहर बंबई में तो यह दूसरा ही है, हो सकता है आपके यहां तीसरा हो.. और आपके उनके यहां चौथा? होने को यह भी हो सकता है कि पहली के बाद दूसरी के बाद तीसरी के बाद चौथी तारीख आये और गुज़र जाये और कुछ लोग पहली बारिश के इन्‍तज़ार में ही खिड़कियों पर ‘प्‍यासा’ वाले गुरुदत्‍त के अंदाज़ में ठोड़ी को हाथ में लिये बैठे-बैठे उदास होते रहें? या खड़े-खड़े? प्रकृति के तौर-तरीकों की सोचना शुरू कीजिये तो क्‍या बैठे और क्‍या खड़े, लेटे-लेटे भी आप तक़लीफ़ महसूस करने लगेंगे (मैं लेटे-लेटे ही कर रहा हूं). माने गौर कीजिये तो साफ़ दीखेगा (हो रही बरसात के धुंधलकेपने के बावज़ूद दीखेगा) कि ऐसा नहीं है कि ग्‍लोबलाइज़ेशन ही नहीं है जो ग़ैरबराबरी बढ़ा रहा है, प्रकृति भी उसके साथ बराबरी पर कदमताल मिलाने की कोशिश कर रही है!

कुछेक सौ वर्षों पहले, औद्योगिकीकरण और उपनिवेशों के बनने के पहले क्‍या था? ज़्यादातर जगहों पर कंगले रोते-गाते किसान थे, और उनके ऊपर हंसते-खेलते राजाओं की छतरी थी. औपनिवेशीकरण ने इस चिरंतनकालीन गणित को लंगी दे दी. परिणाम यह हुआ कि औद्योगिक मुल्‍को के ढेरों कंगले राजा हो गये, और तीसरी दुनिया के बहुत सारे जो राजा थे, वे राजा भले बने रहे हों, हंसना-खेलना भूल गए. अब ग्‍लोबलाइज़ेशन ने यही किया है कि औद्योगिक मुल्‍कों की चिरंतन-सी लगती सुकूनदेह जीवन-प्रणाली में एक नये अंदाज़ में सेंध मारी है. यह सेंध इस तरह मारी है कि काफी सारे कॉरपोरेशंस के सीईओज़ जो अपने देश में तो राजा थे ही, अब राजा के बाप हो गए हैं. और अपने देश में हुए-हुए इस बापगिरी को उन्‍होंने एक वैश्विक विस्‍तार दे दिया है! जबकि खायी-पियी-अघायी एक बड़ी आबादी अपना सारा हंसना-खेलना भूल सिर के बाल, हथेली पर दाल और अपने बैंकीय जंजाल गिन रही है. तो अमीर मुल्‍कों में जो लोकतांत्रिक-सामाजिक बराबरी का एक भरम बना हुआ था, ग्‍लोबलाइज़ेशन ने उसकी बखिया उधेड़ दी है. लेकिन साथ ही लेवलिंग का यह न्‍याय भी किया है कि गरीब मुल्‍कों में कुछ लोगों को भयानक अमीर बना दिया है. इतना अमीर बना दिया है कि वह पहाड़, जंगल और नदी खरीद लें. मगर साथ ही उसका प्राकृतिक बैलेंस यह भी किया है कि कुछ लोग जो पहाड़, जंगल या नदी किनारे रहते हुए मान रहे थे कि उनकी इन जगहों पर पारंपरिक रिहाइश चिरंतनकालीन वस्‍तुगत तथ्‍य है, वह अचानक अपने को वस्‍तुविहीन पा रहे हैं. अपनी गत के बारे में तो नहीं ही सोच पा रहे हैं. वही क्‍यों, आप और मैं भी कहां सोच पा रहे हैं?..

लेकिन इस ग़ैरबराबरी का कहीं कोई अंत है? माने ठीक है बाज़ार सामाजिक हितचिंता करने में असमर्थ है, वह सिर्फ़ अपने मुनाफ़ों और नये बाज़ारों के कब्‍जे के बारे में सोचेगी, मगर इस ग़ैरबराबरी को कम करने में प्रकृति का कुछ दायित्‍व नहीं बनता? मेरे यहां नल में पानी की किल्‍लत है, वहां पानी नहीं ला सकती थी? छत पर ला रही है जबकि वहां सूखा समस्‍या नहीं है, छत हरहरा कर (मेरी उमड़ी छाती की तरह) चूने लगती है समस्‍या वह है, और बड़ी भयोत्‍पादक है! लेकिन प्रकृति को कौन समझाये कि ग्‍लोबलाइज़ेशन कर रहा है, मार्केट का मारा है, मगर तुम तो यह ग़ैरबराबरी बढ़ाने में जरिया मत बनो, भई? या बहन?

सुनते हैं टोकियो में जगह की इतनी किल्‍लत है कि लोग आलमारी-सी जगहों में रहते हैं. बंबई में पहली के बाद दूसरी के बाद तीसरी के बाद चौथी तारीख तक बारिश का यही आलम रहा तो या तो मैं टोकियो शिफ़्ट होने पर मजबूर हो जाऊंगा, या अपने चूते हुए घर को आलमारी जितने जगह में बदलकर रहने पर. बात एक ही है. जबकि अफ्रीका में अभी भी इतनी जगह है, खुले मैदान हैं. उन मैदानों की कैसे चोरी करके टोकियो और बंबई में धंधा करके मिलियन और बिलियन डॉलर्स के वारे-न्‍यारे किये जायें, इसे बाज़ार देर-सबेर तो ख़ैर, सोचेगा ही, मगर उससे बड़ा सवाल है इस पर प्रकृति क्‍या सोचेगी? लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि पहली के बाद दूसरी तारीख को बंबई में तीसरे दिन की बारिश होती रही तो मैं कुछ सोचने लायक बचूंगा, या ओह, बह जाऊंगा?..

3 comments:

  1. टोकियो का टिकट खरीद लिया क्या? रिफण्ड ले ली जिये! बारिश कभी न कभी खतम होगी ही।
    आपका हिन्दी लिखा समझने में इतनी मशक्कत होती है; जापानी में लिखेंगे तो ऊपर से जायेगा बाउन्सर! :)

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  2. प्रकृति में कभी कहीं बराबरी नहीं रही है। बराबरी बराबरी वाला खेल केवल मनुष्य के परेशान मस्तिष्क (जो कभी बराबर नहीं होता)की उपज है। उसे प्रकृति की प्रकृति पर मत थोपिये। जापान मत जाइए,वहाँ बहुत भूकम्प आते हैं। बारिश का क्या कभी ना कभी बरस कर चलती बनेगी।
    घुघूती बासूती

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  3. अच्छा किया जो इधर ही रुक गये आप।टोकियो में किराया बहुत है कमरे का।

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