Thursday, July 31, 2008

स्‍कूल जाने की इच्‍छा नहीं हो रही..

इन दिनों फिर कुछ ऐसा है कि स्‍कूल जाने की इच्‍छा नहीं हो रही. मतलब चिट्ठा दिनमान किंबा ब्‍लॉगवनैला बमशाली पर किसने अट्ठारहवीं पसंद की पायदान लांघकर उन्‍नीसवें में प्रवेश किया है, या किस पोस्‍ट ने ऐसा कौन सा जुगुप्‍तास्‍मक संवाद स्‍थापित करने में किन बकियों को पीछे छोड़ दिया कि एक सौ अट्ठहत्‍तर मर्तबा ‘पठनांतर’ तीस टिप्‍पणियों से विभूषित हुआ है. ब्‍लॉगउर्वरा की ऋषित्‍वप्राप्‍त इन गौरवगाथाओं के कैलेंडर को जाने क्‍यों अपने स्‍कूली झोले में संजोने में अचानक एकदम-से अरुचि हो गई है (या विरुचि हो गयी है? या विरुचिवाली अरुचि हो गयी है?). होता होगा. जीवन में ऋषित्‍वप्राप्ति का ऐसा अगौरवकारी क्षण भी आता होगा. कि इनकी टांग खींच लें और उनकी टांग पर चींटा छोड़ दें के अनंतर मुंह में स्‍वाद मिट्टी के होने का ही भरा होता होगा. तो इन दिनों कुछ ऐसा ही है. बिना टांग खींचे, और चींटा छोड़े मैं मुंह में माटीस्‍वाद लिये बैठा हूं. स्‍कूल जाने की इच्‍छा नहीं हो रही.

और बरसात के असर में ऐसा हो रहा हो ऐसा नहीं है. न किसी अन्‍य अंदरूनी बहार के असर में ब्‍लॉगवनैले बमशाली से यह बेज़ारी है. किसी छब्‍बीसवर्षीया षोड्शी ने हमारी, या अपनी, प्रणयानुभूति की ऐसी कोई अंतरंग समीक्षा करके हमें दाग़दार-बेज़ार कर दिया हो, मामला वह भी नहीं है. फिर भी ताज़्ज़ुब की बात है कि हम स्‍कूल जाने से महटिया रहे हैं. जबकि ताज़्ज़ुब की बात हमेशा यह रही है कि स्‍कूल जाने को लेकर हमारा कुछ अतिरंजित, अन्‍यथोचित उत्‍साह रहा है! लेकिन फ़ि‍लहाल अभी ऐसा है कि नहीं हो पा रहा है. उचित, अतिरंजित कैसाहू नहीं. कवि होता तो संभवत: इसीको उत्‍साह का गौरवहारा क्षण कहकर चिन्हित करता. न कर पाता तो कम से कम गौरव के तर्ज़ पर मेरे, या तेरे चंद सामान ही चिन्हित करता. फिर गौरव के पास भी कम से कम कहने को यह शिकायत न रहती कि देखिये, हमारे सामान की बालमुकुंद पैरोडी कर रहे हैं. अबकी मेलौडी हो रही है, और बाल की जगह लालमुकुंद कर रहे हैं!

मगर, आह्, सच्‍चायी है कि मेलॅडी गायब है. बैंक, बाज़ार, सड़क, संसार किसी के बारे में तीव्र या तीक्ष्‍ण विचार उपज नहीं रहे. लुंठनगर या कुंठशहर के एक बच्‍चे की चिट्ठी का भी वाजिब जवाब देते नहीं बन रहा जो बिचारा इस दु:ख में दुबला हो रहा है कि सारे बम बीजेपी वाले अपने शहरों में फोड़ रहे हैं, हमारे शहर को बम फुटवाने लायक भी न समझा गया? या नियम से स्‍केच बनाने, बनाते रहने का ख़्याल हमें इस कदर हतोत्‍साहित क्‍यों कर जाता है, या ऐसी हतोत्‍साहनाओं को लात लगाकर हम चार कदम आगे कैसे आ सकें? या जा. सकें? बड़ा लुंज-पुंज लग रहा है. सारे पुंज, खासतौर पर ज्‍योतिपुंज जैसे कहीं लुका गये हों. और बरसाती अंधेरे की वजह से ऐसा हो यह कतई नहीं है. न किसी छब्‍बीसवर्षीय बाला के अनुचित प्रणय-निवेदन से.

बस यूं ही है कि स्‍कूल जाने की इच्‍छा नहीं हो रही.

16 comments:

  1. मतलब समझ मे नही आया , आप इस उम्र मे स्कूल जाकर वैसे भी क्या करेगे ? अगर पहुच भी गये तो बच्चे बाहर निकल जायेगे जी . आजकल के बच्चे तो आप जानते ही है ना जो बात समझ मे आती है वही नही समझना वाहते और जो समझने के लिये भी आपके पास आना पडे उसको कौन समझना चाहेगा दादा :)

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  2. aap to teacher badal kar dekh lo ...

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  3. बालमुकुन्द पैरोडी कर रहे हैं. लालमुकुंद मेलोडी कर रहे हैं. जब ये बच्चे स्कूल में हैं ही तो क्या ज़रूरत है स्कूल में जाने की. बालमुकुन्द और लालमुकुंद के जिम्मे स्कूल सौंप कर आप तो बस 'ब्लागिंग' में आ जाइये. और अच्छा लगा कि स्कूल के आधे रास्ते से लौटकर वापस आ गए.....:-)

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  4. प्रणाम गुरुश्रेष्ठ.
    आपको स्कूल जाने की का जरुरत आप हुकुम करो स्कूल को ही आपके द्वारे हाज़िर करदेते हैं.
    बालमुकुन्द तो बकावास्मुकुंद है यही सब तो किया है स्कूल में और अभे भी यही करता है.
    आप स्कूल जाओ तो जरा कस के कान खेंचो.

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  5. अरे बाप रे फिर से स्कूल?अब सियरा तरकूले ने नीचे ना जायी....बम तो फटते रहेंगे...पर कमाल है कि बम की वजह से कुछ नये शहरों को पहचान मिल रही है...और स्कूल तो भूल के भी मत जाईयेगा....कौन जाने कोई बम लेके खड़ा हो....

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  6. बस मुस्करा दिये है.....ओर आपकी कलम को एक बड़ा सा सलाम ....

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  7. आज कमेंट ब्लाग पर नहीं , क्या शानदार पोट्रेट लगाए हैं अपना मजा आ गया।

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  8. सुन्दर और विचारात्मक लेख।

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  9. :) तो मत जाइये नही जाना स्कूल तो...:)

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  10. हजूर कहां ले गए इस शीर्षक के सहारे!
    मन का तो यह हाल कर दिया इस बरसाती अंधेरे ने आज कि प्रेस ही नही गए अपन तो, गोल मार दिए ;)

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  11. हमारा भी मन नहीं किया स्कूलिंग का आज। वैसे भी आज महीने का का आखिरी दिन था। हाफ़ डे हो गया सब स्कूल में।

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  12. अरुचि और विरुचि के बीच अपने बर्नार्ड शा काका को याद कीजिये। एक बार कोई उनसे पूछ बैठा कि अपनी पसंद की सौ किताबों के नाम बताइये तो बोले, "भईया अभी तो हम लिखे ही नहीं सौ किताबें।"
    कौन कहता है ब्लोगवा पढ़ने के लिये आपसे? गुरुदेव आप तो बस ऐसा शा काका जैसा कीजिये और दनादन पोस्ट डाल दीजिये। हम पढ लेंगे और प्रार्थना करेंगे कि कोई सोलह नहीं तो छब्बीस वर्षीय षोडसी इस बीच आपसे प्रणय निवेदन कर डाले।

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  13. आज हमाये स्कूल में मास्साब के घर शादी है तो छुट्टी लगा दी है. स्कूल में ही बरात ठहरी है. हम भी नहीं गये. अब दिन भर बालमुकुंद, लालमुकुंद के साथ पेरोड़ी पेरोड़ी अंताक्षरी खेलेंगे. आप भी आओ. :)

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  14. का कहे... कालेज चले जाओ

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  15. हम भी आज ओफ़िस नही गये... आज बस बासी खाने को जी चाह रहा था.. तो हमारे जैसे बालमुकुन्द बासी मान्स तलाशते तलाशते यहा आ पहुन्चे..

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  16. जाना आज हमको भी था स्कूल, कोर्स बुक्स के जुगाड़ में पर नहीं गए... आज अर्जेंसी जो नहीं है :)

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