Saturday, July 26, 2008

एक घुमंतु बहक..

चिंतामग्‍न होमर के बस्‍ट पर हाथधरे चिंतामग्‍न अरस्‍तु को चित्रित कर रहे चिंतित रेम्‍ब्रां के इमेज़ से अपनी किताब 'पिक्‍चर दिस' की शुरूआत करते जोसेफ़ हेलर ने उसके भी शुरू में कहा है: "History is bunk, says Henry Ford, the American industrial genius, who almost knew none".. क्‍यों कहा? अफ़सोस में, क्षोभ में.. कि गुस्‍से की हिक़ारत में? ऐसा क्‍यों होता है कि निहायत सफल व अमीर लोगों के मन में इतिहास के प्रति सामान्‍यतया ऐसे ही आदरभाव होते हैं?

बायें, साथ लगे स्‍केच में पता नहीं कोई इतिहास- सामयिक भी- है या नहीं, जो है उसका ज़ि‍म्‍मेदार मैं हूं, मेरे हाथ की बहक है.. बड़े आकार में देख सकें, इसके लिए उस पर चटका लगाके मेरे संग आप भी बहकिए.

6 comments:

  1. प्रणाम गुरुवर - हम तो जीवनसाथी लिख रहे थे आप जीवनगाथा बांच गए - सादर - मनीष [ पुनश्च : इसे कलाविता कहें ? [:-)]]

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  2. वाकई सपने उलटे लटके पड़े हैं।

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  3. अ लिट्ल बिट ऑव सेल्फ़ प्रोमोशन...सर जी कुछ लिखे हैं डील पर.....पधारिये...और लगे तो टिपियाइए भी... http://sanhati.com/front-page/877/ पर.

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  4. @and u thought i'm dead,
    thanx, friend, will read about the deal, and get some gyaan.

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