Wednesday, July 2, 2008

मनोरमा जहां गयी है.. या मुकेश!

कल बंबई की बरसात से घबराकर टोकियो भाग जाने की मजबुरियां बुन रहा था, लेकिन ज्ञानदत्‍त पांड़े और घुघूती बासुती ने मुझ-जन्‍य अन्‍य चिंताओं का स्‍मरण करवाकर मुझे खुद को, व खुद की किताबों को, पैक करने से रोक लिया. दोनों ही का आभारी हूं. क्‍योंकि सुबह आंख खुली है तो देख रहा हूं प्रकृति ने भी अपने को बहाने से रोक लिया है! और सीलन से सूखन की ओर बढ़ रही इस सुबह में पता नहीं मन अचानक क्‍यों भावुक हो रहा है. बिछौने और कुर्सी पर उड़ती मक्खियों को देखकर उन्‍हें मसलने की नहीं सोच रहा, न ऊपर के फ्लोर पर मरम्‍मत का पिछले सात दिनों से शोर कर रहे मजदूरों की मरम्‍मत करने की.. आईने के आगे खड़े होकर पूछने की इच्‍छा हो रही है चलो, इक बार फिर से अजनबी बन जायें. खुद से ही पूछने की हो रही है, आप तो पहले भी अपने कहां थे? और पता नहीं महेंद्र कपूर का सवाल मुकेश से पूछने को क्‍यों कर रहा है? लेकिन मन के खेलों का भला कोई निश्चित भूगोल है? कल्विनो के एक उपन्‍यास में दस जानर अपना खेल खेल सकते हैं, तो मन आठ दिशाओं में तो भटक ही सकता है? बारिश के ठहरने पर पता नहीं मन के किस निर्मल जल को जिलाये, मनोरमा को जंगल और पोखर की बहार में खोजने जा ही सकता है? कोई गया है भी. विमल कह रहे हैं मैं नहीं गया हूं. मैं घर बैठे-बैठे ही मनोरमा खोज रहा हूं! फिर मनोरमा के पीछे कौन गया है? सुनकर आप ही तय करें कौन गया है. हो सकता है मनोरमा की जगह जंगल और जल में आप पहुंच जायें? मुकेश की आत्‍मा भी मुक्‍त हो जाये?

1 comment:

  1. हम भी विमल बाबू की तरह ही नहीं गये हैं और यहीं बैठे हैं. :)

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