Saturday, July 19, 2008

दिल्‍ली का अंत और शेल्‍केवाडियों के अनंत.. ?

चिरकुटई के साथ मज़ा है कहीं आपका पीछा नहीं छोड़ती. ब्लॉगजगत में तो नहीं ही छोड़ती, यहां तो ख़ैर वह द आर्ट ऑफ़ फीलिंग है, मगर हिंदी ब्‍लॉगों से बाहर के बड़े संसार में भी अंतत: वह मुद्रास्फिति की तरह दौड़ रही चिरकुटई ही है- लगता है पिंड अब छोड़ी, तब छोड़ी, कल सुबह उठेंगे दूसरी चीज़ों की चर्चा करेंगे, महंगाई की बातों से मुख मलिन नहीं होगा, मगर ससुर, ख़्याली पुलाव ही पकते हैं, असल नहीं पकता. इसलिए कि असलवाले को महंगाई पकाती रहती है. पीछे-पीछे मुद्रास्फिति, आगे-आगे आप दौड़ते रहते हैं (विरले ही खुशनसीब जो महंगाई के पीछे नहीं, महंगाई उनके पीछे दौड़ रही हो. वर्ना ज़्यादा तो वे बदनसीब हैं जिनके जीवन में महंगाई ही महंगाई खड़ी है, वे कहीं नहीं खड़े हैं. जाने भलमनसी में, या चिरकुटई में, बेचारों ने सारी जगह महंगाई की मौज के लिए छोड़ दी है!).

ख़ैर, तो कह रहा था चिरकुटई कहीं पीछा नहीं छोड़ती. या मुद्रास्फिति. एक ही बात है. और ऐसा नहीं है कि शहर में ही उसके (महंगाई के) बिच्‍छू जेब में घुसे हुए हैं, कि आदमी जेब में हाथ डालने से डरे, गांवों तक में लोग जेबवाले कपड़ों के नज़दीक जाने से डर रहे हैं. भारतीय परम्‍परा की धोती ने किसी तरह लाज रखी हुई है. हालांकि मुद्रास्फिति कभी भी उसे उतार भी सकती है. जैसे सरकार को बुहार सकती है. लेकिन सरकार मुद्रास्फिति की जिरहों से बचते हुए, ‘परमाणु क़रार करा दो, देश को पता नहीं किस चमकते आसमान में पहुंचा दो’ के टिमटिमाते नारे के पीछे जाकर छिप गई है. साफ़ है सरकार ने ‘तारे ज़मीन पर’ नहीं देखी है. ज़मीन तो एक बार सरकार में पहुंचने के बाद कोई भी दल देखने से मुंह चुराने लगती है, और रही तारों-सितारों की बात, तो वह भी सिर्फ़ अमरीकी झंडे वाला देखती है.

विपक्ष भी ज़मीनी हक़ीक़त पहचानने की जगह, परमाणु करार के आगे-पीछे ही लुकाछिपी खेल रहा है. मुद्रास्फिति को चुनावी सिर पर चढ़ाने से बच रहा है, क्‍योंकि ऐसे राष्‍ट्रव्‍यापी मुद्दे के फटे में टांग फंसाने का एक अर्थ यह भी हो सकता है कि विपक्ष को फिर एक राष्‍ट्रव्‍यापी आंदोलन के फटे में टांग फंसाना पड़े. जबकि सच्‍चायी है विपक्ष किसी भी ऐसे फटे में नहीं उलझना चाहता जो उसे राजधानी से बाहर के फटेहाल दुनिया में भेजे. वह राजधानी में बैठे-बैठे, ताज्ज़ुब और हैरत चेहरों पर लाते-हटाते, मीडिया मीटिंग्‍स में मिनरल वॉटर की बोतलें सजाता-संभालता राष्‍ट्रव्‍यापी आंदालेन खड़ा करके राष्‍ट्रव्‍यापी (या अमरीका सदृश पापी?) सरकार स्‍थापित कर लेना चाहता है.

भले मुद्रास्फिति कहीं भी जाये, आपको पीछे से और मुझे गड्ढे की ओर दौड़ाये? ओह, आप समझ नहीं रहे, सरकार बचे या जाये, मुद्रास्फिति कहीं नहीं जानेवाली. महाराष्‍ट्र के कोल्‍हापुर में करवीर तालुका का शेल्‍केवाडी चंद पागल किसानों का गांव होगा कि मुद्रास्फिति वहां दौड़ने की जगह अचकचाकर खड़ी हो गयी है, और गांव के अंदर नहीं, बाहर खड़ी है. अंदर गांववाले खड़े हैं, और आराम से खड़े हैं! अच्‍छा है सब शेल्‍केवाडी तक ही सीमित है, शेल्‍केवाडी समूचा मुल्‍क नहीं हुआ. क्‍योंकि सारा मुल्‍क शेल्‍केवाडी बन जाता तो इन द फर्स्‍ट प्‍लेस केंद्र में ऐसी सरकार नहीं होती, और किसी तरह हो गयी भी होती तो ऐसा बेहूदा प्रचार न करती कि ‘परमाणु करार होने दो, देशवासियों को चैन से सोने दो’. क्‍योंकि ऐसे मूर्खतापूर्ण झूठ का प्रचार करके जनसमर्थन नहीं, फिर जनविपुल चप्‍पल पाती!

शेल्‍केवाडी के बारे में पढ़कर पता नहीं क्‍यों मैं तैश में आ गया हूं, कृपया आप भी थोड़ा आने की कोशिश करें.

2 comments:

  1. अजदक की अलमारी मे हमारा टिप्पणी रखा गया है सुबह दिये थे पोस्ट पर चिपकाने के लिये . बाहर निकाल कर पोस्ट पर चिपकाईयेजी :)

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  2. एक अच्छी रिपोर्ट पढ़वाने का शुक्रिया । ऐसी तैश में बरसों से आ रही है , जा रही है। दो दशको की पत्रकारिता ने बारहा ऐसी सूचनाएं जो दी हैं ।
    इस देश की मूर्ख जनता का दोष है। पढ़े लिखे भी उन्ही में शामिल हैं। क्या आप राजनेताओं से उम्मीद कर रहे हैं कि आपको नैतिकता का पाठ पढ़ाएंगे ? जनता को नुमाइंदा चाहिए या नेता ?
    सोते रहनेवाले, कुढ़ते रहने वाले मूर्ख लोगों के हुजूम का हिस्सा बना रहने की शर्म भी आती है कई बार ।
    अच्छी पोस्ट है सरजी ।

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