Monday, July 14, 2008

कटहल का सुख.. या सुख के कटहल

क्‍या मतलब है इस तरह के सवाल का कि रुपेश प्रसाद खुश रहते हैं या नहीं रहते, या उनके जीवन में सुख के अवसर आते हैं? कितना, और कब-कब आते हैं? इस तरह की बेहूदी बात सुनकर रुपेश प्रसाद को झुंझलाहट होती है, लगता है सवाल पूछनेवाला फालतू और बेवक़ूफ़ है, बैठे-बिठाये साले को मस्‍ती चढ़ रही है. या हरमख़ोर उन्‍हें किसी जाल में उलझाने की कोशिश कर रहा है? और अपनी बात साफ़-साफ़ रखने में वह सावधान न रहे तो फंस जायेंगे. खामख़ा गले में एक नयी फांस पड़ेगी, डाक्‍टर के यहां फिर से दवाई-टेबलट की टहल करनी होगी!

सीधी बात है रुपेश प्रसाद खुश कैसे नहीं रहते, बहुत खुश रहते हैं. और सुख के अवसर का क्‍या है, रोज़ ही आती रहती है स्‍साली! अभी परसों ही तो कितना सुखी हुए थे. नहीं, लेकिन परसों हुए थे? परसों ही तो पप्‍पू दीवार फांदकर मलयालन के कटहल के पेड़ पर कटहल चुराने चढ़ा था और उस बदशकल औरत की आंख खुल गयी थी और बदकार आंगन में आके जोर-जोर से हल्‍ला करने लगी थी, और पप्‍पू पता नहीं 302 का दफा हो जायेगा या पुलिस जाने जेहल में डालकर कितनी बड़ी सज़ा दे देगी, बिना दायें-बायें देखे, पता नहीं कितने ऊपर चढ़ा था हरामी, धम्‍म से नीचे कूदा, और मलयालन वहीं तीन हाथ की दूरी पर हूक रही थी, लौंडा पत्‍ते की तरह कांप रहा था, मगर उठकर फिर भागा नहीं. फूट-फूटकर रोने लगा. शायद भाग नहीं सकता था उसके दुख में रो रहा था. उसका रोना शुरू करते ही मलयालन चुप हो गई, पता नहीं मलयाली में क्‍या गिट-बिट बोलती अंदर से एक पका हुआ कटहल उठाकर लायी और पप्‍पू के बगल में रखकर देखने लगी कि चुप होकर अब कटहल उठाता है या नहीं. लेकिन पप्‍पू चुप होने की जगह और जोर-जोर से रोने लगा. साहू के मकान पर कुछ छत्तिसगढ़ि‍या लेबर काम रहे थे, उसमें से दो लोगों ने सहारा देकर खड़ा करने की कोशिश की तब जाकर साफ़ हुआ लौंडे की हड्डी टूट गई थी.

क़ि‍स्‍सा याद आते ही रुपेश प्रसाद को एक बार फिर अपने बेवक़ूफ़ साले पर गुस्‍सा आया. डाक्‍टर के यहां पलस्‍तर-सलस्‍तर पर जो खरचा हुआ सो अलग, कंचन के घर में सब यही समझेंगे कि पाहुन बच्‍चा को पड़ोस में भेज-भेजके चोरी करवा रहे थे! जबकि पप्‍पू से छोटे की उमर में भी रुपेश प्रसाद के साथ ऐसा कभी नहीं हुआ कि वो किसी पेड़ पर कटहल चुराने चढ़े हों और धरा गये हों. और ऐसा भी नहीं कि कहीं साला बजका के लिए कोंहड़े का फूल तोड़ने गया था! कटहल के फेर में पड़ा जिसे न वह खाते हैं, न कंचन हाथ लगाती है, और बबुनी तो कटहल देखकर रोने लगती है. फिर किस बास्‍ते हरामी आठ किलो के कटहल के फेर में पड़ा था? सिर्फ़ इसलिए कि आठ किलो की चीज़ मुफ़्त में हाथ आयेगी?..

नहीं, परसों खुश नहीं थे रुपेश प्रसाद. परसों क्‍या कल तक हाथ में खुजली हो रही थी कि गर्दन पकड़कर चार लप्‍पड़ लगायें लौंडे को. कंचन का रोना-धोना देखकर चुपाये रहे. लेकिन बबुनी पता नहीं क्‍या देखकर उछल-उछलकर हंस रही थी.

फिर परसों नहीं हुए थे तो आखिरी मर्तबा कब खुश हुए थे रुपेश प्रसाद? पिछले इतवार पापाजी ने कहा था पंद्रह-बीस दिन के लिए आकर उसके यहां ठहरेंगे, तब हुए थे? मगर उनके आने पर रुपेश प्रसाद को खुशी होती है, खुद पापाजी कहां होते हैं. पंद्रह दिन के लिए कहकर आते हैं, छह दिन नहीं निकलता, गांव वापसी के लिए छटपटाने लगते हैं. वहां क्‍या है, यहां सब सुविधा-सहूलियत है लेकिन पापाजी ज़ि‍द पर अड़े रहते हैं कि नहीं, गांव में अकाज होगा. रुपेश प्रसाद को पहले मालूम नहीं था, रात में कंचन ने बताया तब जाने कि पापाजी टट्टी में दरवाज़ा खोलकर बैठते हैं. दरवाज़ा बंद करने से बोलते हैं अंदर घबराहट होती है. अच्‍छी मुसीबत है. जितने दिन यहां रहते हैं कंचन भी घबरायी सोनेवाले कमरे से बाहर नहीं आती. रसोई में भी पल्‍लू खींचकर ऐसे जाती है जैसे बबुनी के लिए दूध की चोरी करने गयी हो!

जीवन में यह सब उल्‍टा-सीधा तो चलता ही रहता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि रुपेश प्रसाद खुश नहीं, या उनके जीवन में सुख के अवसरों की कमी है. अभी कल ही की तो बात है (लेकिन कल बैंक कहां गये थे? ख़ैर, जब भी गये थे), कि काउंटर के आगे लंबी लाईन में अपना कागज़-पत्‍तर जांचते वह ‘ओ, नील गगन के तले’ गुनगुनाने लगे थे. आजू-बाजू चार लोगों ने उनको घूरकर देखा भी था, मगर रुपेश प्रसाद, लापरवाह, अपने सुख में सुखी गुनगुनाते रहे थे. बैंक में उनका पेपर रिजेक्‍ट हो गया था, और अपने प्रति भेदभाव की बात सोचकर रुपेश प्रसाद को बहुत गुस्‍सा आया था, लेकिन शाम को दोस्‍त की फैक्‍टरी से एक दूसरा काम निकलवा कर घर लौटे तो कंचन उत्‍साह से उनको आंगन लिवाकर गयी, दीवार पर बांस से चढ़ायी लता में सेम की ताज़ा-ताज़ा निकली फलियां दिखायीं तो पत्‍नी के साथ-साथ रुपेश प्रसाद भी एकदम से मुस्‍कराकर खुशियाने लगे थे, बबुनी भी उनकी गोद में हाथ बजा-बजाकर चहकती रही थी! ओह, ऐसा नहीं कि जीवन में सुख के अवसर नहीं आते, रोज़-रोज़ आते हैं..

लेकिन, फिर भी, सवाल रहता ही है, कि आप खुश रहते हैं, या नहीं? या आपके जीवन में सुख का अवसर कब, कितना आता है?..

7 comments:

  1. बहुत अच्छा लग रहा है ब्लोग का कलेवर . वैसे आज आप इतनी लंबी पोस्ट इसी खुशी मे लिख गये क्या फ़ुरसतिया स्टाईल की ? भई आज की आपकी पोस्ट आपही की चार छै पोस्टो के बराबर है :)

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  2. आप खुश रहते हैं, या नहीं? Is sawal ko to janam janmanantra tak bane rahna hai..aap hum chale jayenge-yah sawal bana hi rahega.

    Behtarin piece of writing.

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  3. आप खुश रहते हैं, या नहीं? या आपके जीवन में सुख का अवसर कब, कितना आता है?

    पहली बात:
    सवाल दो हैं और अलग-अलग हैं. कई लोग सुखी नहीं होते पर ख़ुश रहते हैं. दूसरी तरफ़, अक्सर सुखी लोग ख़ुश नहीं रहते (कम से कम दिखते तो नहीं).

    दूसरी बात:
    ब्लॉग का बदला रंग-रूप अच्छा लगा. बस ये दायीं ओर का कमेंट बक्सा चादर से बाहर पैर फैला रहा है, थोड़ा अंदर कर लें, भला लगेगा.

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  4. @विनय प्‍यारे,

    चादर से बाहर मैं पैर नहीं फैलाये रहता? अंदर करना चाहता हूं, मगर होता कहां है? होता है?

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  5. अभी सुबह-सुबह चाय पीते हुये इसे पढ़ा। बहुत खुश हुये। ब्लाग की नयी साज-सज्जा अच्छी लग रही है। पोस्ट बहुत लगी।

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  6. और सब त ठीक है पर ई कटहल के चक्कर में सुख की पड़ताल काहेला पेड़ से नीचे धकेल दिए हैं? हैं?

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  7. ऐसा नहीं कि जीवन में सुख के अवसर नहीं आते, रोज़-रोज़ आते हैं..
    ***
    सच में रोज़ रोज़ आते हैं, हर पल आते हैं...
    और ख़ुशी भी यूँ ही दौड़ी चली आती है... ख़ुशी का पता बताती आपके संकेतों की तरह:)

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