Thursday, July 10, 2008

ओह, कैसे तो आनंद के पूर्वाभास!

यह अच्‍छा है. हिंदी ब्‍लॉगों को विज्ञापनों से कमाई होने की बातें हो रही थीं, वह कमाई तो पता नहीं कब किसी के लोकल हवाई चप्‍पल खरीदने के काम आती, उससे पहले हैकिंग की मुंह दिखाई हो गई! घबराहट (और किंकर्तव्‍यविमूढ़ता?) में जाने सुबह से मुंह के साथ-साथ लोगों ने और क्‍या-क्‍या देख लिया होगा, अपनी विहंगम कल्‍पनाशक्ति की संभावित यात्राओं से अचकचाकर इसीलिए ब्‍लॉगवाणी पर एक नज़र डलते ही मैंने दस बजे कंप्‍यूटर बंद कर दिया था, और बाद में भी बंद ही किये रखा था. शाम को देख रहा हूं डीएल कारनेगी के मौसेरे भाई दिलहज़ार नेगी युद्धजर्जर मैदान पर पानी के छींटे छोड़ गये हैं. हालांकि हैकरों पर तेज़ाब के छींटे कैसे छोड़ें, इसकी भाई दिलदार ने कोई सलाह नहीं दी है. कलकतिया शिबोकोमार मिसरा ने भी लादेन की कविताई का ज़ि‍क्र किया है, प्रसंगवश हैकरी की बेहयायी का भी कर सकते थे, मगर चूंकि तबतक शामेर चाह का बोखोत हो गया था, भलमनई भलमनसी करते-करते रह गये.

तो इसे हिंदी ब्‍लॉगिंग में रीतिकालीन अंगड़ाइयों के अलसाये कल-कल काल का अवसान व आधुनिक हड़बड़ाये, अलबलाये भयबोध का प्रारम्‍भ समझा जाये? माने अब कविता करने, एचटीएमएल सिखाने वाले ही नहीं, सीखनेवाले भी किसी क्षण, या कहें, प्रतिक्षण मुकेश गायित ‘कल खेल में हम हों न हों’ गाने को तैयार रहें? यह अच्‍छा है?

किसी भी रूप में अच्‍छा नहीं. माने ऐसी चीज़ का क्‍या मतलब कि कोई अदृश्‍य, अजानभाषी किसी के ब्‍लॉग में घुसकर अगड़म-बगड़म कुछ भी छोड़ जाये (जैसे मेरे ब्‍लॉग पर गणित के सवाल) जिसे देखने पर ब्‍लॉगजनक के व्‍यवहार में वैसा ही संकोच घर कर जाये जैसे एक पिता के अंदर हाईस्‍कूल में पढ़नेवाली अपनी छात्रा कन्‍या को किसी अजनबी की संगत में स्‍थानीय सिनेमा के बाहर मैटिनी शो के छूटने पर देखकर होता है. पता नहीं क्‍यों ऐसे पिताओं, व उनके ऐसे संकोचों की सोचकर मन प्रमुदित नहीं हो रहा. अच्‍छा होता कलुषित हो रहे ऐसे ब्‍लागाकारी पिता दुषित, दुष्‍ट मेरे दुश्‍मन होते, और मैं अपने ब्‍लॉग पर महज कुछ शब्‍द होने के, स्‍पैम शाहकार होता? अच्‍छी बात नहीं, निवाड़ नेगी ने स्‍पैम से अपने ब्‍लॉग को बचाने के कुछ नुस्‍खे सुझाये हैं, स्‍पैम बुनने और बनाने का नहीं सुझाया है!

ख़ैर, नेगीजी न सही, नागाजी हम ही सही. कूदते-कांखते एक दिन सीख ही लेंगे. अभी जीवन में कितना कुछ सीखने को है, नहीं है? आसपास कोई छुपा रुस्‍तम, कोई दबा गुरू स्‍पैमशास्‍त्र के औज़ार दाबे पड़ा हो तो कृपया इस गरीब को ख़बर करे. क्‍योंकि, इन पर हाथ की रवानी हो जाती तो अच्‍छा रहता. अमल, विमल, कमल की तो रहने दें, सारे इंद्रजीतों के माथे बसाइन, बरसाती मक्‍खी की तरह वो भिन-भिन करके सुर में गाता कि ‘कल खेल में तुम हो न तो?’, और बड़े-बड़े ब्‍लाग और बुद्धि के तोप मिनमिनाते हाथ जोड़े गुज़ारिश करते कि भइया, बाबू, ऐसा अशुभ नहीं बोलते.. ओह, ऐसी मीठी-मीठी कराहें सुनना कितना आनंदकर रहता!..

4 comments:

  1. आप भी ना किन डरावनी कविताओं को पढ़ने की सुझा देते हैं ? अब रात भर हम डरते रहेंगे। :(
    घुघूती बासूती

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  2. हवाइ चप्पल वाली बात सही रही ........

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  3. बड़ा खराब समय आ गया है प्रमोदजी। जिसे देखो वही कविता कर रहा है। यह भी एक तरह की स्पैमी ही है। है न!

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  4. सामेर चाह का बोखोत होने से कविता से अच्छा और क्या हो सकता है? हैकरी की बेहयाई के बारे में क्या लिखें? हमें कुछ पता ही नहीं है. सबसे बढ़िया कविताई ही है.

    हाँ, मुकेश बाबू का गान तो काल से होम भी गा राहा है...काल खेल में होम हो ना हो....गोर्दिश का दीन चाल राहा है ना...

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