Thursday, July 3, 2008

आप दक्षिण गए हैं.. या उत्‍तर-पूर्व?..

चलिये, यही बताइये मन की रेल पर कहां-कहां तक निकल गये हैं? मैं क्‍यों नहीं निकल पाता?

रेल पर बैठा आदमी देर-सबेर किसी तयशुदा गंतव्‍य तक पहुंच ही जाता है (पहुंचता है न?), लेकिन मन की रेल किस मंज़ि‍ल पहुंचाती है? कब, किस उम्र में पहुंचती है.. कि, ओह, सिर्फ़ गोते खिलवाती है? फिर इतने गोते खा चुकने के बाद भी मन कहीं अटक क्‍यों नहीं जाता? चैन पाता? क्‍यों घरभूले कुत्‍ते की मानिंद इस गली और उस गेट को तकता भटका फिरता है? मानो किसी नौसीखिये संगीत-रसिक ने कोई बंद गुनगुनाना शुरू किया, और लरबराते हुए इस बंद से घबराकर उसमें, और वहां से निकलकर कहीं और पहुंचने को छटपटाया फिरे? बैंक और बाज़ार, डेंटिस्‍ट, दफ़्तर और दिखावे के व्‍यवहार से जुदा पहुंचने की और जगहें क्‍यों नहीं? नहीं होंगी. क्‍यों नहीं होंगी?

इसलिए कि हम ‘जगही’ सभ्‍यता नहीं. अंग्रेजों से पहले मालूम नहीं हममें कितना नगरबोध था, मगर अब इतना ज़रूर साफ़ दीखता है कि अंग्रेजों के जाने के बाद इस मुल्‍क में नगर रहे हैं, न सार्वजनिक जीवन में जगह (स्‍पेस) बोध (नई अर्थनीति की परिपक्‍व समझ में जिन दो शहरों- बंगलोर और गुड़गांव- पर खूब रेलमपेली में पैसा बहाया गया, प्‍लेट में सजाकर उन्‍हें राष्‍ट्रीय अख़बारों के रंगीन सप्‍लीमेंटों में नई सजावटों की तरह पेश किया गया.. वह पहले पता नहीं जो रहे हों, अब कायदे से, न गांव हैं, न गोबर. नयी उम्‍मीदों के माप को पूरते नये शहर तो नहीं ही हैं. विकास का ऐसा कोई आदर्श शहर सरकार ने खड़ा नहीं किया जिसे देखकर हम उम्‍मीद की बारिश में नहायें, अलबत्‍ता ऐसी जगहें ज़रूर खड़ी की हैं कि वहां पहुंचकर 'जगहहारा' महसूस करें, पगलायें!).. लेकिन मन इस ‘जगहविहीन’ तथ्‍य को स्‍वीकार के ऐसा नहीं कि स्थिर व मृतप्राय हो जाये, जाता है.. सिर के बाल से ज़रा ऊपर, हवा में तैरता जाने कहां-कहां की लुलु रुमानियत में डूबा रहता है..

पंखे के घर्र-घर्र के शोर के बीच दीवारों के दरमियान रुई के फाहों की तरह बेआवाज़ बुनता, जाने किस नशे से निकलकर किस नशे में उतरता फिरता है.. पूंछ में पटाखे बांध दिये जायें तब चैन पड़ जायेगा इस खुराफाती को? या गर्दन में दुनियायी देनदारियों के काग़ज़? तब? क्यों लगता है कि ऐसे नासाज़ को एक कोने बैठाने, चुप कराने का इससे अलग और कोई तरीका नहीं कि सीधे अफीम की गोली खिलाकर बेहोश कर दिया जाये? अफीम की गोली ही इसकी बेरहम बेहाली की बहक को रास्‍ता दिखानेवाली पतवार साबित होगी? मगर ताब और मौज दिलानेवाली दिलदार साबित हुई, तब?..

सुनते हैं नशे में राजा नंगा हो जाता है, और भिखारी सुलतान.. लेकिन दोनों एक ही सिक्‍के के दो पहलू नहीं हैं? उफ़्फ़, मैं भी क्‍या बहक बतिया रहा हूं? अफीम की गोली तो दूर, हमने अफीम का पौधा देखा है? हिमाचल में कभी चरस का देखा था.. लेकिन उसके असर में दायें चलते-चलते ब्रह्मपुत्र के किनारों तक पहुंच जाऊं, असम को देख आऊं, वह वर्षों पहले तब हुआ था, न आज तलक और अब हुआ है. एक मित्र ने अलबत्‍ता दस दिन गौहाटी में गुज़ारकर वहां की कुछ मीठी कहानियां ज़रूर सुनाई हैं.. कि संगीत का कैसा ‘रूटेड’ और ‘इंडिपेंडेंट’ परिदृश्‍य है, बहुत सारे बच्‍चे हैं जिन्‍होंने बंबई और दिल्‍ली में पढ़ाई की, लेकिन मौकों के मुहैय्या होने के बावज़ूद, बसना और काम करना अपने प्रदेश में रहकर ही करना मंज़ूर किया.. इसी तरह के और अपने में विश्‍वास व भरोसे के निजी व छोटे गुटीय क़ि‍स्‍से थे.. और मैं बहका-बहका सुनता रहा. क्‍योंकि अपने राष्‍ट्रीय नेटवर्क, मीडियामहल पर हम असम और उत्‍तर-पूर्व की मीठी तो क्‍या, फीकी कहानियां भी कहां सुनते, पढ़ते या देखते हैं? टीवी पर ख़बरों को देखते हुए तो यही लगता है मानो इस देश में चार-पांच राज्‍य हैं, और वहीं और वही सब ख़बरें हैं (कभी-कभी तो टीवी को देखकर घबराहट और संशय के क्षणों में यह भी लगता है मानो दिल्‍ली, नोयेडा और बंबई ही अपने मीडियामहल के लिए समस्‍त देश हों.. सभी ख़बरों की अजस्‍त्र स्‍त्रोतस्विनी हों.. कलकत्‍ता और चेन्‍नई तक इनके सोये दिमाग में कभी कहां आता और उभरता है?)..

बाकी के भूगोल की याद इस राष्‍ट्रीय मानस को कहां आती है? तभी आती है जब किसी बड़े स्‍तर के स्‍थानीय गंडगोल से रूबरू होना पड़े.. या दिल्‍ली की बेरूखी से फट पड़े किसी हलके में इस देश से अलगाव की बातें उठने लगे.. तब अचानक हमारी सुन्‍न चेतना- मानो अफीमी पिनक में- एकदम से उत्‍तर-पूर्व के ज़ाहिलों को राष्‍ट्रीयता की बेसिर-पैर की भावुकता में नहलाने को अकुलाने लगती है.. और फिर जल्‍दी ही, फटे पड़े को तोड़ और फोड़ कर अपने दंभी, पुराने उनींदेपने में वापस ऊंघने भी लगती है.

जबकि मैं उनींदेपने से अजबजाया उठकर वापस बहकने लगता हूं. थाहने, और थोड़ी देर बाद थककर समझने की कोशिश में फिर-फिर थकता कि इस बहक का भूगोल क्‍या है. मंज़ि‍ल?

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