Saturday, July 5, 2008

किसे हिंदी की ज़रूरत है?

दिल्‍ली के बारहवीं पास छात्रों में बतौर ऑनर्स हिंदी चुनने में अनिच्‍छा पर मसिजीवी का दुख देखा. लेकिन मुझे दुख की कोई तुक नहीं दिख रही. भई, समूचा देश जब अंग्रेजी की बरसात में भींज-भींजकर नाइके और मैकडॉनल्‍ड का हो-हो जाना चाहता है, बेचारा बच्‍चा हिंदी विभाग की चिरकुटइयों में आखिर क्‍यों सिर घुसायेगा? फंसायेगा? बस इसीलिए कि किसी हिंदी हुलुलु चैनल के टनल में स्ट्रिंगर की ठौर पायेगा? हिंदी का झुनझुना थामने को इतनी वजह पर्याप्‍त वजह है? आज के उपयोगितावादी समय में जबकि इंजीनियरिंग कॉलेज़ेस तक में नियुक्ति के लिए खोजने पर शिक्षक मिल नहीं रहे (दो दिन पहले महाराष्‍ट्र पर ऐसी ही एक रपट देख रहा था. शिक्षक इसलिए नहीं मिल रहे थे कि शैक्षिकाना नियुक्तियों की तुलना में कॉरपोरेट नौकरियों में उन्‍हें दो से तीन गुना ज़्यादा तनख़्वाह मिल रही थी, और इससे ज़्यादा पा लेने का वे सपना पाले हुए थे), बच्‍चा क्‍या खाकर हिंदी ऑनर्स पढ़ने की हिम्‍मत करेगा? कॉरपोरेट नौकरियों में पहुंचने का सपना पाल कर तो हिंदी नहीं ही पढ़ेगा. हां, कहीं किसी कॉलेज में हिंदी का मास्‍टर होने का सपना पाल रहा हो तो अलग बात है. तब भी शायद सीधे हिंदी ऑनर्स में जाने की बजाय बच्‍चा असमंजस में जाये?

विनय ने कुछ दिनों पहले विश्‍व वयस्‍क साक्षरता के आंकड़े एक खोज से संकलित किये थे. नीचे के बीस मुल्‍कों में भारत का स्‍थान पहला है! ऊपरी शीर्ष के पंद्रह देशों में वयस्‍क साक्षरता के प्रतिशत पर एक नज़र मारिये- एस्टोनिया: 99.8%, लातविया: 99.8%, क्यूबा: 99.8%, बेलारूस: 99.7%, लिथुआनिया: 99.7%, स्लोवेनिया: 99.7%, उक्रेन: 99.7%, कज़ाख़िस्तान: 99.6%, ताजिकिस्तान: 99.6%, रूस: 99.5%, आर्मेनिया: 99.5%, तुर्कमेनिस्तान: 99.5%, अज़रबैजान: 99.4%, पोलैंड: 99.3%, किरगिज़स्तान: 99.3%. इन सभी देशों में वहां की अधिकारिक भाषा वहां के लोगों की स्‍थानीय, उनकी अपनी मूल ज़बान है (यह महज़ संयोग है कि क्‍यूबा समेत ज़्यादा मुल्‍क पुराने सोवियत रूस- व इस तरह से प्रगतिवादी शिक्षा नीति का हिस्‍सा रहे हैं?) हमारी मूल ज़बान क्‍या है? हमसे तो मत ही पूछिये, क्‍योंकि शहर में रहनेवाले हम थोड़ा-थोड़ा चार ज़बानें भले जानते हों, अपनी ज़बान का विचार हमारे दिमाग़ से पता नहीं कब का उड़ चुका है! और उड़ा ही हुआ है. सच पूछिये हमारा बस चले तो, हम तो यही चाहेंगे कि हमारी- हमारे समूचे खानदान की- मूल ज़बान अंग्रेजी ही हो जाये!

हमारे यहां हिंदी की किसे ज़रूरत है? सचमुच है? पुराना और मशहूर क़ि‍स्‍सा है एक मर्तबा यूपी में रेल से गुज़रते, तब देश के दुलरुआ बने हुए नेहरू को निराला ने कुछ बेशर्मी और काफी ठेलमठाली करके एक संवाद के लिए किसी तरह पकड लिया. आगे की कहानी है कि निराला नामधारी इस महाकवि के अस्तित्‍व से अब तक अनजान, और उनकी जबरिया के ऐसे संवादी कोशिश से अभी-अभी परिचित हुए नेहरू, अपनी भाषायी नीति पर निराला का गुबार सुनते रहे, निराला और-और सुनाते रहे, मगर नेहरू गुमसुम और चुप बने रहे, मुंह खोलने की ज़रूरत महसूस नहीं की, और इस चुप्‍पी में ही महाकवि निराला व जनप्रिय नेहरू का वह महत्‍वपूर्ण व ऐतिहासिक संवाद समाप्‍त हो गया! बड़े कॉंटेक्‍स्‍ट में सोचने की कोशिश कीजिये तो हिंदी व अंग्रेजी के बीच सारे महत्‍वपूर्ण व ऐतिहासिक संवाद, कमोबेश, इसी शक्‍ल में समाप्‍त होते रहे हैं. हिंदी मंचों से समय-समय पर जो कुछ बोला जाता है, अंग्रेजीवालों के लिए वह एक क्षेत्रीय क्षोभ व सनकी गुबार से ज़्यादा कभी कुछ कहां होता है? (हिंदीवाले भले अपनी भावुकता में उसे संवाद मानते रहें, अंग्रेजीवालों के लिए वह महज राजनीतिक सामयिक ज़रूरत होती है जिसे वह कड़वी दवा की तरह पी भले लेते हों, करते अंतत: अंग्रेजी मानस की ही हैं)

कभी-कभी हिंदी वालों तक के लिए नहीं होता. एक समय था हिंदी प्रदेशों के देहातों की स्त्रियां तक राजीव गांधी की लैपटापी हिंदी पर वारी-वारी नहीं जा रही थीं? मनमोहन सिंह पता नहीं कैसी और कौन सी हिंदी बोलते हैं. उसे जानने के लिए हिंदी खबरी चैनल्‍स देखने होंगे, और उन्‍हें देखने की, माफ़ कीजिये, मुझमें हिम्‍मत नहीं है. यह जानने की तो और नहीं है कि पी चिदम्‍बरम कौनवाली हिंदी के मार्फ़त भारत के कॉरपोरेटाइज़ेशन की गोटियां पीट और सेट कर रहे हैं. ऐसे इंडिया में कौन-सा खाद खाकर बेचारा बच्‍चा हिंदी ऑनर्स की सनक चढ़ेगा? क्‍यों चढ़ेगा? अपनी ज़बान वाली शिक्षा से देर-सबेर देश के वयस्‍क साक्षरता आंकड़े फिर सुधर नहीं जायेंगे? मगर फिर शायद देश के कॉरपोरेटाइज़ेशन के आंकड़े बिगड़ने लगें?

धर्मवीर भारती ने हिंदी में ‘धर्मयुग’ बनाया, अपने बेटे को हिंदी वाला नहीं बनाया. उसे हिंदी की चिरकुटइयों से दूर अमरीकी बयारों, बहारों में भेजना ही वाजिब समझा. ज़्यादातर हिंदी बनानेवालों के घरों के यही अंतरंग क़ि‍स्‍से हैं (हिंदी की राजनीति करनेवालों के भी हैं, मुलायम सिंह के बेटे ने पढ़ाई मुरैना में रहकर नहीं की, बेटे की पढ़ाई के लिए बाबू को वाजिब जगह अंग्रेजों की ऑस्‍ट्रेलिया ही लगी). भावुक मत होइये, किसी को हिंदी की ज़रूरत नहीं है.

(ऊपर की तस्‍वीर: अंग्रेजी के मार्फ़त हिंदी. इसी और इतने में ही हिंदी का गुजारा है)

20 comments:

  1. पढने लिखने के भले ही हिन्दी की जरुरत न हो सर जी पर हंसने बोलने ओर रोने पीटने के लिए हिन्दी की जरुरत हमेशा रहेगी...फ़िर चिरकुट जैसे शब्द कौन पढेगा भला?
    वैसे भी धर्मवीर भारती गुनाहों का देवता ओर अँधा युग लिख कर भले ही लेखक होने की पदवी पा गए हो पर अच्छा इन्सान होने की पदवी सिर्फ़ लिखने से थोड़े ही मिल जाती है ?किसने कहा उन्हें आदर्श पुरूष.....राजेंदर यादव को देखिये.....मन्नू भंडारी ने चिथड़े उडा दिए है .....

    ReplyDelete
  2. बिल्कुल सही कह रहे हैं। हमें भी नहीं ही है। बस हिंदी सुनकर, विशेषकर पढ़कर, खोई माँ मिल गई जैसा आभास होता है और हम पढ़े जाते हैं। सच तो यह है कि अंग्रेजी पैसा कमाने वाले पिता सी है और हिंदी पुचकारने, लाड़ लड़ाने वाली माँ सी। आखिर जीत तो पैसे की ही होती है ना !
    घुघूती बासूती

    ReplyDelete
  3. हिन्दी पिता हिन्दी पुत्र नही चाहता . बहुत सही लिखा है आपने .
    हिन्दी अनुवादक की आय हिन्दी अन्वेषक से अधिक है .

    ReplyDelete
  4. घूघूती जी द्वारा दी गयी उपमा
    एकदम सटीक है, मैं सहमत हूँ !

    ReplyDelete
  5. अरेए हमारी सुबह सवेरे की चिरकुटई पर आप तो नाहक ही भावुकिया गए। हम भी शायद चिंतित अपनी रोजी रोटी के ही लिए हो रहे होंगे...अब पढ़ने वाले बालक नहीं मिलेंगे तो हम चिरकुट मास्‍टरों को भला वे क्‍यों पालेंगे (तिस पर गूगल ने एडसेंस भी बंद कर दिया...हमारा कया होंगा बु हू हू हू :))


    अब अगर हम हिंदीवाले अपनी रोजी की चिंता कर रहे हैं तो वे नौनिहाल भी तो अपनी करेंगे कि नहीं।

    ReplyDelete
  6. बिल्कुल सही कह रहे हैं.सही लिखा है,

    ReplyDelete
  7. हिन्दी की अवस्था पर आपकी राय से सहमत. वैसे भी हिन्दी को आधुनिक तकनीक या नवीनतम ज्ञान के लिए पिछड़ी हुई भाषा का दर्ज़ा दे दिया गया है.
    डॉक्टर अनुराग जी से इतना कहना है कि 'अंधा युग' तो ख़ैर; श्रेष्ठ संगीत नाटक है लेकिन 'गुनाहों का देवता' एक लिजलिजा उपन्यास है.

    ReplyDelete
  8. घुघुती जी की बात से शत प्रतिशत सहमत फिर भी पैसे के अलावा मन की शांति के लिए प्यार और सकून की अहमियत को नकार नहीं सकते...!

    अर्थ जगत में हिन्दी का महत्त्व हो न हो लेकिन सामाजिक जीवन में इसकी ज़रूरत हमेशा रहेगी.

    ReplyDelete
  9. इस तरह से 'भेड़-चाल' का विज्ञापन करने के लिये किसी 'विचारशील' के उद्बोधन की जरूरत नहीं होती है। यह तो मूरख से मूरख को भी आंख मूंदकर दिखायी पड़ जाता है।

    लेकिन धारा के विरुद्ध चलना और चलने के लिये प्रेरित करना बिरले ही कर पाते हैं।

    प्रेमचन्द्र, धर्मवीर भारती, मुलायम सिंह, लालू यादव आदि ने हिन्दी के माध्यम से जो स्थान अर्जित कर लिया, उनके अंग्रेज पुत्र-पुत्रियाँ अंग्रेजी के माध्यम से सपनों में भी नहीं कर पायेंगे।

    हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं की दुर्गति इसलिये हो रही है कि बड़े ही कृत्रिम तरीके से उन्हें रोजगार से बिल्कुल अलग कर दिया गया है। इसमें हिन्दी का दोष नहीं है, यह एक नीति का दोष है। 'खेल के नियम' बदलने की जरूरत है, वे समान अवसर के सिद्धान्त की सरासर अवहेलना कर रहे हैं। मान लीजिये सरकार कल यह नीति बना दे कि सभी इंजीनियरिंग कालेजों की प्रवेश परीक्षा में तकनीकी हिन्दी शब्दावली पर १० अंक के प्रशन जरूर रहेंगे; देखिये यह शब्दावली हर बच्चे को आजीवन मौखिक याद रहेगी।

    ReplyDelete
  10. रायजी से हम भी सहमत हैं..

    ReplyDelete
  11. मैं भावुक नहीं हो रहा हूं। लेकिन, हर रोज मुझे काम करते-हिंदी अज्ञानी लोगों से जूझते ये समझ में आता है कि हिंदी की बड़ी जरूरत है। हां, हिंदी के साथ अंग्रेजी भी आती हो तो, भला।

    ReplyDelete
  12. दूसरों के बारे में तो नहीं जानती लेकिन मुझे हिन्दी हमेशा अपने दिल के बेहद करीब लगती है। हिन्दी में पढ़ना, बोलना, गुनगुनाना सब उतना ही सुहाता है जितना मां की गोद में सिर रखना। हिन्दी का अपना ही नशा है और हो भी क्यों ना ये हमारी अपनी भाषा है।

    ReplyDelete
  13. हम भी चिंतित हो गये।

    ReplyDelete
  14. हिंदी पर रोना अच्छा है. लेकिन इससे भी ज्यादा अच्छा है हिंदी पर खुश होना... और हिंदी पर कुशी मनाने के कम कारण नहीं है. भारत बहुत बडा देश है हर किसी को अपनी भाषा बहुत प्यारी है. नीरसता में भी रस होता है. प्रधानमंत्री पर आपकी टिप्पणी से सहमत नहीं हूँ...

    ReplyDelete
  15. इतनी निराशा क्यूँ? आपमें से अधिकतर दिन भर कम से कम हिन्दी सुनते तो हैं. काफी मौके होते हैं, जब हिन्दी मे लिखे, बोर्ड, नाम आदि लगातार पढ़ते रहते हैं. यहाँ तो किताब न खोंलें या ब्लॉग पर न जायें तो घर छोड़ कहीं न तो हिन्दी सुनाई देती है और न दिखाई देती है फिर भी पूरा विश्वास है कि हमारी भाषा एक दिन पूर्ण विस्तार प्राप्त करेगी. उसी दिशा में, एक उम्मीद के साथ छोटा से छोटा जितना बन पाता है, योगदान करते रहते हैं. इन सब बातों का रोना रोकर तो कुछ भी हासिल नहीं. स्थिति चिंतनीय हैं लेकिन उम्मीद पूरी है. हम सब बस उत्साह से अपना काम करते चलें.

    ReplyDelete
  16. ज़्यादातर हिंदी बनानेवालों के घरों के यही अंतरंग क़ि‍स्‍से हैं (हिंदी की राजनीति करनेवालों के भी हैं, मुलायम सिंह के बेटे ने पढ़ाई मुरैना में रहकर नहीं की, बेटे की पढ़ाई के लिए बाबू को वाजिब जगह अंग्रेजों की ऑस्‍ट्रेलिया ही लगी). भावुक मत होइये, किसी को हिंदी की ज़रूरत नहीं है.
    ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
    अमरीका या ओस्ट्रेलिया मेँ रहते हुए भी अगर हिन्दी से और अपनी सँस्कृति से उतना ही लगाव रहे तब क्या कहेँगेँ ? या परदेस मेँ रहते हुए भी अगर हिन्दी के लिये पुरस्कार मिले तबु से क्या कहेँ ? कोई कहीँ रहे वह निजी कारणोँ से होता है - इसमेँ हिन्दी या भारत के प्रति चाह कम होना जुरुरी नहीँ - ये मेरा मत है --

    ReplyDelete
  17. मेरी बहकी हुई भाषायी चिंताओं में सहभागी होने का आप सभी साथियों का शुक्रिया.

    @बाबू अनुनाद, @जालिम महोदय, @समीरजी, @लावण्‍याजी, मेरी मंशा न पिटे हुए को पीटने की सनसनी फैलानी थी, न हिंदी क्‍या हो सकती है की संभावावनाओं से चमत्‍कृत होने की है.. और परदेश में रहते हुए वे जो बिलबोर्डों और बोलचाल की अनुपस्थिति से यूं ही पहले से अनमने रहते हैं, उन्‍हें उदास करने की तो कतई नहीं थी.
    किसी तरह से ऐसा हुआ लगा हो, तो क्षमा चाहता हूं.

    ReplyDelete
  18. हिन्दी की जरुरत तो किसी को नहीं है ये सच है... टीवी पत्रकारिता ने थोडी संभावना जरूर बढाई है... पर आपका कहना सच है.

    ReplyDelete
  19. आप के प्रश्न अक्सर सोचने को बाध्य करते हैँ !
    क्षमा माँगने जैसी कोई बात ही नही लिखी आपने -
    विश्व के कई ज्वलँत प्रश्न पर विचार और सोच और दिशा की खोज इसी तरह शुरु भी तो होती है -
    निस्चिँत होकर लिखते रहेँ ..
    सद्भाव सहित ,
    सादर, स स्नेह,

    - लावण्या

    ReplyDelete
  20. क्या करें, हमें तो हिंदी के सिवा दूसरी भाषा आती ही नहीं है. भूख से मरने से बेहतर है, एकबारगी आत्महत्या कर लें, पर ये अंग्रेजी कानून आत्महत्या को भी अपराध मानता है. क्या अपनी आत्मा पर भी अपना अख्तियार नहीं.

    ReplyDelete