Wednesday, July 16, 2008

आधी-अधूरी टिल्‍ली तस्‍वीर सामने मत लाइये.. साफ़ तस्‍वीर दिखाइये!

नोट चांपने का सुनहला मौका ताड़ रहे सांसदों के गुंडा गिरोहों में तो सरकार गिरने-बचाने के कयासों की सनसनी है ही, जो सांसद हैं और न गुंडा (नोट तो नहीं ही चांपने जा रहे), वे भी इस कयास के पीछे हलकान हो रहे हैं. न्‍यूक्लियर डील का सवाल फ़ि‍लहाल डल हो गया है. डील कीचड़ में कमल या किस तरह का दलदल था, इसके अंकगणितीय फ़ार्मूले कुछ इधर-उधर सर्कुलेशन में भले रहे हों, सीधी, साफ़-सुथरी व्‍याख्‍या अख़बारों व अन्‍य सूचना माध्‍यमों में सामने लाने की ज़रूरत पहले भी नहीं समझी गयी थी, अब तो सरकार ये गिरी और वो बची के खेल में वह यूं भी पृष्‍ठभूमि के परदों के पीछे रहस्‍यवादी प्रतिमा बनकर जा छिपी है.

वाममोर्चा भी घिसा हुआ यही गाना गा रहा है कि क़रार अमरीका के हाथों जाना होगा, इस जाना होगा के डिटेल्‍स क्‍या हैं, और उसे जनता के बीच कैसे प्रचारित किया जाये इसमें वाममोर्चे की बहुत दिलचस्‍पी नहीं लगती. क़रार पर इतनी देर बाद जाकर समर्थन लिया है, कुछ महीनों पहले सरकार से समर्थन वापस लेकर महंगाई के सवाल पर कोई राष्‍ट्रीय आंदोलन खड़ा करने की पहलकदमी कर सकती थी, मगर तब पता नहीं वह किस शुभ घड़ी का इंतज़ार कर रही थी. थोड़ा अंदर घुसकर सोचना शुरू करें तो फिर यह भी दिखने लगता है कि वाममोर्चे के सारे आंदोलन मीडिया की बैठकों को बुलाकर अपने पक्ष की सफ़ाई देने भर की ही है, पिछले वर्षों में देश में आंदोलन व आंदोलनकारी जहां कहीं रहे हों, वे अच्‍छा-बुरा और जो कुछ भी रहे हों, वाममोर्चे की पहलकदमियों का नतीजा नहीं ही रहे हैं..

ख़ैर, वाममोर्चे की रहस्‍यवादी डुगडुगी बजती रहे, मैं न्‍यूक्लियर डील के डिटेल्‍स की कह रहा था. इससे देश को ठीक-ठीक नुकसान क्‍या होगा, और नहीं होगा तो इसके फ़ायदे क्‍या हैं, कब तक होंगे? कोई इसके बारे में ठीक-ठीक बतायेगा, जानने की जगहें दिखायेगा? क्‍योंकि न जानने का दुष्‍परिणाम यह होगा कि अंट-संट की सुनी-सुनायी पर हम सुखी होते रहेंगे. कल एक परिचित ने कैज़ुअली हमें सूचित किया कि देश की ऊर्जा ज़रूरतों का मात्र 3% अभी न्‍यूक्लियर एनर्जी सप्‍लाइ कर रही है, अमरीका के साथ डील हो गया तो यह प्रतिशत- अगले और उसके बाद या पांच साल में नहीं- 2030 तक बढ़कर 6% हो जायेगा. चूंकि हम एनर्जी की फ़ील्‍ड के, या इस क्षेत्र में राष्‍ट्रीय डिमांड व सप्‍लाइ के एक्‍सपर्ट नहीं हैं, हम परिचित के कहे को पत्‍थर की लकीर मानकर मुंह बाये सुनते रहे, अपनी एक्‍सपर्टीज़ से ज़ि‍रह को आगे किसी दिशा में ले जाने में फालतू और फिजूल महसूसते कर क्‍या सकते थे, खलिया झुंझलियाते रहे..

न्‍यूक्लियर कचरे का एक बड़ा प्रश्‍न तो है ही, लेकिन उससे अलग भी, मैं इस क्षेत्र को न जाननेवालों की तरफ़ से एक जिज्ञासा सामने रख रहा हूं, कि भाई लोगो, दिल्‍ली के राजनीतिक आपका और हमारा उलूक पीटते हुए अपने स्‍वार्थों की जो भी डमरू बजाते हों, एनर्जी के फ़ील्‍ड में डिमांड और सप्‍लाइ की भारतीय वास्‍तविकता दरअसल है क्‍या? हम कहां स्‍टैंड करते हैं? न्‍यूक्लियर कचरे से अलग कहीं खड़े होने की हमारे लिए कोई जगह सचमुच है या नहीं? राज्‍यवार बिजली की मांग और भरपायी का बैलेंस शीट कैसा है? कि महाराष्‍ट्र में जैसा हाल में हुआ कि परिवहन और आदिवासी विकास मंत्री के घर पुलिस पहुंची तो आदिवासियों के विकास के लिए लगाये मंत्री को उनके और परिवहन दोनों के विनाश में लिप्‍त पाया गया, चलिये, धर्मारावबाबा अटराम को पुलिस पा गयी मगर भगीरथी के मुहाने से लेकर हरिद्वार और देश के दूसरे हिस्‍सों में जो भीमकाय बांधों की परियोजनायें चलायमान हैं, प्रोजेक्‍टेड एक्‍सपेंस से कूद-कूदकर अनइमैजिनेबल एक्‍सपेंस में जातीं (और उतनी ही आसानी से फिर प्रोजेक्‍टेड पॉवर जेनरेशन की बहुत सारी जगहों पर लगभग आधा बिजली पैदा करतीं) इन परियोजनाओं की जवाबदेही कौन पुलिस लेगी? ले सकेगी?

टिहरी दुनिया का आठवां सबसे ऊंचा बांध है. मार्च 2008 तक इस पर 8,298 करोड़ इस पर फुंक चुके थे, प्रस्‍तावित खर्चे से कहीं-कहीं ज्यादा. प्रस्‍तावित ऊर्जा उत्‍पादन बताया गया था 2,400 मेगावॉट, फ़ि‍लहाल पैदा कर रही है महज़ 1000 मेगावॉट. अभी थोड़े दिन पहले सतलज में कटाव की गंभीर स्थिति के मद्देनज़र वहां 1,500 मेगावॉट की क्षमतावाले नथपा झकरी हाइडल प्रोजेक्‍ट को अस्‍थायी तौर पर बंद करना पड़ा था. खुद अमरीका में 654 बांधों को हटाने का काम हुआ है, 58 हटाये जाने का इंतज़ार कर रही हैं. देश का एक सबसे बड़ा, कैनयन बांध 100 मिलियन डॉलर्स के बड़े खर्चे पर हटाया गया. भगीरथी के गिर्द भारी परियोजनाओं के बंधाव से स्थिति यह हो गयी है कि 2030 तक ज़्यादा संभावना है कि गंगा एक मौसमी नदी भर बनकर रह जायेगी, इस प्रश्‍न पर हमारी बुद्धि चलती है?

महाराष्‍ट्र के आदिवासी इलाकों का ही एक और क़ि‍स्‍सा है. पैंतीस वर्षीय एक सामान्‍य मास्‍टर, हेरंब कुलकर्णी ने सर्वशिक्षा अभियान के डेपुटेशन पर आदिवासी क्षेत्रों में 200 स्‍कूलों का दौरा किया, जो देखा उसे 99 पृष्‍ठों की एक मराठी किताब में दर्ज़ कर दिया- शाला हैं, शिक्षा नहीं. अब आलम यह है कि महाराष्‍ट्र में जगह-जगह प्रा‍थमिक शाला के शिक्षक किताब की होली जला रहे हैं, क्‍योंकि हेरंब ने प्राथमिक शिक्षा में मास्‍टरों को दारु पीकर कक्षा में बैठे देखा था, कक्षा के छात्र नहीं मास्‍टर तक 981 का 9 से भाग करने में लरबराकर 19 के नतीजे पर पहुंच रहे थे] कुलकर्णी ने यह सब अपनी किताब में लिख दिया तो मास्‍टर चिंहुकने लगे हैं!

जैसे न्‍यूक्लियर डील के बारे में सवाल कर देने पर बहुत सारे लोग चिंहुकने लगते हैं कि अंधेरे की गड़ही में पड़े रहना चाहते हैं, ससुर ये देश में कभी विकास होने नहीं देंगे! सवाल है किसी अमूर्त राष्‍ट्रीय विकास के नाम पर हर कहीं स्‍थानीय जनजीवन का भट्टा बैठा रहे इस विकास की गरदन थामनेवाली कोई जवाब तलब करनेवाली एजेंसी होगी या नहीं होगी? बात विकास के समर्थन व विरोध की नहीं, उस विकासरूपी कैलेंडर के डिटेल्‍स को ठीक-ठीक समझने की है, मुझे समझ नहीं आ रही, आपके आ रही हो तो कृपया हमसे अज्ञानियों की दिशा में भी थोड़ा ज्ञानदान करें?

4 comments:

  1. अति सुन्दर रचना।

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  2. आप ने सही सवाल उठाए हैं।

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  3. सरकार गिरेगी या बचेगी कि रहस्यवादी साहित्य के पीछे चल रहे बैगों की कहानियां कौन सुनाएगा , गुरुदेव, इस तकलीफदेह पड़ताल का परिणाम तो जानना ही पड़ेगा

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  4. aapane sach hi kaha
    bhagyodayorganic.blogspot .com

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