Sunday, July 20, 2008

पुरबिया फुटानीबाज का अवसादगीत

महटियाये, लझरियाये आखिरकार बहरी अइबे करेंगे. बोलिये, बहिरी आये बिना कवनो उपाय है, साथी? नहीं, बताइये, कमरेड, हाऊ लांग चार बाई चार के अपना चौखटा में अड़े रहेंगे? मसिर्या गाय-गायके रात गहीन करेंगे, बेपरवाह गुमानी में अपना ही सलीब चढ़े रहेंगे? टाइम का टिलिक-टिलिक तS ठहरे हुए न है, जी, रोज आगे न जा रहा है? मालूम नहीं लोहियाजी अपना ‘इतिहास चक्र’ में का ज्ञान का भांग घोंटे थे, मगर हम तS देख रहे हैं, साथी, इतिहास चहुंओर लप्‍पड़ खा रहा है. लइका-लटकन सब ठीक से अखबार नहीं बांचता, इतिहास कहंवा ले बांचेगा, होज़ूर, जांचेगा? चायबासा में संतरा का एतना सब खेती था, महाराज, सब उजर रहा है, चीन का डैरेक्‍शन में देखिये, आंख मूंदल अइसा बिस्‍तारबाद है कि कलेजा दहल रहा है. आपका लगे हम मन का मुरझाइल हाल बताने आते हैं तS आपो महाराज, कवन जो है कि हमरा मने झांकते हैं? एत्तिला करते हैं उन्‍तीस तारीख को स्‍टेट कमेटी का मीटिन है, हमरा हाथे परचा थमाते हैं. फाइलबंद परचा और चार गो अखबारी कतरन अऊर एगो हुरहुराया मोपेड से आप अंदोलन का आग फैलाइयेगा? हद है, कमरेड, मन का आंखि मूंद के सूत गये हैं, कि पंचवी कच्‍छा का रट्टल अइसही लरबकई वाला क्रांति लाइयेगा? हम तS खैर, अपना सूली पर चढ़े हुए हैं कि सर्बेस्‍सर का कुआनो नदी में बहि रहे हैं, मालूम नहीं केतना जियल हैं केतना मरे हुए हैं, मगर आपका, कमरेड, तS क्रांति का किताबे सियाही नहाया हुआ है, फारसी का किताब से आप मगही का कच्‍छा ले रहे हैं? हम तS लझरियाये हैं, मगर आपे कौन सुझराये हैं, कि सीधा-सीधी अपना करम-पथ से महटियाये हैं, होज़ूर?

3 comments:

  1. एकदम सांच बात बोल रहे हैं गुरुदेव। बहिरी आये बिना कवनो उपाय नाहीं। वैसे आप बढि़या किये कि शेल्‍केवाडी के बारे में बता दिये। अब त हम सोच लिये हैं- या त शेल्‍केवाडी जाकर ही बस जायेगे, या धान-गेहूं के बदले रतनजोत-मेंथा उपजावेंगे।

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  2. लइका-लटकन सब ठीक से अखबार नहीं बांचता, इतिहास कहंवा ले बांचेगा, होज़ूर, जांचेगा?

    सही बात है!

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  3. फाइलबंद परचा और चार गो अखबारी कतरन अऊर एगो हुरहुराया मोपेड से आप अंदोलन का आग फैलाइयेगा? हद है। कमरेड तो सूतल हैं।
    मगर आपके गले को कुछ हुआ क्या, इस हौजकास्ट का रिकार्डिंग में?

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