Saturday, July 12, 2008

रसोई में खड़ा भारतीय आदमी.. संभव है? सही?

स्‍टेटमेंट स्थितियों को स्‍ट्रेटेन आऊट करनेवाले कमेंट हो सकते हैं, मगर ज़रूरी नहीं स्थितियों की वस्‍तुगत समीक्षा करते हों, और यह तो कतई ज़रूरी नहीं कि स्‍ट्रेट भी हों! माने इस कथन में वक्रता की आपको दुबास नहीं आती? भारतीय आदमी? खड़ा? संभव है? वह भी रसोई में? माने दुनिया कहां से कहां जा रही है (हमेशा कहीं न कहीं जाती रही है), और भारतीय आदमी गिरा हुआ है यह बात समझ आती है, मगर खड़ा है? बच्‍चों की मासूमियत की छाती पर अपने घोर स्‍वार्थों की व्‍यावहारिकता में, या बीवी की बराबरी की भोली, ज़रूरतमंद आकांक्षाओं को लात लगाता, साहब की जी-हुज़ूरी बजाता, रोज़ आदमी होने के स्‍केल पर थोड़ा और नीचे जाता पड़ा है वहां तक भी अपनी वस्‍तुस्थिति में कथन कढ़ी हुई लगती है, मगर उसे रसोई में खड़ा करने की बात करते ही लगता है हम आदमी को उसके पैरों पर नहीं, भारतीय हक़ीक़त को सिर के बल खड़ा कर रहे हैं. पहले जहां कहीं भी रहे हों, ऐसा कहते ही एक भारी रुमानियत में उतर रहे हैं..

अंतत: सवाल उठता ही है कि रसोई (भारतीय) में कितनी जगह होगी, और जितनी भी होगी, आदमी उस रसोई में पिसती औरत के हाल पर हंसने से अलग आखिर क्‍या करने वहां जायेगा? ठीक है, माना, ऐसे क्षण भी होंगे जब औरत पिस नहीं रही होगी, न पीस रही होगी, और आदमी बच्‍चों पर अपनी हिंसा और साहब की जी-हुज़ूरी से सुभीते और फ़ुरसत में होगा.. एक आंतरिक सहजता में, अपनी आत्‍मा में भी मलिन-मलेच्‍छ नहीं, सरल मनुष्‍य होगा, तब भी अंतत: वह रसोई का करेगा क्‍या? या रसोई उसका? क्‍या वह दोनों आपस में नितांत अपरिचित नहीं बने रहेंगे? मुसलमान मित्र होने का मतलब यह होता है कि कश्‍मीर के संबंध में मित्र के संग हमारी समझ का अपरिचय खत्‍म हो जाये?..

नहीं, आप ज़रा कल्‍पना कीजिये भारतीय आदमी रसोई में खड़ा है. सामने शेल्‍फ़ में गिलासों की पंक्ति है, खड़ी दीख रही है. लेकिन दारू का कोई बोतल आसपास खड़ा, या पड़ा किसी भी शक्‍ल में नहीं दिख रहा. ऐसी सूरत में रसोई में आदमी गिलासों पर अपनी लाचारी के अक़्स को निरखता खड़ा रहेगा भी तो कितनी देर रहेगा? उसके बाद फ्रिज़ में अपनी गिरी हुई अर्थव्‍यवस्‍था की अनर्थता का एक सरसरी मुआयना करेगा? लेकिन फिर, उसके अनंतर? वह सिंक में गिरे बर्तनों की ओर तो नहीं ही जायेगा. न इलायची और दालचीनी की पतली शीशियों के पीछे छिपाकर, दबाकर रखी पत्‍नी की पुरानी चिट्ठि‍यों की ओर. जायेगा? नहीं, इतने वर्षों के व्‍याहोपरांत पत्‍नी पर चीखने का उसमें सहज आत्‍मविश्‍वास आ गया हो, मगर उसके अंतर्तम में झांकने, व उसका भरोसामंद होने का कहां आया है? मैं यूं ही नहीं कह रहा, आप किसी भी कोण से भारतीय आदमी को रसोई में खड़ा करने की कोशिश कीजिये, आदमी तो आपके हाथ नहीं ही आयेगा, मिस्‍टर वडनेरकर से आप भैंस क्‍या जाने अदरक का स्‍वाद जैसे मुहावरे का अर्थ पूछते हुए स्‍वयं को किसी कठघरे में खड़ा ज़रूर पायेंगे!

मैं अंत में फिर साफ़ कर देना चाहता हूं कि पहली बात तो बदलती हुई दुनिया में भारतीय आदमी कहीं खड़ा है इस कथन में सफ़ेद झूठ न सही, धूसर झूठ तो काफी मात्रा में उपस्थि‍त है. रही बात उसके रसोई में खड़ा होने की, तो रसोई उस पर खड़ी भले हो, उसके रसोई में खड़ा होने की बात बेमानी है. इस तरह की ऊल-जुलूल खामख़्याली भी चंद बहकी हुई भारतीय औरतों की सनक समझी जाये, भारतीय आदमी की संभावित वास्‍तविकता तो किसी भी सूरत में नहीं.

रसोई में खड़े भारतीय आदमी का स्‍टेटमेंट झूठ है.

3 comments:

  1. प्रमोद जी, लगता है आपने आदमी की ज्यादा किस्में नहीं देखी हैं। कोई एक टाइप अपने आस-पास देखकर उसी को सामान्य दशा बना कर पेश कर देया। जैसा आपने बताया वैसे भी होते होंगे, लेकिन भारत भी काफी बड़ा देश है। विविधता यहाँ बहुत है।
    बहुत से आदमी ऐसे हैं जो मज़बूर हैं अपने हाथ से चूल्हा जलाने के लिए। कक्षा-८ से लेकर युनिवर्सिटी हॉस्टल की मेस तक पहुँचने के पहले मैं भी स्वपाकी रहा हूँ। अभी भी शौकिया या रोमांस में किचेन में घुस जाता हूँ।… और हाँ, वहाँ शराब ढूंढने नहीं जाता, क्योंकि वो घर में आती ही नहीं है।
    बदली आर्थिक परिस्थितियों की वजह से बिखरते परिवारों में बहुत कम आदमी इतने खुशनसीब हैं जिन्हें घरवाली का बनाया मिल जाता है। रोज का साथ मिल जाय यही बहुत है…

    ReplyDelete
  2. ये भारतीय औरतें आजकल बहुत बहक,सनक रही हैं और ऊल-जुलूल खामख़्याली की दुनिया में भी बहुत घूम रही हैं।
    घुघूती बासूती

    ReplyDelete
  3. रसोई में भारतीय आदमी खड़ा है। हमको दिख रहा है जी। :)

    ReplyDelete