Tuesday, July 8, 2008

मैं वही, वही बात, नया दिन, नयी रात..

डाऊनटाउन भले अपने में गुलज़ार, उमगता, सात एंगलों में सजता चलता हो, सबर्ब के कचर-मचर में उलझे, गोता लगाते हमारे जीवन में डाऊनवर्ड्स के तेज़ लीप्‍स जितने हों, टाउनवर्ड्स के कहां हैं. फिर (हमारे मन के ही अनुरूप) देह की चंचल विस्‍तारता व उपनगरीय रेलों की मारक दुर्बेधता का ऐसा अनूठा मेल है, कि शहर जाना कहां हो पाता है. रेल के अंदर तो कोई मेरा डबल होगा जो सालान-छमाही कभी उसके मार्फ़त शहर का रूख करता हो, मैं खुद तो ‘यादों की बारात’ के धर्मेंद्र की तरह रेल की छतों पर से दौड़ता हुआ भी नहीं करता..

ओह, गुनी ज्ञानदत्‍त जी सलाह दे रहे हैं फिर भी मैं अपनी (चिरंतन की?) आत्‍मलीनता और नाटकीयता से बाज नहीं आ रहा. मगर इसका पॉडकास्‍ट नहीं बनाया, वह काफी नहीं? इस छोटे से जीवन में क्‍या कितना काफी है का अंदाज़ अब कभी ठीक-ठीक हो भी पायेगा? लड़ाइयां लड़ने को, छलांगें मारने को और प्रेम व जाने क्‍या-क्‍या की चोटें मुंह पर लेने को.. मतलब जीवन जो जीने को बचा है, उसका अंदाज़? ख़ैर, उसका तो क्‍या होगा, किताबें ही जो पढ़ने को बची हैं, उन्‍हीं का अंदाज़? हो पायेगा? या तोड़-तोड़कर जो मैं वाक्‍य जोड़ता चलता हूं, इस आदत से उबरने, निजात पाने की किसी तय तिथि का?..

ओह, चूल्‍हे में जाये सब! खामख़ा लोग चढ़ाते, चढ़ाके उतारते माने खामख़ा बहकाते रहते हैं!.. या शायद मैं ही हूं कि बहकता रहता हूं. और दुखों के काले-काले इतने सारे घनेरे बादल हैं, फिर भी, देखिये, हर वक़्त बेमतलब दांत निपोरे, चहकता रहता हूं. अभी ही नहीं, कल भी वही कर रहा था, किसी बच्‍चे की एसी वाली गाड़ी में लदकर शहर जाने का मौका मिला तो रास्‍ते भर रहा. चहकता. हालांकि रास्‍ते भर गले में अजगर की माला चढ़ाये ‘ख़तरों का खिलाड़ी’ अक्षय कुमार और ‘कहानी हमारे महाभारत की’ (‘कहानी हमारे’ और ‘की’ 6 पॉयंट और ‘महाभारत’ 84 पॉयंट साईज़ में) के भीमकाय बिलबोर्ड्स बाज़ार कितना आक्रामक हो रहा है की धारणाएं बुनते मेरे उत्‍साह को पस्‍त करने की पुरज़ोर कोशिश कर रहे थे, लेकिन मैं भी बेशर्म पूरी तरह ध्‍वस्‍त हो जाऊं की जगह, बार-बार ‘सतह से उठता आदमी’ हो जा रहा था.

इसी उठे हुए मानस में यहां होते और वहां हवाते बालार्ड पायर ऑरियेंट लॉंगमैन की किताबों की दुकान पहुंचा. इमारत अपनी जगह सलामत थी मगर दुकान, पता चला, इस अप्रैल से बंद की जा चुकी है. यानी एक और पुराना किताबी सेटलमेंट नयी ज़रूरतों के आगे होम हुआ! ठीक बगल में लगे ऑरियेंट के प्रशासनिक और मार्केटिंग दफ़्तर के रिसेप्शन पर बैठी महिला से मैं अपनी झुंझलाहट ज़ाहिर करने लगा तो वह मुस्‍करा कर बताने लगी कि शो विंडो और किताबों की प्रदर्शनी नहीं है तो क्‍या हुआ, सामने कैटलॉग में उनकी लिस्‍ट है, ऊपर स्‍टोररूम में किताबें हैं, स्‍पेस मैनेजमेंट का समझदार एक्सिक्‍यूज़न है, मेरी दिक़्क़त क्‍या है? मैं महिला से कहना चाहता था अंधेरी से इतनी दूर किताबों को देखने, छूने, टटोलने के मोह में आया था, लेकिन इस कहने का अब क्‍या मतलब बनता? जिस तरह से ‘यादों की बारात’ के धर्मेंद्र की तरह रेल की छत पर चढ़ने से रह गया था, उसी तरह से रिसेप्‍शन की महिला से भी पूछते-पूछते रह गया. मतलब नहीं बनता..

जिसका बनता वह करवाया. साथ के बच्‍चे को जदुनाथ सरकार की ‘द फॉल ऑफ़ मुग़ल एंपायर’ और खुद को हर्ष दामोदरन की ‘इंडियाज़ न्‍यू कैपिटलिस्‍ट्स’ खरीदवाई.

कब और क्‍या-क्‍या पढ़ेगा आदमी, कुछ अंदाज़ है मुझे? अभय ने कल हाथ में अरविंद अदिगा का पहला उपन्‍यास ‘द व्‍हाइट टाइगर’ भी थमा दिया कि लो, इसे भी झेलो.. मगर मैं असमंजस में हूं एक छोटे से जीवन में अंतत: कितना कुछ ठिल सकता है, ठिलेगा? आदमी कितना झेल सकता है, झेलेगा?..

5 comments:

  1. प्रमोदजी, छोटे से जीवन में आदमी बहुत कुछ ठीलेगा भी और झेलेगा भी, लेकिन आप तमाम परेशानियों के बीच भी दांत निकालते और हंसी में थोड़ा सा साउंड इफेक्ट देते हुए ऐसे ही किताबें पढ़ते रहिए और थोड़ा थोड़ा ज्ञान इधर भी ठेलते रहिए।

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  2. छोटा सा जीवन हो दुश्मन का जी!! आपकी अभी उम्र ही क्या है? इतनी कम उम्र में इतना कुछ ठिल ठुला चुके है..अभी तो कई गुना बाकी है. पढ़ते रहिये हरियाये और ठेलते चलिये.

    असीम शुभकामनाऐं.

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  3. जी, कुछ ज्ञान ग्रहण किया हमने । शुक्रिया, धन्यवाद , नवाजिश...

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  4. आप दुखिया दास कबीर हैं। जागते हैं और रोते हैं।

    अभय ने जो किताब दी उसके बारे में बताइयेगा बांचकर!

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  5. कुछ दिन पहले हिन्दी किताबो की दुकान ढूढने की मुझे भी तलब लगी.. शुरु कहा से हुयी.. बोरीवली वेस्ट मे आटोरिक्शा से कही जा रहा था कि नज़र एक सेकन्ड हैन्ड किताबो की दुकान पर गयी.. किताबो के ढेर लगे हुये थे जैसे मोर्चुरी मे लाशे लगी होती होगी.. पूछा हिन्दी किताबे है.. एक धूल भरे बक्से की तरफ़ इशारा मिला.. बहुत कुछ ढूढने के बाद एक किताब लेकर आयी.. मूल्य सिर्फ़ २५ रूपये :( ओरिजिनल रेट भी बहुत ज्यादा नही थे.. हमे अभी बहुत विकसित होने की जरूरत है..

    फ़िर एक दिन इन्ही किताबो को ढूढता हुआ पीपल्स बुक शाप, चर्चगेट पहुचा.. लेकिन उस दिन वो भी बन्द मिली.. बडा दुख हुआ.. इसलिये आपके दुख से रिलेट कर सकता हू..
    वो भला हो एक मित्र का जिसने कुछ किताबे मुझे कोरियर कर दी है तो अकेले मे उन्ही की रूनी लगाकर बैठ जाता हू..
    व्हाईट टाईगर मुझे बहुत खास नही लगी.. हिन्दी साहित्य मे ऎसी अनगिनत लेख और कहानिया है जो उससे बहुत अच्छी है..

    "ओह, चूल्‍हे में जाये सब! खामख़ा लोग चढ़ाते, चढ़ाके उतारते माने खामख़ा बहकाते रहते हैं!.. या शायद मैं ही हूं कि बहकता रहता हूं. और दुखों के काले-काले इतने सारे घनेरे बादल हैं, फिर भी, देखिये, हर वक़्त बेमतलब दांत निपोरे, चहकता रहता हूं."

    हमेशा बेमतलब दांत निपोरे और चहकते रहिये.. :)

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