बड़े-बड़े स्वामी हैं घंटों प्रवचन पेले रहते हैं, आसान नहीं है, कराहते-कराहते काबुल पहुंच जाओगे लेकिन बहुमुखी नहीं हो पाओगे- या क़ायदे से दुखी- सच्चायी नहीं कह रहे होते. सब आपके मन से, और अपना धंधा, खेल रहे होते हैं. जबकि सच्चायी जो है, रसोई के जंगले पर छूटी हुई माचिस की डिब्बी की तरह पड़ी होती है. उसे देखने के लिए बस माचिस की डिब्बी देखने, खोजने और पा लेने वाली सरल समझ होनी चाहिए. हालांकि यह भी सच है कि भारत जैसे हमारे विकसित देश में ढेरों ऐसे घर हैं जिसके अंदर रसोईरूपी जंगल तो है (माने घर और रसोई की सीमाओं में वैसी ही स्नेहिल ओवरलैपिंग है जैसे कश्मीर के प्रति हमारे स्नेह और गुस्से की, जिसका सुपरिणाम यह होता है कि हम घर में रहते हुए भी अंतत: रह जंगल में रहे होते हैं, या जंगल को ही घर मानते रहने की सुलझी, स्वस्थ्य राष्ट्रीयता का सुख भोगने लगते हैं), लेकिन रसोई का जंगला नहीं.
साथ ही साथ किंतु यह भी सच है कि बहुत सारे सुभागे ज़रा ज़्यादा ऊंची दर्शनीय दार्शनिकता को प्राप्त हो गये हैं. उनके यहां जंगलरूपी घर तो है, लेकिन जंगलेवाला- या बिना जंगले का- कैसी भी रसोई नहीं है! स्वाभाविक है ऐसे प्रियवर चाहकर भी माचिस की डिब्बी- या वांछित सामाजिक लक्ष्य तक पहुंच नहीं पायेंगे, और कसमसाते, अकुलाते जितना भी रहें, क़ायदे की दु:खावस्था को प्राप्त नहीं कर पायेंगे!
जो भी कहता है दुखदर्शन समझने के लिए जैनेंद्र कुमार का साहित्य या गौतम बुद्ध कलेक्टेड वर्क्स से गुज़रना ज़रूरी है, ग़लत कहता है. स्वयं गौतम बुद्ध बिना जैनेंद्र कुमार के साहित्य से गुज़रे दुखहरीन वर्ल्ड तक पहुंचे थे, और उस वर्ल्ड को डिज़नीवर्ल्ड से श्रेष्ठ करार दिया था! जैनेंद्र कुमार के साहित्य का विचार किया था इसका उनके कलेक्टेड वर्क्स में कहीं भी ज़िक्र नहीं है. कलेक्टेड वर्क्स के बाहर किसी ब्लॉग तक में भी नहीं है. ऐसा कोई ज़िक्र होता तो निश्चय ही जैनेंद्र कुमार के साहित्य की साम्प्रदायिकता पर उन्मादी जिरह चालू हो गयी होती, और बहुत सारे साहित्य व समाजप्रेमी जिन्हें स्वयं के बायें व दायें चूतड़ में भेद की विशेष जानकारी नहीं, जिन व जैन साहित्य पर सुबह की चाय के पहले- और सुबह की चाय के बाद भी विचार कर रहे होते- या व्यभिचार- एक ही बात है.
हालांकि यह भी घोर आश्चर्य का विषय है कि समाज की ऐसी पोस्ट-बुश विकसितावस्था में आज जब हर शय इतनी सर्वसुलभ है- राष्ट्रीय सांसद तक इस खंभे और उस दीवार के पीछे बिकने को प्रस्तुत हैं- दुख के अन्वेषण में हमें माचिस की डिब्बी खोजनी पड़ रही है? और बिना माचिस के कलेजा जलाना पड़ रहा है? साहित्य में सांप्रदायिकता को चिन्हित करने की उर्वरा कल्पना की ही तरह यह नज़रिया भी आपको कुछ अतिरंजित, अतिउन्मादी विषादी नहीं लग रहा? इस तरह ठिल-ठिलकर आप दुख तक तो क्या, दीनापुर तक भी पहुंच पायेंगे? मेरे ख़याल में बुद्ध को भले जानने लगें, दुख को नहीं जान पायेंगे. शायद सरल तरीका यही है कि आप अपने को ठीक-ठीक पहचानना सीख लें- या मेरे ब्लॉग को बांचना? लेकिन मेरे ब्लॉग पर तो आप सुख ही सुख में नहायेंगे- दुख भला फिर कहां पायेंगे?
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नही जी हम तो यहा आकर बिना आपकी टिप्स के भी दुखी होकर ही जाते है. दुखो की लिस्ट नीचे दी गई है
१. ये हमारी समझ मे एक बार ही पढने पर क्यो नही आ जाता कि आप क्या समझाना चाह रहे है :)( कई बार पढना पडता है)
२.आप दिन मे कई कई पोस्ट कैसे ठेल देते है यहा तो कई दिन लग जाते है
३.हम यहा आते ही क्यो है :) ( दिल है की मानता ही नही)
४.यहा चीन यात्रा इत्ती लंबी खिच गई , हम शिकारपुर और झुमरी तलैया के चार साल प्रवास कॊ अभी तक नही लिख पाये
वाकई सुख ही सुख पा रहे हैं आपके ब्लाग पर. दुख के टिप्स देने बुलवाया और वो ही नदारत. अब पंगेबाज से सलाह करेंगे. :)
सर जी आजकल तो खुश रहना मुश्किल हो गया है....कभी कभी कही कही हफ्तों ठहाके सुनाई नही देते....