Tuesday, July 15, 2008

सब इतनी देर से क्‍यों समझ आता है?..

अपने साथ मेरे लिये किताबों का बंडल लाये हो, मेरी आत्‍मा की भूख का तुम्‍हें स्‍मरण रहा, बहुत-बहुत शुक्रिया मित्र, मैं तुमसे झगड़ा करना नहीं चाहता! एक तुम्‍हीं तो हो जिसके आगे अब भी बिना लुकाव-छिकाव के मन की गांठें रख देता हूं. तुम्‍हारी राय जानने को तुम्‍हारी राह अगोरता हूं, तुमसे झगड़ा क्‍यों करूंगा, जुसेप्‍पे? कर सकता हूं? तुम्‍हारे स्‍नेह के पुल को जलाने के बाद फिर अपने पास बचेगा क्‍या. भारतीय मध्‍यवर्ग के गजर-मजर शहराती विकास के बीच किसी भी दिन उजड़ जानेवाले आदिवासियों का गांव नहीं हो जाऊंगा? मेरे लिए तुम्‍हारा स्‍नेह रोज़ पंद्रह मिनट आनेवाले पानी की तरह कीमती है, जुसेप्‍पे, मैं उन पंद्रह मिनटों का सूखना गवारा नहीं कर सकता, फ्रेंड! खुद के ऊपर मेरी डिपेंडेंसी की एक-एक परत तुम जानते हो, दोस्‍त, इसीलिए आग्रह कर रहा हूं मेरे बारे में फ़ैसले सुनाकर मुझे प्रोवोक मत करो. वैसे ही देखते हो जीवन कितना एज पर है, तुम्‍हारी तल्‍ख़ि‍यों से छिनककर हमारे बीच सब आग और धुआं हो जायेगा, मैं और-और अकेला हो जाऊंगा, तुम सुखी होगे? जानता हूं नहीं होगे, शायद मुझ सा बदहाल न होगे, लेकिन अकेले तो तुम भी होगे, जुसेप्‍पे, नहीं होगे?

तुम्‍हारा ज़ि‍क्र आते ही तमारा कैसे खुशी में नहाने लगती थी, याद है तुम्‍हें? एक्‍सप्रेस रेल की तरह फिर उसका जुसेप्‍पे पुराण की रसवर्षा शुरू हो जाती थी. मैं बरजकर बेवक़ूफ़ को चुप कराता था कि मेरे ही आगे मेरे दोस्‍त का मीठा घोल रही हो? उस बदमाश की नस-नस जानता हूं, इतना प्रेम में मत पड़ो कि बाद में तक़लीफ़ होने लगे. फिर वही तो हुआ न? हमेशा बोलती रहनेवाली तमारा एकदम से चुप हो गई. इतना ज़्यादा-ज़्यादा प्रेम करने का यही परिणाम होता है, मित्र, कि व्‍यक्ति फिर उतनी ही मात्रा में तक़लीफ़ बर्दाश्‍त करे? मैंने तभी बेवक़ूफ़ से कहा था इस तरह खुशी में पागल मत बनो, जुसेप्‍पे को जुसेप्‍पे ही रहने दो, येव मोंतां और एलेन देलों मत बनाओ. लेकिन तब मेरी बात सुनने की तमारा को फ़ुरसत कहां थी, घड़ी भर के लिए चुप होकर मुझे हैरत से देखती थी, फिर चेहरे पर हाथ धरकर बच्‍चों सी हंसती रहती थी. अब क्‍यों नहीं हंसती? कहां चली गयी सारी हंसी?

आई अम सॉरी, जुसेप्‍पे. आई डिडिंट मीन टू हर्ट यू. ऑर पास जजमेंट ऑन तमारा, एज़ इफ़ हर इन्‍नोसेंस एंड नाइविटी सर्व्‍ड हर गुड, आई डोंट नो वेदर शी लर्टं एनी लेसन, बट पेड द प्राइस डियरली.

समय रहते हमें चीज़ें अपने वास्‍तविक शक्‍ल में क्‍यों नहीं दिखतीं, दोस्‍त? हमेशा उनके गुज़र जाने के बाद ही हमारी उनके बारे में समझ और पहचान क्‍यों बनती है? मैं सिर्फ़ तमारा के दुख की बात नहीं कर रहा, तुम अपनी ही देखो? इतने लंबे समय तक फ़ेल्‍त्रीनेल्‍ली से तुम्‍हारे जुड़े रहने का क्‍या तुक था? आतों चाहता था तुम उसके साथ सिसली में रहकर बच्‍चों की किताबों की एक सीरिज़ निकालो, मिलान और उसकी अवास्‍तविक दुनिया से बाहर निकल लेने का कितना अच्‍छा मौका था, लेकिन तुम सिसली नहीं गये, मेरे नहीं पूछने पर भी बताते रहते थे कि आतों सेंटिमेंटल और इन्‍ट्यूटिव है! लेकिन सिसली नहीं जाने की, तुम भी जानते हो, वजह आतों का सेंटिमेंटल और इन्‍ट्यूटिव होना नहीं था, वह सेंटिमेंटल और इन्‍ट्यूटिव था इसीलिए तो उस पागल बुड्ढे पर तुम इतना जान छिड़कते थे! तुम सिसली इसलिए नहीं गये क्‍योंकि तुम्‍हें लगता था फ़ल्‍त्रीनेल्‍ली तुम्‍हें एक लाईन ऑव न्‍यू अमेरिकन राइटर्स कंपाइल करने न्‍यूयॉर्क भेजेगी, तुम्‍हारे मध्‍यवर्गीय आकांक्षाओं में उस बेचारे आतों के सपने होम हुए! और बुड्ढे ने कभी इसका तुम्‍हें दोष भी नहीं दिया. तुम न्‍यूयॉर्क में थे तब तुम्‍हें कार्ड भेजता रहा!

लेकिन मैं यह भी जानता हूं कि अंदर-अंदर तुम्‍हें सिसली ट्राई नहीं करने की बाद में कितनी तक़लीफ़ हुई थी! हमारी तरह के अभागों को हमेशा होती है. लेकिन वक़्त रहते नहीं होती! व्‍हाई डज़ इट हैपेन लाइक दिस, जुसेप्‍पे, यू आनसर मी?..

(जारी)

3 comments:

  1. बेलाग की नयी रूप सज्जा तो बढ़िया है ही पर ये सिगरेट सुल्गाऊ फोटू तो गजब है. किसी दिग्गज इतालवी फिल्मकार का सा लुक दे रहा है. फोटोग्राफर कौन है जी? हम भी दो चार खेंच्वाना चाहते हैं. और हाँ, कल की पोस्ट भी कमाल की थी.

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  2. kuchh likhne ka dil kiya to hindi gayab. koi link, koi jugaad?

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  3. कमाल लिखा जा रहा है. समझने की कोशिश में भी लगे हैं. आप जारी रहिये.

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