Friday, July 4, 2008

चीन की दीवार..उनींदे की एक जुगलबंदी

सच कहूं तो मैंने कभी चीन की दीवार देखी नहीं है. सपने में भी नहीं. कोई गाढ़े नीले पंखोवाली चिड़ि‍या उसके ऊपर से उड़ती आकर कभी मेरे जंगले पर बैठी हो, ऐसा भी नहीं हुआ. हुआ होता तो मुझे ख़बर होती. उसके गाढ़े नीलेपने की पहचान से नहीं, जंगले पर बैठने की टेक की उसकी अस्थिर बे‍चैनियों से मैं भांप लेता कि उसका अचक्‍के ज़ाहिर होता संताप बदला मौसम नहीं, चीनी हरितिमा के सुकून से निकलकर मेरे निर्मम धूसरपने में दाखिल होना है. लेकिन, चिड़ि‍ये की मार्फ़त ही सही, मैं चीन की दीवार तक पहुंचूं ऐसा हुआ नहीं है. ऐसा भी नहीं कि दम साधे, आंखें खोले सड़क-बाज़ार हर घड़ी बारीकी से चीनी चिड़ि‍यों की टोह में रहता होऊं. चीनी तो चीनी, भारतीय चिड़ि‍यों का भी सड़क-बाज़ार में होश कहां रहता है? और सबसे ज़्यादा आंखें तो बाज़ार में ही मुंदी रहती हैं. लगता है नशे की कोई चांदनी है जिसके नीचे बेसुध, हिप्‍नोटाइज़्ड एक शीशे की दीवार से गुज़रकर दूसरे शीशे के बीच मैं खुद और दुनिया के दरमियान किसी पहचान को टटोलता भटकता फिर रहा हूं.. मगर देखिये, फिर भी कैसा अजब दुर्योग है कि इस नहीं देखे, नहीं जाने के सीमितलोक में भी अड़ि‍यल, बेहया दीवार कैसे चलती-चली आ ही जाती है! और बाज़ार में किसी शीशे की दीवार से टकराकर उसके चले आने से मन ख़बरदार नहीं होता- नहीं, शीशों में तो कहीं किरिच तक नहीं दरकता- कोई अन्‍य परदा होता है, अदृश्‍य, जिसकी चोट की चपेट में लड़खड़ाये कदम, अचकचाये, सुस्थिर होने को सहारे के लिए हवा में दायें-बायें टोहते हैं, और एकदम-से अहसास होता है सामने हवा नहीं- चीन की दीवार है!

और यह कि बाज़ार के बीस और पच्‍चीस हज़ार वर्गमीटर से बहुत ज़्यादा दूर तक पसरी और लंबी है- चीन की दीवार! और उसकी मोटाई, घनत्‍व और विकरालता के आगे मैं बहुत बौना औ’ एकदम बेमतलब हो गया हूं. सामान्‍य दीखने की एक हारी कोशिश करता, थूक गटकता मैं पड़ोस में शीशों का मुआयना करने से थोड़ी फ़ुरसत लिये व्‍यक्ति की नज़रों में पढ़ने की कोशिश करता हूं कि चीन की दीवार की कोई चोट उन आंखों में है या नहीं?.. और फिर उसके बाद उनकी नहीं, मेरी आंखों में एक भारी धुंधलका चढ़ता चला जाता है..

शायद दीवार के उस पार बैठा डॉक्‍टर अपनी सहूलियत के लिए मेरी उद्वि‍ग्‍नता को पैरानॉया का नाम दे दे, क्‍योंकि दीवार के इधर, किसी परिचित से अंतरंगता की लम्‍बी बातचीत के बाद, मुझे यही लग रहा है कि बातचीत की हंसियों में हम भले साथ-साथ रहे हों, लेकिन बतरस के खत्‍म होते ही पहली अनुभूति सचमुच यही हुई कि हमारे अजाने जाने कब हमारे बीच दीवार आकर खड़ी हो गयी है. परिचित की आलोचना नहीं कर रहा, उस दीवार के फैलने और बढ़ते चले जाने की भौतिकता को थाहने की कोशिश कर रहा हूं, जिसको रोकने की सजग समझ या रणनीति की गुप्‍त किताब कहीं कोई तैयार करता नहीं दीख रहा.

एक बैंक है जो पागलों की तरह न मांगे, न इस्‍तेमाल किये गये क्रेडिट कार्ड व अपनी बैंकिंग सेवाओं के मुझ पर बकायों की नियम से मुझे सूची भेजता रहता है. मैं दूकान में पिछले वर्ष तीस रुपये के अंबेमोहर चावल को अब पैंतालिस रुपयों की डेढ़ गुना कीमत पर खरीदते हुए बैंक के पागलपने को भूलने की कोशिश करता हूं. बाजू में कहीं चीन की दीवार फुसफुसाती है कि राजेंद्र यादव के उपन्‍यास (सारा आकाश) का शीर्षक झूठा है, तो भी किताब के मुखपृष्‍ठ की भावुकता में नहाये मेरे मन तक वह फुसफुसाहट पहुंचती नहीं..

मगर फिर थोड़ी देर बाद, घर लौट कर और दरवाज़े की सांकल चढ़ाकर भीतर बंद हो जाने के बाद ऐसा नहीं कि मैं निश्चित हो जाता हूं. तनी हुई ख़ामोशी के बाद धीमे-धीमे दीवारों का फुसफुसाना, मेरी नज़रों को धोखा देने में असफल होकर हवा में फैलकर फिर तैरने लगना, ऐसा नहीं कि मेरी आंखों पर पट्टी चढ़ाये मुझे आश्‍वस्‍त किये रहता है. नहीं, मैं जानता हूं उन तैरती दीवारों के बीच, धीमे-धीमे चीन की दीवार बन रही है, और देर-सबेर बाहर से लौटकर दरवाज़े से होता मैं अपने घर में दाखिल ज़रूर होऊंगा.. लेकिन भीतर मेरा घर नहीं, चीन की दीवार होगी!



(पॉडकास्‍ट के शब्‍दचित्र प्रत्‍यक्षा की कल्‍पना की कसरत है. ऊपर इस्‍तेमाल की गयी तस्‍वीर पाने की कसरत घोस्‍टबस्‍टर के आज के पोस्‍ट की सौजन्‍यता से संभव हुई. उनका आभार)

3 comments:

  1. लिखे हुए को बांच कर बढ़िया बढ़िया ही लिख पा रहा हूं। सुन नहीं पाया क्योंकि इयरफोन जवाब दे गया। नया आएगा तब सुना जाएगा और अश अश कहा जाएगा।

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  2. लेख् धांसू है। लेकिन् पाडकास्ट् सुनते हुये ऐसा लगा जैसे बच्चा कोई होमवर्क कर् रहा हो। अजदकी लटके झटके होना मांगता पाडकास्ट् में।

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