Friday, July 11, 2008

लिविंग फ्रॉम हैंड टू माउथ: दो

अनुभूति हुई मानो सामने दीवार पर कोई ताओ पेंटिंग देख रहा हूं. सुदूर के लैंडस्‍केप की एक दबी हुई पेस्‍टल झांकी. गौर से देखने पर कोहरे के धुंधलके के पार बमुश्किल नज़र आता पहाड़ि‍यों के घुमाव हैं, पता नहीं किस तो जंगली वृक्ष के छोटे-छोटे जंगली फल हैं, और सबसे आगे बांस की एक झाड़ का नाज़ुक, महीन चमकता हरा पत्‍ता. फिर लगा नहीं, ताओ चित्र नहीं, अट्ठारह-बीस वर्ष पहले जंगल में पिकनिक मनाने गये दांत निपोरे दोस्‍तों की एक सामुहिक फ़ोटो है, दायीं ओर सामने चमकते चेहरे वाला पेनांग जो एक गुरिल्‍ला रेडियो नेटवर्क पर सरकार-विरोधी सामग्री पेश करने के एवज में चार वर्षों के जेल की सज़ा पाये था, अब अपने काऊंटी में नई आर्थिक नीतियों के क्रियान्‍वयन में सरकारी सलाहकार की नौकरी बजा रहा है.

- यार, ये कहां का रोना-गाना लेकर तुम बैठ गये? क्‍या करना है मुझे मौर्यों की स्‍टेट पॉलिसी और इनकम डिसपैरिटी से.. तुम अपनी सुनाओ! बच्चियों के बारे में बताओ, तमारा.. तमारा कैसी है?

- सुखी है. मैं सुखी हूं, बच्चियां सुखी हैं, बच्चियों की मां सुखी है.

- व्‍हाट डू यू मीन सुखी है? पिछली बार फ़ोन पर तुम्‍हारे हाल-चाल की बाबत पूछा था तो एकदम से चुप हो गई थी, आफ्टर गल्पिंग सम एंगर डाऊन, द ओन्‍ली लाईन शी वुड मैनेज वॉज़ दैट शी डिडिंट वॉन्‍ट टू टॉक अबाऊट यू!

- सो? परहैप्‍स दैट्स व्‍हाट शी वॉन्‍ट्स टू डू, नॉट टॉक अबाऊट मी. इफ दैट कीप्‍स हर हैप्‍पी, आई अम हैप्‍पी फॉर हर. मौर्यंस की इनकम डिसपैरिटी की बात नहीं सुनकर तुम सुखी रहते हो तो इट्स फाईन विद् मी, मैं पलटकर तुमसे सवाल नहीं करूंगा कि व्‍हॉट डू यू मीन कहां का रोना-गाना लेकर बैठ गये. यू रिमेम्‍बर देयर वॉज़ दिस लाईन बाई गेटे दैट यू हैड पुट ऑन इन अ फ़्रेम बिसाइड युअर बुक्‍स- ही हू कैन नॉट ड्रॉ ऑन थ्री थाउजैंड ईयर्स इस लिविंग फ्रॉम हैंड टू माउथ?..

मुझे गुस्‍सा आया. किसलिए आया था बदमाश, मेरा मज़ाक उड़ाने? क्या कहता उससे? कि नो, नो, आई रिमेम्‍बर गेटे? लेकिन वह सच्‍चायी होती? सच्‍चायी यही नहीं थी कि आई वॉज लिविंग फ्रॉम हैंड टू माउथ? मैं ही क्‍यों, आसपास हर कोई वही नहीं कर रहा था? पूरा देश वही नहीं कर रहा था, लिविंग फ्रॉम हैंड टू माउथ? एक डिपेंडेंट इकॉनमी, ताक़तवर मुल्‍कों के डिक्‍टेट पर चलनेवाली इकॉनमी के पास क्‍या होता है- उसका चिथड़ा वर्तमान, और भविष्‍य के रुमानी झूठ होते हैं, इतिहास-बोध कहां होता है?

Do we remember anything other than the neo-liberal dictates of Thomas Friedman?

“…a country must either adopt, or be seen as moving forward, the following golden rules: making the private sector the primary engine of its economic growth, maintaining a low rate of inflation and price stability, shrinking the size of its state bureaucracy, maintaining as close to a balanced budget as possible, if not a surplus, eliminating and lowering tariffs on imported goods, removing restriction on foreign investments, getting rid of quotas and domestic monopolies, increasing exports, privatizing state-owned industries and utilities, deregulating capital markets, making its currency convertible, opening its industries, stock and bond markets to direct foreign ownership and investments…”

इस डिक्‍टेट से यंत्रबिद्ध, मंत्रमुग्‍ध बंधे-बंधे समूचे मुल्‍क को उसके पीछे भेड़-बकरी की तरह हांकने से अलग हमारी सरकार को कुछ दीखता है? इस अर्थव्‍यवस्‍था में बाज़ार है, व्‍यक्ति है, वही इसको चलानेवाले सर्वेसर्वा हैं, समाज नहीं है. ढकोसले और झूठ के प्रपंच हैं, बहुजनहित तो नहीं ही है. मगर किसी को दिखता है?

लगभग सन् अस्‍सी से दुनिया पर कब्‍ज़ा किये इस अर्थनीति के पुरोधा अपने प्रचार भोंपू पर रोज़ गरजकर बोलते हैं कि इन्‍हीं रास्‍तों पर चलकर गरीब मुल्‍कों में अमीरी आयेगी, मगर इसके जवाब से कतराकर बच निकलते हैं कि अमीर और गरीब मुल्‍कों में पैसों की गैरबराबरी कैसे जायेगी. या मुल्‍कों के भीतर की आर्थिक गैरबराबरी. या इसका जवाब नहीं देते कि क्‍यों अचानक उठान की तरफ उड़ती अर्थव्‍यवस्‍था (अपनी नीतियों की प्रशस्ति में जिसका उदाहरण चीख़-चीख़कर दुनिया को बताया जाता रहा) अचानक एकदम से भरभराकर बैठ क्‍यों जाती है (थाइलैण्‍ड, अर्जेंटिना, मैक्सिको के पिछले पंद्रह वर्षों का इतिहास हमें दिखता है? जिसकी फिर बड़े अलमबरदार व्‍याख्‍या नहीं करते, स्‍थानीय प्रशासन पर उसका दोषारोपण करके नीतिगत पराजयों से पल्‍ला झाड़ते हैं).

यह नये किस्‍म का महीन, और ज़्यादा ख़तरनाक जायंट कॉरपोरेशंस का कॉरपोरेट उपनिवेश‍वाद है, जिसके पीछे-पीछे गरीब मुल्‍कों की सरकारें पैरों के बीच पूंछ डाले घूम रही हैं, इससे जो पहले से ही अमीर हैं, उनकी और अमीरी आयेगी, गरीबों की गरीबी नहीं जायेगी, अमरीका तक में नहीं गयी है- मैं फैलकर गरजना चाहता हूं, मगर फिर याद आता है आई अम लिविंग फ्रॉम हैंड टू माउथ, और मैं कुछ कहने की जगह जुसेप्‍पे के लाये किताबों के बंडल का जखीरा खोलकर देखने लगता हूं..

4 comments:

  1. जय हो आपकी । नया लुक अच्छा लग रहा है। पर चोर दरवाजों में हिन्दी के सारे ब्लाग गायब कर दिए गए हैं । इसका क्या मतलब है ?

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  2. सही कर रहे हैं.. मैं भी तो वही कर रहा हूँ..
    नया लुक भद्र प्रतीत हो रहा है..

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  3. १. इस अर्थव्‍यवस्‍था में बाज़ार है, व्‍यक्ति है, वही इसको चलानेवाले सर्वेसर्वा हैं, समाज नहीं है. ढकोसले और झूठ के प्रपंच हैं, बहुजनहित तो नहीं ही है. मगर किसी को दिखता है?

    कहां दिखता है लोगों को! सब लोग केवल ब्लाग का कलेवर देखकर मस्त हैं।

    एक अच्छी पोस्ट!

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