Thursday, August 28, 2008

मौसमी बुखारी बयारों के बीच हाईकू..

नज़रे-इनायत हमीं पर हुई है सोचकर हीरोइन की साड़ी खींचने के बाद हीरो से कुचवाये मदन पुरी और प्रेम चोपड़ा की तरह इतरा रहा था, फिर ख़बर हुई कि आसपास और लोग भी हैं, ज़्यादा खांस-खखार रहे हैं, नाक सुड़ककर, या फिर तीन हाथ की दूरी पर नाक फटककर, बेदम हुए जा रहे हैं.. फिर फ़ाईल खोल ले रहे हैं, या फिर, मेरी तरह प्रतिभाशाली हुए तो, मन ही मन हाईकू दोहरा रहे हैं. ज़ाहिर है जो नहीं हैं वे कैसी भी हाई पाने की बजाय सिर्फ़ दर्द में दोहरे हो रहे हैं..

नाक सुड़कते हुए, या खांस-खांसकर दायें-बायें गिरते हुए एक सच से जो साक्षात हुआ वह यह है कि हाईकू लिखने के लिए आपको अज्ञेय की तरह ‘कितनी नावों में कितनी बार’ की यात्रायें नहीं करनी पड़ती, न लक्ष्‍मीधर मालवीय की तरह जापान में जाकर रहने की ज़रूरत होती है. नाक सुड़कते रहने की बेदमावस्‍था में भी आप हाई का क्‍यू और क्‍ल्‍यू पा सकते हैं. हां, शर्त सिर्फ़ इतनी सी है कि आप मेरी तरह प्रतिभाशाली हों!..

तो हाई काय कू की भूमिका-टूमिका के बाद नीचे अब असल माल संभालिये-
तुमसे मिलकर मैं कहां पहुंचा हूं. इतने वर्षों तैरती रहीं रहगुज़र में, घर पहुंची हो? कि अकुलाहट डोलता, सकुचाया पहुंचेगा किनारा तब भी यही दीखेगा कि चोट खायी डोंगी के साथ डर पहुंचा है?

सब जानते हैं, मालूम है बहुत ठेलम-ठेल हुर्रम रेलम-पेल, फिर भी शीश झुकाये, हाथ सटाये विनम्र प्रार्थना करता हूं हे रेल, इन्‍हीं जानी-पहचानी आततायी, सुहानी मनबवंडर छटाओं के बीच देती रह कहीं आगे ठेल, मन में बना रहे कौतुक, सतरंगी बहिरंग से होता रहे हेल-मेल, मन के अंतोनियन जेल से बाहर देखते रहें जीवन के हीरे, हारे-हत्‍यारे खेल!

चिरई रानी गोदी में सुला ले, बबुनी मेमना अपनी आंखों का झक्‍क् अंजोर पिला दे. बाबूजी हंसकर फ़ोन कर दें और प्रियंका चोपड़ा हमारे उधार पटा दे.

आपने हंसकर कहा आप हमारी तक़लीफ़ समझते हैं. हमने रो-रोकर जाना आप सचमुच समझदार हैं!

Wednesday, August 27, 2008

अन्‍यतम के अनंतर..

अनामदास हमारे मित्र हैं. अन्‍यतम अंतरंग हैं (कहने का मतलब हमारे जीवन में जो तम है, और जिस-जिससे है, उसमें वह नहीं हैं, अन्‍य हैं. दूसरे, हमारे अंत का क्‍या रंग होगा इसकी उन्‍हें ख़बर है, और वैसा अंत किसी तरह से अपने जीवन के समीप न आने दें, उनके व्‍यक्तित्‍व में यह समझदार दुनियादारी है, और इसके लिए वह सराहना के पात्र हैं). अपने नौकरीदाताओं की रंगदारी का सजग समझदारी से टैकलिंग करने का जिम्‍मा अपने कांधे लिये रहना शायद वजह है कि इन दिनों वह अपने ब्‍लॉग पर बहुत लिख नहीं पा रहे. बीच-बीच में लिखते हैं तो भावुकता का पुराना बेना झलते दीखते हैं. जैसे फिर उन्‍होंने ‘हाथी पादो, आया भादो का कादो!’ लिख मारा है. क़ायदन होना चाहिये था मैं भादो की बड़ी-बड़ी बूंदों की सोचकर भावुक हो उठता, मगर हो नहीं पा रहा हूं. हो सकता है अन्‍यतम अंतरंगता आड़े आ रही हो. पहचान के एक जल-इंजीनियर लड़के ने पटना पहुंचकर आसपास बाढ़ की तबाही के कुछ लौमहर्षक वृतांत भेजे हैं. दिल्‍ली के एक अन्‍य सांस्‍कृतिक पत्रकार मित्र ने चार दिन पहले पटना से जल-भराव, व मन के हीनभाव की कुछ वैसी ही अप्रीतिकर रिर्पोट प्रेषित की थी (कि कालीदास रंगालय में नाट्यमंचन चल रहा था, दर्शकदीर्घा के सीटों की अगली पांच पांते जलमग्‍न थीं, नाटक के साथ-साथ पैरेलली मोटर से जल बहरियाने, व सक्रिय अभि‍नेताओं के ठीक बाजू में किसी छोटे बच्‍चे का पानी में दह गये अपने चप्‍पल-खोजन का मंचन भी चल रहा था!).

बिहार की बाढ़ का पता नहीं राष्‍ट्रीय अख़बार कैसा कवरेज़ कर रहे हैं. पटना से इंजीनियर बच्‍चे ने बताया मृतकों की सरकारी गिनती पचहत्‍तर से डेढ़ सौ के बीच घूम रही है, जबकि कहनेवाले दो हज़ार लोगों की मौत कह रहे हैं. पटना की सड़कों पर रिक्‍शे में टहलते हुए दिल्‍ली के पत्रकार मित्र की टिप्‍पणी थी कि जिधर देखो, गंदगी का अंबार नज़र आता है, लगता था मानो लोगों ने सबकुछ देख-देखकर बर्दाश्‍त करते रहने का आंखों को अभ्‍यस्‍त कर लिया है. यहां-वहां कुछ लोग होंगे जो नितिश कुमार की इस और उस कसरत की गुण-व्‍याख्‍या कर रहे थे, बकिया के ज़्यादों ने जैसे भविष्‍य के बारे में किसी तरह के आशावाद को निरर्थक मानकर जीवन जीते रहने की घुट्टी पी रखी हो.

मैं अनामदास की भावुकता को कनखियों से देखकर उंगलियों से तौल नहीं रहा. उन चंद लोगों में एक वह भी हैं जिनका लिखा पढ़ना मुझे अच्‍छा लगता हैं. मगर यह भी सच्‍चायी है कि हाथी के पादों व बड़ी-बड़ी बूंदों वाले भादो की रससिक्‍तता में बहकर भी मैं भावुक नहीं हो पा रहा. झुंझलाइल और गुस्‍साइल फ़ील कर रहा हूं. बिहार में, उड़ीसा में, पड़ोस के बांग्‍लादेश में ज़रा सा पानी क्‍या नहीं बरसता, तड़ातड़ तबाहियों का चार्टलिस्‍ट तैयार होने लगता है. सभ्‍यता जम्‍बोस्‍पीड से दन्‍न् से पांच सौ वर्षों पीछे चली जाती है. एक अदद जीवन हाथ से तिल-तिल छीन रहे व्‍यक्ति का मन यह जान ही जाये तब्‍बो कहां से प्रमुदित होगा कि देश में तरक़्क़ी हो रही है, छिहत्‍तर शहरों में कॉलसेंटर खुले हुए हैं, पीछे-पीछे सपना मॉलसेंटरों का है. बाढ़-वध का पता नहीं कहां सेंटर है.

जलहारे, बाढ़-बुहारे बिहार में एक बेचारे हाथी की पदाई भी कैसी कड़वायी हो गयी है! अंतरंगता अपने साथ कभी-कभी कैसे बीहड़ तक़लीफ़ लेकर आती है..

(ऊपर की तस्‍वीर बाढ़ग्रस्‍त बांग्‍लादेश की है, बीबीसी के सौजन्‍य से)

Tuesday, August 26, 2008

ल्‍युनिग का लात खाया लोकतंत्र..

चार-पांच वर्ष हुए जाने किस गुमनाम चैनल पर माइकल ल्‍युनिग पर एक छोटी, प्‍यारी डॉक्‍यूमेंट्री देखी थी. ऑस्‍ट्रेलिया के पुराने मिजाज़ के कार्टूनिस्‍ट हैं, कवितायें लिखी हैं और जाने क्‍या-क्‍या खुराफात किये हैं. खोज में तभी से था, हाथ अब जाकर चढ़े हैं. किसी कार्टून की किताब नहीं, डेढ़ेक मिनट का एनिमेशन है. आप भी आंख पर चढ़ायें, और फिर या तो लोकतंत्र को गरियायें, या ल्‍युनिग को.

Sunday, August 24, 2008

कितना नहीं लजाइये? खाली थेथरई में गाल बजाइये?..

अल्‍लसुबह से लाऊडस्‍पीकरों पर ‘आला रे!’, ‘ग्‍वाला रे!’ के बम फूट रहे हैं. पीछे-पीछे कान्‍हा के पुण्‍य प्रसूत कीचड़ और कमरबल के शहादती बाने में मटकियां फोड़ रहे हैं. या साढ़े चवालीस फीट की ऊंचाई पर मटकियों तक पहुंचने से पहले ही, कर्तव्‍यविमूढ़ता की एक ख़ास प्रौढ़ता के असर में अदबदाकर लड़खड़ा जा रहे हैं. मटकियां फूटने से रह जा रही हैं, आसपास के छतों, मुंड़ेरों पर विराजे दर्शकजनों का जुगुप्‍सापीड़ि‍त बालसुलभ मन टूट जा रहा हैं, या चंद अभागों का बालसुलभ मटकानुमा सिर. फूट रहा है. मैंने कल ही फोड़ लिया था. कायदे की मटकी नहीं थी, मेरे पापसुलभ हसरतों की छोटी भड़ुकी थी; छोटी ही रही होगी जभी शायदा ने टिप्‍पणी की थी बस?- मगर भड़ुकी में दही नहीं, मेरे पापमयी मन का फटा दूध था और शर्तिया वही था, जभी शुकुल पंडिजी ने इशारा किया कि ससुर, क्‍या लिखते हैं (मतलब अंडबंड क्‍यों लिखते हैं कि ऐसी मातमी उदासी फैल जाये?)..

शायदा के तंज की मैं ठीक-ठीक कितनी थाह पा सका नहीं कह सकता, लेकिन शुकुलजी की उदासी समझ आयी वाजिब है. किसी पर लात चला लेने के अरमान, किसी पर थूक सकने की इच्‍छाओं के गौरवगान की पतनशील, या कैसी भी शील-शॉलविहीन, ठुमरी-ठप्‍पा कुछ भी क्‍यों होनी चाहिये? लोग लाड़ में ज़रा सा गोद में चढ़ा लेते हैं इसका मतलब हम सब-कहीं गीलाई फैलाना शुरू करें? हक़ बनता है? किसने दिया है?.. पड़ोस के दोस्‍त तक से मिलना आज के दिन दुश्‍वार बना रहता हो, तब वर्चुअली जो हम पर गाहे-बगाहे आकर स्‍नेह का लोटा ढुलका जाते हैं, उनपर हमारा अपना फटा दूध उड़ेलना ज़ायज है? कहां तक है? इतना बालसुलभ मैं भी नहीं कि नहीं जानता नहीं है, मगर जैसाकि घुघूतीजी बासुतीजी बीच-बीच में नियम से हमें याद दिलाती रहती हैं कि हमारा लिखा आकर पढ़ भले जाती हों, समझ नहीं पातीं, हम भी उन्‍हें याद कराना चाहते हैं कि बीच-बीच में अकबकाकर, घबराकर मटकी फोड़नेवाले ही अपने सिर का मटका नहीं फोड़ते, हमें भी अपना फुट अपने मुंह में डाल लेने की बीमारी है, और पतितावस्‍था के दर्शन सिर्फ़ बाहर की दिशा में देख-देखकर ही नहीं होता रहता, अपनी दिशा में देखते हुए भी बहुत बार सिर नवाकर पता नहीं कहां छुपा लेने की छटपटाहट होने लगती है. सिंक से लेकर बाथरुम और सिरहाने के तकिये सब कहीं फटे दूध और फटे दही की महक छूटने लगती है और देर तक छूटती रहती है, हम घबराकर चिंतित होते रहते हैं कि रचना ने हमें गिन-गिनकर गालियां क्‍यों नहीं दी. या सुजी ने चप्‍पल फेंककर मारा क्‍यों नहीं. या बेजी ने तमककर कहा क्‍यों नहीं कि इसी तरह से तुम्‍हारे पैर, बाल और उसके बाद खाल खींचूं तो? आईंदा मेरी कठपुतलियों की तरफ मत आना, नालायक, क्‍योंकि आओगे तो मेरे ब्‍लॉग पर काला कपड़ा गिरा मिलेगा!

बेजी कहेगी तो गलत नहीं कहेगी. क्‍योंकि गुस्‍सा पारुल को नहीं आया समय की इतनी दूरी पर सोचकर मुझे आ रहा है. मटकियों को फोड़ने का तो समय निकल गया मगर सोचता हूं सिर पर काला कपड़ा चढ़ाकर दीवार पर सिर फोड़ने का शायद अभी बचा हुआ है. भीतरी झल्‍लाहट पर शायद उससे कुछ रहमी छींटें पड़ें! पड़ेंगे? तीन-तीन बच्‍चों की मां हुई लड़कियां मुझ निर्बुद्धि के छंटाक भर के सेंस ऑफ़ ह्यूमर पर क्‍या बच्‍चादार हंसी हसेंगी. याकि मैं ही बुर्जू़गवार रोऊंगा?

Saturday, August 23, 2008

हसरतें..

होने को किसी टीवी सीरियल का टाइटल हो सकता था, फ़ि‍लहाल हमारी इच्‍छाओं का है. इच्‍छाओं से ज़्यादा कहिये इच्‍छाओं के गिल्‍टी प्‍लेज़र्स. हालांकि गिल्‍टी प्‍लेज़र्स में लोग छुप-छुपके प्‍लीज़ होते हैं, मुझे छिपने की बहुत वजह नहीं दिख रही. या हो सकता है मुंह, व मुंह से जुड़े देह के अन्‍य हिस्‍सों को, छिपा पाने के पर्याप्‍त जगहाभाव को मैं वजहाभाव में छुपा रहा होऊं? वैसे अपनी सारी चिरकुटइयां छिपा जाऊं, साथ ही सार्वजनिक तौर पर मलंग, ट्रांसपरेंट छवि भी बनी रहे, एक हसरत तो ससुर यही है, लेकिन ये जेनेटिक है, मेरे निज की ऑथेंटिक नहीं है. पोस्‍ट उस ऑथेंटिक संसार, हसरती मलांबार का स्‍केच उकेरने को लिख रहा हूं..

पहली हसरत तो यही है कि मैं लात चलाऊं, लोगों के सिर पर थूक दूं और वे बुरा न मानें. अपनी गलती या चिरकुटई से बुरा मान भी लें तो पलटकर मुझे गाली न दें. गाली दें भी तो उन चंद पलों के लिए उनके मुंह में पिल्‍लू व मेरे कान में सहज बहिरपना उभर आये. पारुल घबराकर इधर-उधर सबको सफ़ाई देती फिरने लगे कि हमने खुली क्‍या बंद आवाज़ में भी नहीं गाया था, जाने अज़दकजी बहिरपना की बीमारी कहां से उठा लाये! नर्स बेजी छिनककर बोले मैं भी बिहार में रही हूं तो हमको पट्टी मत पढ़ाओ, पारुल कुमारी. इतने दिनों से देख रही हूं गा-गाकर अज़दक का जीवन हलकान की हो (मैं कठपु‍तलियां बना-बनाके नहीं की हूं), बीच ट्रैफिक में खड़े होकर भी हमारे मन का वेवलेंग्‍थ कैच कर लेते थे, अच्‍छा-खासा कान हुआ करता था पता नहीं क्‍या राग गा दी हो कि हमारे हाथ से निकल गया है..

नर्स और गवाइन में जमके चिकचिक होती, मैं छत पर लौंकी के बचके चुभलाता, तेज़पत्‍ते की चाय की चुस्कियों में मुंह बनाता, बाल‍सुलभ को अपनी कवितायें डिक्‍टेट कराता, या दूसरों की ऐसी की तैसी कराता, मज़े में गोड़ डोलाता चहक रहा होता; पड़ोस के छत पर स्‍वर्णलता घोषाल अपने खुले केश काढ़ती उदास उलाहना देती कि लोडशेडिंग में वैसे भी दिन कहां कट पाते थे, तुम्‍हारे विरह में तो मैं ही रोज़ कटी-कटी जा रही हूं, दिन नहीं कट पा रहे, आमार मोनेर शामी? मैं फुदककर उफनता कि चुप कर, चोट्टी! अपने बाल देखी है? और मेरा रूप? तेरी हिम्‍मत कैसे हुई खुले में इस तरह मुझे प्रोपोज़ करने की? स्‍वर्णलता घोषाल इस पर बिलखती, मुझे गालियां देती, जोकि मुझे सुनाई नहीं पड़ता, मासी मां के पास भागी-भागी मेरी शिकायत लेकर जाती. जबकि मासी मां सर्द आह भरकर कहतीं शोब कोसूर तोहादेर, शोर्णलोता, वह तो लाखों में एक है, बेटी! इस तरह मेरे हसरतों को पंख मिलते. या मैं उन्‍हें पंखा झलता.

चिढ़कर मेरे बच्‍चों का ट्यूशन करने आयी सुजाता से शिकायत करता कि यही सब सिखाया है तुमने लड़कियों को कि हर कोई हमें खुल्‍लमखुल्‍ला प्रोपोज़ करता रहता है? सुजाता अपने दर्दीले सिर, या विचारों पर हाथ फेरती थकी आवाज़ में कहती मैं तुम्‍हारे बच्‍चों व तुम्‍हारी पतनशीलता दोनों से थक गयी हूं, प्‍लीज़ मेरे तीन महीनों का हिसाब करो, मैं आईंदा इस छत पर फिर पैर रखना नहीं चाहती! मैं एकदम से फैलकर उठ खड़ा होता- तो ये बात है छम्‍मक छल्‍लो? सारा संबंध पैसों का था, सारा प्रेम.. ? पता नहीं कहां से उड़कर (अरुणाचल से?) प्रत्‍यक्षा पहुंच जाती और सुजाता को पीछे खींचते हुए कहती अरे, ऐसे गंदे आदमी से मुंह लगाकर कोई फ़ायदा नहीं, सुजी, मैंने पार्क में पानी के लिए एक सौ पचहत्‍तर दिये हैं, तेरे तीन महीनों की मेहनत का नहीं दे सकती? तू हट यहां से..

मैं सन्‍न होकर सोचता आजतक हमारी खातिर एक हवाई चप्‍पल तक नहीं खरीदा इसने और ज़रा बात करने का इसका तरीका देखो? और उसी सन्‍नावस्‍था में बालसुलभ को हतप्रभ देखता रहता कि इसी और ऐसियों से न मिल पाने के ग़म का तुम, ससुर, पोस्‍टर छाप रहे थे, शर्म आनी चाहिये तुम्‍हें!

नहीं आती. बालसुलभ को शर्म क्‍या कुछ भी नहीं आता. मुझपर दीवानापन चढ़ता रहता. अरमान परवान चढ़ते रहते. हसरतें उड़ती रहतीं.

आप सुलगते रहते. मैं चमकता रहता.

Friday, August 22, 2008

अबरार और मंजरी: पांच

ऐसा नहीं है कि रूहानी, गहरे इश्किया असमंजस व चोटों का मंजरी को पहली मर्तबा अनुभव हुआ था, और मेरी मार्फ़त हो रहा था. मेरी मार्फ़त अन्‍नोयेंस भले जेनरेट हो रहा हो मगर वजह मैं इश्किया इंतिहा होऊं इसका इस खाक़सार ने कभी यकीन नहीं किया. जहां तक मंजरी की बात है तो वह बहुत पहले आशा भोंसले का ‘चैन से हमको कभी आपने जीने ना दिया..’ अपनी आंखों में गा और जी चुकी थी..

मेरी जानकारी में अनंत नाम के जिस पहले शख़्स को वह सीरियसली चाहती रही थी, वह कुछ अर्से बाद उससे भी ज़्यादा सीरियसनेस से किसी दूसरी लड़की के पीछे परीशां और उदास-उदास रहने लगा था. इस हक़ीक़त से रूबरू होते ही पहले तो मंजरी सन्‍न रह गयी थी, शायद पहली दफ़े देख रही थी कि मीठे तजुर्बों का कोई ऐसा कड़वा एंगल भी हो सकता है, फिर सरेऑफ़ि‍स अपने सांवरिया बालम की वह ऐसी की तैसी की और इतनी की थी कि वह भलामानस अनंत अपनी नौकरी व ठिकाना बदलने को मजबूर हो गया था. उस वक़्त भी मंजरी सन्‍न ही रही थी, और अपनी सन्‍नता से बाहर न आने व खुद को नये हालातों के मद्देनज़र बदल न पाने की मजबूरी में फिर लंबी छुट्टी लेकर घर बैठ गयी थी..

कोई मिलने पहुंचता (नावेद, खोसला और ताप्‍ती पहुंचते थे, बाकी किसमें इतना हिम्‍मत और हौसला था) तो वह दरवाज़ा नहीं खोलती. कभी एहसान करके खोल ही देती तो महज़ इसे जगज़ाहिर करने के लिए कि देखो, ऐ ज़मानेवालो, मैं किस कदर ज़ार-ज़ार रोती रही हूं, इतने और उतने दिनों से मुंह में अन्‍न का एक निवाला नहीं डाला है!

इस लंबी गैरहाज़ि‍री को आड़ बनाकर सक्‍सेना, मंगेश, तपासे सब लड़की को बाहर करवाने की जुगत में लगे रहे (बेचारे तपासे को मंजी ने आजतक माफ़ नहीं किया है, इतने वर्षों बाद वह अब भी उससे बात करने से इंकार करती है, और इकलौता एक वाक्‍य जो कभी तपासे की सुन सकने के हद में इस्‍तेमाल करती भी है तो वह तपासे और कोयले के रंग में कितनी समानता है की बाबत होता है!), अलबत्‍ता नैयर साहब की दयानतदारी और मंजरी के भीतरी पुराने सॉलिड जोड़तोड़ का करम था कि उसकी लंबी गैरहाज़ि‍री उसकी नौकरी छिनने का सबब नहीं बनी..

एनीवेज़, तो इस तरह मंजी दीदी की ‘आह, अनंत!’ की यह कहानी कुछ लंबी खिंची. लड़की की छुट्टि‍यों के दिन खिंचते चले. एक दिन ताज़ा-ताज़ा डेटॉल से हाथ धोकर मैं बाथरुम से ‘जंगल में मोर नाचा किसने देखा..’ गुनगुनाता, चहकता बाहर चला आ रहा होऊंगा कि मंजी आपा अपनी मेज़ के गिर्द मुस्‍कराती दिखीं. चपल चुहल से सारे दिन सबका हाल-चाल लेती रहीं. और लोगों के आगे-पीछे मैंने भी सलाम बजाने की रवायत पूरी की. अनंत संज्ञा का एक मर्तबा ज़ि‍क्र तक नहीं आया. न लवाने की किसी दूसरे की किसी कोशिश की आपा ने सूरत निकलने दी. दिन बीता. उसके पीछे फिर और-और दिन बीते. बीच-बीच में नावेद फ़ाइलों को दुरुस्‍त करता बेग़म अख़्तर को गुनगुनाता ‘इश्‍क तेरे अंज़ाम पे रोना आया..’, और उसके इस गुनगुनाने पर किसी ने सर्द सांसें भले भरी हों, किसी ने उसे गालियों से नहीं नवाजा. गालियों की गोली मेरे हिस्‍से आनी थी!

एक दिन गलियारे में सिगरेट की राख झाड़ता जाने बाहर ऐसा क्‍या खुशनुमा देखकर मैं रफ़ी साहब की आवाज़ में बहक रहा था ‘बहारें फिर भी आयेंगी..’ कि अचानक पांच हाथ की दूरी पर जनाना आवाज़ में गालियों का बरसना शुरू हुआ. बाद को ख़बर हुई मेरे बहारों के फिर भी आने के फ़लसफ़े पर मंजी आपा को सख़्त एतराज़ था. इस बाबत सोचकर पहले मुझे ताज़्ज़ुब हुआ फिर नहीं भी हुआ. सीधी बात थी मंजी दीदी मेरे गाने का कैसा भी इंटरप्रिटेशन करतीं, वह जायज़ होता. इससे ज़रा आगे की एक और सच्‍चायी यह भी थी कि दीदी और मेरे बीच कभी बनी नहीं. मुझे वह निहायत बहारहीन व्‍यक्ति समझतीं. उससे ज़्यादा मुझे सोचने के काबिल समझा तो आवारा और असामाजिक समझतीं. रही मेरी बात तो मैं बहुत सीधे-सीधे अपनी और उनकी दुनिया के फ़ासले और फर्कों को समझता, और उस लिहाज़ से संभालकर चलता था. तभी उन दिनों सीन में मेरे पुराने अहमदाबदिया आर्टिस्‍ट दोस्‍त रंजीत देसाई की एंट्री हुई..

शहर में उसकी पेंटिंग की एक्जिबिशन लगी तो भावुकता के उत्‍साह में मैंने दफ़्तर में भी कुछ लोगों को ओपनिंग के इनविटेशन लेटर दिये. मंजरी को ख़बर करूं ऐसा ख़्याल भी नहीं आया था, मगर ओपनिंग के दौरान नावेद को इंट्रोड्यूस करने की खातिर मैं रंजीत को लेकर उसके पास पहुंचा तो देखता हूं मंजरी मैडम उसके पीछे खड़ी हैं और हमारी तरफ़ देखकर मुस्‍करा रही हैं. तीन दिन बाद देर रात फ़ोन पर रंजीत से बात करते हुए ख़बर हुई कि वह होटेल से सामान हटवाकर किसी हसीना के यहां टिका हुआ है, और हसीना कोई और नहीं अपनी मंजरी मैडम हैं! मैं शायद सीरियसली डिसओरियेंट हुआ होऊंगा जभी हिंदुस्‍तानी में 'इश्‍क तेरे अंजाम पे रोना आया' की जगह स्‍पानी गुनगुनाने लगा होऊंगा. या गुनगुना कोई पुराने बुर्ज़ूग रहे होंगे, मैं फकत आंखें फाड़े सुन रहा होऊंगा..



(जारी)

Wednesday, August 20, 2008

हरे हरे घाव हरे!..

जो बंधुवर नियम से अदबदाकर मेरे ब्‍लॉग चले आया करते हैं, फिर भले घबराकर सत्‍तावन सेकेंड बाद चले भी जाया करते हैं, मैं उन सभी उदारमना (या मनी?) व उजबकधनियों से क्षमाप्रार्थी हूं. क्‍योंकि विगत चंद दिनों की सच्‍चायी रही है कि मैं स्‍वयं अदबदाकर, घबराकर, या गोड़ सहेज-संभालकर भी अपने ब्‍लॉग तक नहीं आ सका हूं. दरअसल सच्‍चायी यह है कि खाने के लिए, या खानों की जुगत भिड़ाने के लिए कहीं जाने से अलग मैं कभी भी नहीं जा सका हूं. घुटने में दो कौड़ी की एक चोट क्‍या लग गयी उसको जतन से संभालते-संभालते फ्लोरेंस नाइटिंगिल हो रहा हूं. अभी पूरी तरह से नहीं हुआ हूं, नहीं तो स्‍वाभाविक था इन पंक्तियों को बीच में रोककर आपके लिए ‘नाइटिंगिल, नाइटिंगिल लिटिल स्‍टार!’ का नर्सभरी गीत गाने लगता. आप उजबकधनी न होते तब भी सत्‍तावन सेकेंड से पहले ही कहीं जाने लगते. या खदबदाने. कुछ मुंह बिराने लगते. उनके लिए कहनेवाले दिलदार कह गये हैं खिसियानी बिलार खंभा नोचे. मैं गोड़ पर सेवलॉन मिला रुई बोरता, और फिर सहेज-सहेजकर घुटने पर यूं पट्टी चढ़ाता मानो बंबई के इस बरसाइल उमगते मौसम में नहीं सुलगते कश्‍मीर की खाजखायी देह पर चढ़ा रहा हूं! ओह, व्‍हाट ए पट्टी टाईम!

मगर पट्टि‍यों की दुलराहट, व इस बेमतलब अकुलाहट को दरकिनार करके कहें तो पूछनेवाली बात है कि आदमी घुटने न तुड़वाकर भी अंतत: कहीं पहुंचता है? कहां पहुंचता है? पहुंचता होगा हज़ार-लाख वर्षों में, एक अदद तुरईभर जीवन में पड़ोस की जनाना या लोकल थाना के अंतरंग दीवाने-खास तक भी पहुंच जाये, ससुर, मदमाकर मोहम्‍मद रफ़ी होने लगता है, बकिया मुकेशवाला बालकिशनी गाते रहते हैं, पहुंचते कहां हैं? इदर वे- विथ टूटा हुआ घुटना ऑर विदाऊट. लाइफ़ हैज सच स्‍ट्रेंज पैथोज़. ऑर पैथेटिक पैटर्न्‍स. उनके पीछे हम संभल-संभलकर चलते रहते हैं, या आंखें मूंदे. नतीजा कुलजमा वही होता है पहुंचते कहीं नहीं हैं. या पहुंचकर अदबदाहट में मोहम्‍मद रफ़ी वाला गाने भी लगें, जल्‍दी ही मुकेशवाले- ‘दुनिया बनानेवाले क्‍या तूने दुनिया बनायी..’ पर लौट पर ही आते हैं.

दूधनाथ सिंह की एक किताब का शीर्षक है- ‘आ, लौट आ ओ धार!’. शीर्षक गलत होगा तो दूधनाथ के पुराने छात्र-प्रियवर बोधिसत्‍व करेक्‍ट करेंगे (नहीं होगा तो भी करेक्‍ट कर सकते हैं). इन दिनों अलसाये, उनींदेपने में अचकचाकर लगता है शीर्षक मेरे आंतरिक प्रार्थनाओं की ही कुहरीली गुहार है, छिपा हुआ आत्‍मावलोकन का प्रोवोकेटिव पैम्‍फलैट है. मैं कन्‍फ्रंट करने की जगह घुटने की पट्टी करता फ्लोरेंस नाइटिंगिलपने में संतत्‍व प्राप्‍त कर रहा हूं. जबकि कश्‍मीर के साथ-साथ मेरी आत्‍मा जल रही ही है. लेकिन अपनी छुद्र चिंताओं में दहला हुआ मैं पता नहीं उचित मात्रा में उबल क्‍यों नहीं रहा. दो कौड़ि‍या फिलॉसफ़ाई में स्‍वयं को सिंपलीफाई, फिर सहजता से जस्टिफाइ किये जा रहा हूं? बहल रहा हूं. उगलने की जगह सिर्फ़-सिर्फ़ निगल रहा हूं. एक अदद घुटने के पीछे ब्‍लॉग क्‍या मैं समूचा गिरा हुआ हूं?

शायद कहनेवाले समझदार इसी को कहते हैं ठहरे हुए समय का सुर. या बेसुरा संगीत. कहनेवालों ने नहीं भी कहा तो घबराकर मैं कह दे रहा हूं!

Friday, August 15, 2008

फ़ि‍ल्‍म ओ फ़ि‍ल्‍म!..

जुसेप्‍पे ने मेरे सवाल को अनसर नहीं किया. उसने मेरी बात नहीं सुनी, या सुनी तो उसे जवाब के काबिल नहीं समझा. रैक पर बिखरे पुराने अगड़म-बगड़म के बीच उंगलियां फेरता जाने क्‍या ढूंढ़ता रहा. जुसेप्‍पे को जब कभी डिटैच्‍ड, गुमसुम, जाने किस भाव में इस तरह आत्‍मलीन देखता हूं तो मेरे भीतर अंतरंग एक दूसरा कोहराम उठ खड़ा होता है. इच्‍छा होती है उसके पीठ के पीछे ईज़ल सजाकर एक्रीलिक से अंतर्लोक की मीठी उदासियों के गहरे भूरे, घनेरे लैंडस्‍केप उकेरता चलूं.. बड़े शीट पर रंगों का कुछ ऐसा जादू उतार डालूं कि जुसेप्‍पे की अस्थिर, अनमनस्‍क आंखें भी उसकी मिठास में भीग जायें!

- जुसेप्‍पे! जुसेप्‍पे!

हूं?- जुसेप्‍पे ने मेरी दिशा में उड़ती सी एक नज़र डाली, फिर रैक से अदूर गोपालकृष्‍णण पर एक पतला-सा मोनोग्राफ़ उठाकर पलटने लगा.

मैंने उसकी उदासी नज़रअंदाज़ करके कहा- कुछ पेंटिंग करें? तुम कुछ लसान्‍या बना लेना, या उल्‍टी-सीधी खिचड़ी ही सही, मैं पेंटिंग करता हूं, क्‍या कहते हो?..

जुसेप्‍पे चुप रहा, कुछ पलों बाद इंकार में सिर हिलाया, फिर मोनोग्राफ़ पर आंख गड़ाये-गड़ाये मुझे इत्तिला दी- तुम कभी फ़ि‍ल्‍मेमेकर नहीं बनोगे. तुममें वह मैडनैस नहीं है. छोटे-छोटे स्‍केचेज़ उकेरकर तुम सुखी हो जाते हो. छोटे-छोटे ब्‍लॉक्‍स में धीमे-धीमे एक बीहड़ संसार बुनो, ऐसा पर्सिसटैंस तुममें नहीं है, व्‍हाई?..

मेरा सारा उत्‍साह काफ़ूर हो गया. मुंह में बिना शक्‍करवाली काली स्‍ट्रॉंग फिल्‍टर्ड कॉफ़ी की कड़वाहट उतर आयी- मुझे झगड़े के लिए प्रोवोक मत करो, जुसेप्‍पे. इट्स नॉट अबाउट आइडियाज़, फ़ि‍ल्‍ममेकिंग इज़ एन एक्‍सपेंसिव मीडियम एंड यू नो व्‍हाट मनी आई हैव ऑर डोंट..

मेरी बात के खत्‍म होने के पहले ही जुसेप्‍पे ने असहमति में सिर हिलाना शुरू कर दिया. मानो ऐसे तर्कों को उसने पहले भी दसियों मर्तबे सुना हो और बहुत पहले उन्‍हें गंभीरता से लेना बंद कर चुका हो. बुदबुदाहटों में कहता रहा- मनी इज़ नेवर ए प्रॉबलम. नॉट फ़ॉर यूअर क्‍लास ऑफ़ पीपल. दिक़्क़त दूसरी है. आंतरिक है. कमज़ोरी की, कायरता की. इनिशियेटिव लेने से सकुचाते रहने की. घबराते रहने की. उससे यही होगा कि दिमाग में फ़ि‍ल्‍में बनेंगी, बनती रहेंगी; छोटी, बड़ी, किसिम-किसिम की, वास्‍तविक जीवन में उनकी मेकिंग नहीं होगी!

मैं चिढ़कर कमरे से बाहर निकल आया. कातर मन एकदम खट्टा हो गया. इच्‍छा हुई पलटकर जुसेप्‍पे को दो तमाचे लगाऊं.. या जाकर दीवार पर सिर मार लूं..

अच्‍छा तमाशा है फ़ि‍ल्‍ममेकिंग! क्‍या करना है मुझे फ़ि‍ल्‍मों का.. न खुलकर सामने आता है.. और नहीं आता तो न आये, फिर पूरी तरह गायब ही क्‍यों नहीं हो जाता? और ऊपर से दोस्‍ती ऐसी कि आपकी अंतरंग पपड़ाये तक़लीफ़ पर तेजाब उड़ेले! अच्‍छा हुआ मैंने रात का ख़्वाब जुसेप्‍पे से कहा नहीं था.. वर्ना बैठे-बिठाये वह भी प्रहसन-प्रसंग बनता! ओह, दिमाग़ में उन इमेज़फ्रेम्‍स को घुमाते हुए कैसा तो अनूठा आनंद हुआ था.

काले स्‍क्रीन पर सफ़ेद टाइटल्‍स के बाद के घुप्‍प अंधेरे में एक लड़की के उदास चेहरे का बड़ा क्‍लोज़अप. या एक बच्‍चे की भटकी हुई आंखें. और नेक्‍स्‍ट कट- स्‍ट्रेट जंप इन टू द हार्ट ऑफ़ हिस्‍टरी. न नर्व, नोडल पॉयंट ऑफ़ अवर टाईम, अवर मिज़री.. समथिंग लाइक दैट.. इन इमेज़ेस के जक्‍स्‍टापॉज़ि‍शन से कैसी तो अभूतपूर्व खुशी हुई थी, उसके आगे फ़ि‍ल्‍म में क्‍या-क्‍या होता उसे सोचने का सब आनंद अभी छूटा पड़ा था मगर जुसेप्‍पे ने ऑनेस्‍ट कंटेप्‍लेशन के चक्‍कर में सब गोबर कर दिया!..

(जारी)

Thursday, August 14, 2008

आज़ादी- एक नव इंटरप्रिटेशन..

आपकी किस्‍मत फूटी होगी जभी आप कल के दिन भारतीय तिरंगा नहीं लहरायेंगे. किस्‍मत फूटी होगी तब भी ज़्यादा संभावना है लहराने से बाज नहीं आयेंगे. देशप्रेम होता ही ऐसा प्रेम है. इस कदर अंधा होता है कि अंधे भी हकबकाकर पलक झपकाने लगते हैं. कहने का मतलब अनूठा प्रेम होता है और सुजाता, नंदिनी, मंजुश्री सबों के प्रेम को दबाकर, और साथ न चलनेवालों को अमूमन दहलाकर स्‍वयं को व्‍यक्‍त करता है. आज़ाद हुए मुल्‍क के सुघड़ नागरिक अपनी तबाहियों से उबरने के सम्‍यक उपायों की ठीक-ठीक प्राथमिक शिक्षा भले प्राप्‍त न कर पावें, राष्‍ट्रप्रेम की संपूर्ण प्राप्ति करते हैं. और सरकारी शिक्षण संस्‍थाओं में इस लक्ष्‍यप्राप्ति की समुचित व्‍यवस्‍था होती हो ऐसा नहीं, गैर-सरकारी स्‍कूल भी इतना देशप्रेम हंसते-खेलते बेच लेते हैं. लब्‍बोलुआब यह कि आठवीं में तीन वर्षों तक फेल होते रहनेवाला गड़ेरिया छात्र भी देशप्रेम का पाठ मज़े-मज़े में कंठस्‍थ करके स्‍कूल त्‍याग करता है. या स्‍कूल उसका त्‍याग कर देती है.

जैसे शाहरूख ख़ान हैं माइक हाथ में आते ही रटे हुए अंदाज़ में बोल देते हैं- ‘मुंबई इज़ ए ग्रेट‍ सिटी!’ या बबीबा बोलते-बोलते रह जाती हैं- ‘लाइफ़ इज़ सच अ बिच, ऑर बिग पिस ऑफ़, ऑर बोथ!’. जबकि सच्‍चायी शाहरूख भी जानते होते हैं कि फ्यूचर ग्रेट सिटी में नहीं, गल्‍फ के किसी महलनुमा मकान में गुज़ारना है, और सार्वजनिक रूप से ज़ाहिर कभी भले न किया हो, इसका बबीता को भी अंदाज़ रहता है ही कि रंधीर की जगह मेरे संग फेरे लिये होते तो ऐसी ग़ुमनामी का जीवन जी रही होती न दिल के गहरे से ऐसे दिलदार वाक्‍य फूटते होते! लेकिन लफड़ा यही है कि साठ साल की आज़ादी ने सार्वजनिक और निजी जीवन के हमें दोहरे मानदण्‍ड दे दिये हैं. या हमने ले लिये हैं. और फिर लिये रखा है. बहुत सारे भलमनई होंगे जो कल शाहरूख की चतुराई, या बबीता की भोलाई से टीवी पर एक ऊलजुलूल राष्‍ट्रीय संदेश सुनकर भावुक होने लगेंगे. ऊपर-ऊपर की आदमी की चमड़ी देखेंगे, अंदर-अंदर का सियारी-सार देखने से बच जायेंगे. स्‍वातंत्र्यसार की कड़वी समीक्षा में उतरनेवाले को ‘गद्दार-गद्दार!’ पुकारने के बालकिशनी उत्‍साह में पुलकित होने को मतवाले होने लगेंगे..

जबकि मुझे लगता है समय आ गया है हम इस आज़ादी की सही-सही समीक्षा करें. पुनर्परिभाषित करें इसके पहले कि अंबानी एंड अमर सिंह टाइप्‍स इस ग्‍लोरियस फर्टिलिटी को फर्टाइल इकॉनमिक यूटिलिटी में बदल डालकर हमसे कुशासितों को सम्‍पूर्ण निष्‍कासित कर डालें!

हमारे चिरचुहलबाज संगी मतिमंथर उपाध्‍याय ने देखिये ई-मेल में आज़ादी की क्‍या नवव्‍याख्‍या की है, ग़ौर फ़रमायें:

‘अ’ मतलब अमीरी. नव-अमीरी. साथ लगे आकार का मतलब हुआ अमीरी का आकार दिनों दिन बढ़ रहा है. ‘ज’ माने जहालत. नुक़्ता इसे ज़्यादा पोयेंटेडनेस से ज़ाहिर करता है. ज के साथ के आकार का भी पूर्ववत पहले वाला ही मतलब समझा जाये. माने राष्‍ट्रीय सवालों को वाजिब तरीके से समझ सकनेवाली समझ की जहालत का आकार महाविकरालावस्‍था को अग्रसर है. रही बात आखिर के ‘दी’ की. इसका मतलब क्‍या हुआ? इसका सीधा मतलब बड़ा स्‍पष्‍ट और प्रकट है. हमने आज़ादी ठीक से लिया भी नहीं कि वापस कर दी.

ठीक-ठीक किसको की, और कितनी मात्रा में की इसका सार-संग्रहण चालू आहे.

Wednesday, August 13, 2008

यहीं कहीं आसपास..

यहीं हूं.. आसपास.. मुझे भी ख़बर है शहर की इन आवाज़ों में कहीं नज़दीक ही अपना स्‍वत्‍व है.. ओह, सब कितना अकूत सुंदर है.. सपनीला.. नहीं, लेकिन कहां है?..




लंगड़ाये पैरों से उचकता तीन कदम पीछे आकर देखता हूं.. इन फुसफुसाहटों के बीच अपना सुर कहां है.. है?.. है तो फिर पकड़ में क्‍यों नहीं आता? सामने उनींदे सुरों में घूमता रहता है फिर नज़र क्‍यों नहीं आता?..


Tuesday, August 12, 2008

दिल चाहता है..

कान में कनफूल खोंसे उदयपुरिया उद्यमी जो घिसे नीले पॉलीथीन के नीचे ज़रा देर को थमी बरसात में तेज़ी से चाकू पर धनिया और सेज़वान चटनी फेरता मसालेदार सैंडविच उगलता, आईटी इंडस्‍ट्री के भुखाये बच्‍चों की भूख तोड़ रहा, और अपना भविष्‍य जोड़ रहा है.. उसके ठेले पर इकट्ठा भीड़ की दयानतदारी से नाउम्‍मीद होकर एक देसी भूरा कुत्‍ता सरककर सड़क पर मसालेदार दो कौड़ि‍या नमकीन के रैपर से जूझ रहे छोटे बच्‍चे की ओर आ गया है.. घड़ी भर पहले तक हाथ में नमकीन का रैपर दबोचे बच्‍चा उन्‍मुक्‍तभाव मुदित होना चाह रहा था, अब अचानक इस बिनबुलाये हसरतज़दा कुत्‍ता-मेहमान की संगत में सकुचाया, घबराकर बेबस हो रहा है. रैपर खोलते बन रहा है न मां की छत्रछाया को सौंपकर आसन्‍न हमले की आशंका से निश्चित हो लेने की तबियत हो रही है. और बड़ी-बड़ी आंखों में निर्दोष हसरत की आंच जलाये कुत्‍ता बेशर्म है कि बच्‍चे की छांह से छंट नहीं रहा, हट नहीं रहा. बच्‍चा दहल रहा है. बीच सड़क अशिक्षित देहाती मां खिसिया रही है. निर्दर्द्वंभाव कुत्‍ते को दुरदुराने से खुद को बचा रही है. बच्‍चा रैपर नहीं खोल रहा लेकिन कुत्‍ते का दिल टूट नहीं रहा. कुत्‍ते का दिल कह रहा है..

भीगी शाम के पियराये अंधेरे में मंजुकुट्टी सड़क लांघकर अपने रेस्‍टोरेंट की तरफ़ आता है, और साइनबोर्ड पर उड़ती सी नज़र पड़ते ही इकतालीसवर्षीय मंजुकुट्टी के मन में फिर एक दबा दर्द उभर आता है. अभी पिछले हफ़्ते ही बत्तियां रिप्‍लेस की थी, मगर बोर्ड पर रोशनी फेंकने को लगे तीन बल्बों में सिर्फ़ एक ही जल रहा है. बोर्ड के तीनों बल्‍ब जल रहे हों मंजुकुट्टी ने आखिरी मर्तबा ऐसी चमकती शाम कब देखी थी, मंजुकुट्टी को याद नहीं. मंजुकुट्टी का मन करता है..

सत्‍यस्‍वरूप नहीं जानते उनका मन क्‍या करता है. रूटिन से बंधे दिन के घंटों के फैलाव से स्‍वयं को गुज़ारकर एक निश्चित समय में कमरे में अंधेरा करके दिन ख़त्‍म हुआ स्‍वीकार लेने की उन्‍होंने आदत बना ली है.. नियम से रोज़ सुबह पोते को स्‍कूल पहुंचाना, बहु की ऐसी और वैसी शिकायतों को न चाहते हुए भी सुनते रहना, दवाइयों के रैपर सहेजना और कभी सुचित्रा मुस्‍कराते हुए कैसी दिखती थी की याद करके हैरत में पड़ जाना- जीवन के बचे हुए वर्षों के दिनों के बीतने-बिताने का ऐसा ही जीवन जीना उनकी किस्‍मत में लिखा है जैसी सोच सोचकर सत्‍यस्‍वरूप आश्‍वस्‍त रहते हैं. हालांकि कभी यह भी ख़्याल आता है कि शायद कभी बहु लंबी छुट्टी में अपने मायके जाये तो वह फ़ुरसत में रामचरितमानस पढ़ना चाहेंगे, माने दिल चाहता तो है..

नीला नहीं चाहती कि मनोज से रोज़ चिखचिख हो. मनोज भी नहीं चाहता, लेकिन नीला मानती नहीं.. फ़ैक्‍टरी में सब जानते हैं सेठ ने उसे बटन टांकने के काम पर क्‍यों रखा है, मगर फिर भी नीला फ़ैक्‍टरी का काम छोड़कर घर बैठ जाये ऐसा नहीं कर रही, रोज़ नौ घंटे घर से बाहर रहती है.. मनोज दिन भर झुंझलाया आपे से बाहर रहता है. शाम को दारु पीकर लौटता है, तब और भी आपे में नहीं रहता. रात के खाने पर बिना नागा दोनों एक दूसरे को ज़हर परोसना शुरू करते हैं. हालांकि दोनों चाहते हैं..

कुत्‍ते का दिल भी चाहता है..

ज़िंदगी का दिल.. चाहता है..

Monday, August 11, 2008

छक्‍का!

पाप मनसा, दुराचारी दिव्‍यदृष्टि वाले कृपया इसे अपने, या मेरे- प्रति प्रयुक्‍त संज्ञा न समझें. निष्‍पापी मानसों से भी कुछ ऐसा ही विनम्र निवेदन है. अलबत्‍ता बाल की खाल निकालनेवाले, व अपनी चार पैसे की टकसाल संभालनेवाले स्‍वयं को किसी भी रूप में सुशोभित करने को स्‍वतंत्र हैं ही. मैं उनकी नाल नहीं थाम सकता, न ही बाल खींच सकता हूं. बाल जो है इन दिनों अपनी ही खींच रहा हूं. वैसे खींचने से ज़्यादा नोंच रहा हूं कहना ज़्यादा अर्थगर्भित होगा (हालांकि खींचने से ऐसा नहीं हो रहा कि अर्थ पा जा रहा हूं. पैसे तो ख़ैर, नहीं ही पा रहा हूं)..

लब्‍बोलुआब यह कि (लब्‍बोलुआब सही लिखा है न? क्‍या वडनेरकर वर्ड मास्‍टर, इज़ इट करेक्‍टली स्‍पेल्‍ड? अभय भैया? डाक्‍टर बेजी ईरानी?) शीर्षक किन्‍हीं भी दुराचारी आग्रहों से मुक्‍त, महज छह सौवें पोस्‍ट के सेलिब्रेशन में लिखा है. और सेलिब्रेशन मोड में इसलिए आ गया हूं कि पता नहीं आगे आने की स्थिति बने, न बने. अब जैसे कल ही जिस तरह स्‍वयं का अस्तित्‍व तक संशयप्रश्‍न हो गया था, न अचीव करने की घिग्‍घी बंध गयी थी, आगे किन-किन बिंदुओं पर व कहां-कहां बंधता रहूंगा, कौन जानता है? कौन जानता है कल सेलिब्रेशन हो न हो? ससुर शाहरूख हमेशा नहीं रहनेवाले हैं तो हमारे पोस्‍ट ही इस सवाल पर छिनकते हुए उस दृश्‍य विशेष का अवलोकन करते हुए हज़ार और पोस्‍ट-हज़ार पहुंचेंगे थियरेटिकली मानने को मैं हमेशा आत्‍मविश्‍वासी दंभ में मानता रहा हूं, मगर वह मनन अब हिचकोले खा रही है, उस बालकिशनसुलभ आत्‍मविश्‍वास में दरारें पड़ रही हैं. हजारीप्रसाद या हज़ारीपोस्‍ट हूंगा ही में अब स्‍ट्रॉंग डाउट्स हो रहे हैं..

मां कहती थी सूप तो हंसली त् हंसली, चलनियो हंसली जेमे बहत्‍तर गो छेद, तो बहत्‍तर एंड स्टिल काउंटिंग छेदों का मनभावन जीवन-यापन करते हुए स्‍वाभाविक है मैं कल को छेद से दस कदम आगे जाकर मिस्‍टर गड्ढा बन जाऊं, हज़ारी बनने के अरमान अडवाणी के प्रधानमंत्रित्‍व का सपना भर बना रह जाये? वैसे यह भी सही है कि हज़ारों पोस्‍टें ऐसी कि हर पोस्‍ट पर दम निकले! मगर इसी सच्‍चायी के ऊपर हरजायी यह भी है कि फ़ि‍लहाल दमदार छेदों के नीचे कचुमर निकल रहा है. और आज की महानगरीय कचुमरमार महासच्‍चायी है कि अगर आपके हाथ में बिग बाज़ार का भरा हुआ झोला नहीं और जेब में झोले को भरने लायक तीन सुलगते-चमकते डेबिट-क्रेडिट कार्ड नहीं तो आप पोस्‍टों की दे-दनादन शेरो-शायरी वाली हर्षिल मन:स्थिति की जगह आसानी से सियारवाली मुरझाइल, मुर्दिल मोड में पहुंच सकते हैं! छेदों की छुअन, चुभन में उमगता मैं वहीं पहुंच रहा हूं. अनुभूति लगभग वही वाली है. हजारीप्रसाद वाली नहीं ही है.

तो फ़ि‍लहाल टीम के टिनहे स्‍कोर में एक अपना भी छक्‍का जुड़ गया है तो सेलिब्रेट कर लेने में क्‍या हर्ज है? क्‍योंकि, जैसाकि पहले कहा ही था, कौन जानता है कल को सेलिब्रेशन हो न हो?

Sunday, August 10, 2008

अस्तित्‍वरहित?..

तेईस वर्ष की चढ़ती उम्र में बोर्खेस ने सात पृष्‍ठों का एक छोटा लेख लिखा था (बाद के वर्षों में गागर में सागर की उनकी शैली और-और निखरती ही गयी). लेख था- ‘द नथिंगनेस ऑफ़ पर्सेनैलिटी’. लेख में ज़रा आगे चलने पर एक पंक्ति आती है - “..What is not carried out does not exist;” इस निहायत सरल, निर्दोष-सी पंक्ति पर आकर मैं एकदम से अटक गया. अभी तक उसी में अटका, उलझा पड़ा हूं..

भगवान ही जानता है जिस अकेले काम को जीवन में अंजाम दिया है वह सिर के बालों की सफ़ेदी करवाने, और देह पर की चर्बी चढ़ाने की रही है, बकिया के तो सारा कुछ ब्‍लूप्रिंट और खाक़े ही बनते रहे हैं (और ठीक से बनें इसके पहले आमतौर पर बिगड़ते ज़्यादा रहे हैं!).. मगर इतने तो काम हैं. पता नहीं कितने हैं. लेकिन, चूंकि निष्‍पादित नहीं हुए तो उनका अस्तित्‍व नहीं? फिर एक्सिस्‍ट क्‍या करता है? महज़ मेरे सफ़ेदी रंगे मेरे बाल और बेहूदा वज़न?

ठीक इतवार के ऐसी बात याद कराना सही है, बोर्खेस?

Saturday, August 9, 2008

अबरार और मंजरी: चार

मेरी दो कौड़ी के सेंस ऑफ़ ह्यूमर का लड़की ने बुरा नहीं माना. मतलब मेरे मुंह में जलती हुई लकड़ी डाल देने की अकुलाहट में सुलगती नहीं दिखी. खुद को ज़रा पीछे ठेलकर इतमिनान से कुर्सी पर मुझे दूर नज़रों के कौतुक से देखती रही, फिर बोली- तुम क्‍या समझते हो, मैं जानती नहीं तुम अपने को कितना होशियार समझते हो?

मैंने जवाब नहीं दिया कि मैं अपने को कितना होशियार समझता हूं.

मेज़ से एक पेंसिल उठाकर उंगलियों के बीच ऐसे घुमाता रहा मानो मंजरी एक लाईन भी और कहेगी तो मैं सात साल के बच्‍चे की तरह बुरा मानकर कमरे से भाग खड़ा होऊंगा. यह मंजरी भी समझ रही होगी, इसीलिए एक लाईन और कहे बिना उससे रहा नहीं गया. दरअसल एक लाईन और के बाद उसने एक लाईन और, फिर उसके बाद और भी ढेरों लाईनें कहीं. और कोई भी लाईन मेरी तारीफ़ में नहीं था.

- मैं ही नहीं इस ऑफ़ि‍स में सब जानते हैं तुम अपने को जितना होशियार समझते हो! मगर मेरे जितना सब ये नहीं जानते व्‍हाट ए स्‍टुपिड डंबऐस यू आर,- इतना कहकर लड़की अपने आजू-बाजू ऐसे देखने लगी मानो सिगरेट खोज रही हो, मैंने लगभग रुंआसा होने की एक्टिंग करते हुए अपने पैकेट से निकालकर उसे एक सिगरेट ऑफर किया.

मंजरी ने सिगरेट के दो टुकड़े करके उसे अपने कचरा बास्केट के हवाले किया और अपने गाल को अपने दायें हाथ का दुलार देती हुई आराम से बोली- प्‍यार के दो बोल बोल लेती हूं, तुम्‍हारे लिए अफ़ेक्‍शन फ़ील करती हूं, एंड सी हाऊ यू ट्रीट माई फ़ीलिंग्‍स? किस बात का इतना घमंड है तुम्‍हें? होशियारी का? यू रियली थिंक यू आर सम होशियार, आं? लिफ़्ट के बाहर वो जो नेपाली लड़का बैठता है उसकी हैसियत भी तुमसे बेहतर है, एंड द फन्‍नी थिंग इज़ दैट ही ऑल्‍सो नोज़ इट. एंड द मोस्‍ट फन्‍नी थिंग इज़ दैट यू ऑल्‍सो नो दैट ही नोज़ इट, एंड एवरीबडी नोज़ इट!

मुहब्‍बतघुले खंज़र से छोटे-बड़े हर तरह के ज़ख़्म करती मंजरी पल भर को ख़ामोश हुई, फिर एकदम से हंसने लगी.

मैंने बिना किसी तंज के कहा- तुम्‍हें इतना फनी लगता है तो कहो तुम्‍हारे साथ मैं भी हंसने लगूं.

थोड़ी देर तक इसी तरह अटक-अटककर खुशी ज़ाहिर करते रहने के बाद लड़की बोली- व्‍हाई डोंट यू बाइ मी ए ड्रिंक फॉर ए चेंज, तुम्‍हारे बारे में मैं तुम्‍हें कुछ इंटरेस्टिंग बातें बताना चाहती हूं.

- आई एम सॉरी, बट आई एम नॉट इन ए पॉज़ि‍शन टू अफॉर्ड सच ए चेंज, और इंटरेस्टिंग बातें तो तुम यहां बिना सिगरेट और दारु के असर में यूं ही हंसते-हंसते बता रही हो, इतनी सी बात के लिए बाहर जाकर पैसा खराब करने की क्‍या ज़रूरत है.

- ओह, पुअर अबरार, व्‍हाई डोंट यू स्‍टार्ट क्राइंग? प्‍लीज़, गो अहेड, मैं तुम्‍हारे आंसूं पोंछ दूंगी, तुम्‍हारा सिर अपने कंधे पर रखकर थपकी दे दूंगी? कम ऑन, रोओ ना..

मैंने चेहरा घुमाकर बेरूखी से कहा- जाने दो. मैं तुम्‍हारे कपड़े खराब करना नहीं चाहता.

मेरा जवाब सुनकर मंजरी फिर हंसने लगी. मैं फिर ख़ामोश बना रहा.

आसपास भूरी बिल्‍ली होती, और उसे दूध पिलाकर संतुष्‍ट करने लायक मेरी जेब में पैसे होते तो मुझे पक्‍का यकीन है उसने भी छूटकर यही सवाल किया होता कि ऐसी औरत आख़ि‍र तुमसे बच्‍चा चाहती क्‍यों है? और मैंने भी छूटकर यही जवाब दिया होता कि आई डोंट हैव ए क्‍ल्‍यू.

इच्‍छा हुई मंदीप को फ़ोन करके कहूं मुझे दूध खरीदने को कुछ पैसे चाहिए. फिर साथ ही यह भी याद आया कि मेरा सेलफ़ोन काम नहीं कर रहा.

(जारी)

Thursday, August 7, 2008

उलझी अकुलायी लकीरों की फिर वही जगर-मगर शाम..



फ़ोटोशॉप और पेंट में माउस की चिचरीकारी.


बहुत सोचकर खुद को दु:खी और हमें शर्मिंदा मत कीजियेगा, स्‍केच के अंदर भी उतना ही है जितना बाहर प्रकट आंखों को दिख रहा है. पोस्‍ट का शीर्षक महज़ अकुलाये मन के मोह के लिहाज में चिपकाया है..

अबरार और मंजरी: तीन

बच्‍चा लाने की मंजरी की बेकली को दीवार की कील पर टांगकर मैं इस औरत से सवाल करना चाहता था, या चाहता था मेरी कायरता पर रहम खाकर कोई और आये और पूछे इस औरत से बच्‍चा क्‍यों चाहती है? क्‍योंकि सक्‍सेना या बालन के घर पर बच्‍चों की किसी गैदरिंग या पार्टी में उनके लिए वह कभी गिफ्ट लेकर गयी हो, या बेचारों को अपने पास ही फटकने दिया हो मुझे याद नहीं पड़ता. बच्‍चों के लिए गिफ्ट कभी मैंने भी नहीं खरीदी मगर उसकी वजह मेरी आत्‍मा का कमीनापन नहीं रहा है. ठंडापन मेरे दिल की गर्म सांसों की नहीं, जेब की मुसीबत रही है. गिफ्ट तो अपने जन्‍मदिन पर भी मैं अटकी सांस लिए आखिर तक राह तकता रहा था कि दिन बीतते न बीतते खुद को कुछ खरीदकर दे सकूं. और नहीं तो कमज़कम एक बाथरुम स्‍लीपर ही सही.. जबकि अंत भूरी बिल्‍ली के लिए दूध का एक बाउल खरीदने से हुआ था (जिसे ढंग से भरा जा सके उतना दूध खरीदना फ़ि‍लहाल अभी तक बाकी है!).

बच्‍चों की संगत में मैं खासा चहकता पाया जाता रहा हूं. जबकि मंजी के साथ वह बात नहीं है. बहुत बार किसी बच्‍चे के साथ मुझे हंसता देख मंजी ने हैरत से ऐसे मुंह बिचकाया है मानो फिर इसका भेद पा गयी हो कि मेरी तनख़्वाह उसकी तनख़्वाह के मुकाबले आधी से भी कम क्‍यूं है.

ऐसे मौकों पर मंजी के अंदर कभी लाड़ उमड़ता तो मेरे कंधे अपनी ठोड़ी धंसाकर फुसफुसाकर कहती- बच्‍चे बुरे नहीं अगर दूसरों के हों. या एकाध घंटे खेलने के लिए बुरी चीज़ नहीं.

- एकाध घंटे खेलने के लिए मैं ही कहां बुरी चीज़ हूं!- बेशर्मी से दांत दिखाकर मैं मंजी के कड़वे ऑब्‍ज़र्वेशन की लगाम कसता, और वह कड़वा सा मुंह बनाकर मुझसे परे हट जाती.

ऐसी मंजी बच्‍चा लाना चाहती है! एकाध घंटे नहीं रोज़-रोज़ आंखों के आगे एक खिलौना बना रहे के लिए बच्‍चा चाहती है? बची हुई ज़िंदगी के सालों के अकेलेपन, उदासी को पूरने का सेंटिमेंटल क्‍युअर चाहती है मंजी? सेंटीमेंट्स समझती है? इस औरत का कैसा भी क्‍युअर कभी संभव है?

मेरा बस चलता तो मंजरी की जगह सामने मेज़ पर भरे हुए बाउल से बिल्‍ली को दूध पीता सुकूनदेह देखता होता, और फ़ुरसत के किसी पल उंगलियों में जलती सिगरेट की राख झाड़ बिल्‍लीरानी से सवाल करता उदासी और अकेलापन हरण के लिहाज़ से दुनिया में बच्‍चा लाने के बाबत उसकी राय क्‍या है. बिल्‍ली चौंककर बाउल से अपना मुंह हंटाती, एक ओर ज़रा सा गर्दन झुकाकर नीची नज़रों से मुझे ताड़ती, फिर तक़लीफ़ और असमंजस में जबड़ा कसकर बुदबुदाती कि मैंने उसे दूध पीने को न्‍यौता था, या अकेलेपन और उदासी के सवालों में उलझाने को?

मैं मुस्‍कराकर बिल्‍लीरानी से माफ़ी मांग लेता, और फिर कुछ देर तक हम दोनों ख़ामोश एक दूसरे को चुपचाप देखते बैठे होते. फिर बिल्‍ली बाउल में सिर डालकर खुद को मुझसे छिपा लेती. फिर अचानक एकदम से चेहरा बाहर करके चौंकी आंखों मुझे तकती, फिर धीमे-धीमे अपने एक-एक शब्‍दों को तौलती कहती- यू नो, ज़िंदगी जीभ पर ईल मछली का स्‍वाद है.. लेकिन अकेलापन.. अकेलापन और उदासी वह समूचा समुंदर है जिसमें ईल मछलियां रहती हैं.. मुझे मालूम नहीं मैं कितना साफ़-साफ़ कह पा रही हूं जो कहना चाहती हूं.. बट रफ़ली यू गेट द पिक्‍चर..

इतना कहकर बिल्‍लीरानी अपने अगले दोनों जुड़े हुए पैरों पर चेहरा गिरा के भोलेपन से मुझे देखती, मानो मुझसे भोले को कुछ भी समझाने की कोशिश कितनी बेमतलब है. मैं भूरी बिल्‍ली की बात का बुरा मानने की जगह मंजी के सवाल का जवाब देता- नहीं, नहीं, मेरे जैसे ओछे और ऑर्डिनरी बीइंग को ऐसी बड़ी ज़ि‍म्‍मेदारी मिलेगी इसका यकीन नहीं हो रहा था इसीलिए.. दैट्स व्‍हाई..

- दैट्स व्‍हाई व्‍हॉट?- मंजी अभी भी चिढ़ी हुई थी. ज़हरघुली ज़बान. ज़हरपियी नज़र.

मैंने संभलकर, संभालकर धीरे-धीरे समझदारी से कहा- नहीं, नहीं, इट्स ऑल फाईन विद् मी. तुम हुक़्म करो मुझे क्‍या करना है. कब करना है.

(जारी)

Wednesday, August 6, 2008

पुरबिया फुटानीबाज का बरसाती इंटरनेट कनेक्‍शन शोकगीत



है. नहीं है. है है है,
बत्‍ती टिमटिमा रही है!
कनेक्‍टेड बता रही है!
फट देना ब्राउज़र खोलिये!
खुला? कहां खुल रहा है, जी!
यह बरसात खुल रहा है न
कोई जनाना पकौड़ी तल रहा है
आया है आया है, आ गया है!
कहंवा, कौन? जनाना?
नहीं, मरदे, कनेक्‍शन.
नहीं, कहां है? मगर ठहरिये,
फिर आया है. नहीं
महाराज, फिर गया है!
हद है ससुर नेटवर्क कनेक्‍शन
कनेक्‍शन देखा रहा है जबकि
ब्राउज़र फेलियर बता रहा है
मन कर रहा है ई पीसीया को
पटकके चार लात लगायें, या
रउटरवा को देवाली पे फोड़ दें
का बोलते हैं, महाराज,
नज़र घुमाइये, आरती चलाइये
आ गया है कनेक्‍शन!
सच्‍चो में? अभियो ले है?
कि गया? नहीं, फिर आया है.
है? है है है! नहीं,
रुकिये एक मिनट..


अबरार और मंजरी: दो

लड़की सीधा और ईमानदार जवाब चाहती है. दे दूं, तो पचायेगी? पचा सकेगी? सतरह वर्षों की नौकरी और समाजी मेलजोल में मैंने एक सबक सीखा है कि लोग सीधा और ईमानदार जवाब नहीं चाहते. दो तो सन्‍न हो जाते हैं. बातचीत बंद हो जाती है, जमे हुए रिश्‍ते खत्‍म हो जाते हैं. और ऐसा नहीं है कि मंजरी यह सब नहीं जानती. न जानने जितनी भोली होती तो इस मेज़ पर नहीं बैठी होती जहां ज़रूरत के हिसाब से दुखयारी, और मौका बनते ही खुद से नीचे के खिलाफ़ हिक़ारत का सख़्त लिबास पहन लेती है. मेरी परेशानी के पलों में मुझे कभी याद दिलाना नहीं भूलती कि अपनी मौजूदा (या कहूं हमेशा की) पिटी हुई हालत के लिए और कोई नहीं सिर्फ़ मैं और मैं ही ज़ि‍म्‍मेदार हूं, और यह कि ज़िंदगी में राहत आसमान से नहीं बरसता, उसके लिए ख़ून और पसीना बहाना पड़ता है. अलबत्‍ता मंजरी भी जानती है कि इस दफ़्तर में ख़ून किसी ने नहीं बहाया, और पसीना बहाने के लिए- मैं न भी चाहता रहा होऊं- तो छांटकर, खींचकर हमेशा मुझे ही अगली पांत में खड़ा किया गया है.

लेकिन मंजरी से मैं यह सब कह नहीं सकता. कहूंगा तो वह न केवल मुझे काम से जी चुरानेवाले खुदगर्ज़ होने की गाली देगी, बल्कि गाहे-बगाहे बाहर के हमारे खाने (और मेरे पीने) का पैसा चुकाते हुए जो वह अपनी दयानतदारी की वैनिटी जीने का सुकून पाती है, थोड़ी-बहुत सहूलियत का वह मौका भी मैं गंवा बैठूंगा.

तुम सीधा और ईमानदार जवाब सुन नहीं सकतीं, मैं मंजरी से कहना चाहता हूं लेकिन बजाय ऐसी बेवक़ूफ़ी करने के, उसकी मेज़ पर कुहनी टिकाकर मुस्‍कराने लगता हूं. फट से लड़की की भौंहें चढ़ जाती हैं, तमककर फूटती है- देखा? देखा तुमने? ये है तुमसे सीरियसली बात करने का नतीजा!

मैं मंजरी के गुस्‍से का बुरा मानने की एक्टिंग नहीं करता, जेनुइनली उसकी तमकती आंखों को पढ़ने की कोशिश करता हूं. क्‍या है इन आंखों में, कहां जाना चाहती हैं ये आंखें? तीसरे-चौथे मेरे बरामदे के सूराख़ से होकर रसोई में तांकझांक करने आनेवाली भूरी बिल्‍ली और मंजरी की आंखों का क्‍या फर्क़ है? मंजरी की ही तरह बिल्‍ली भी मुझसे दु:खी रहती है कि उसकी खातिर मैं ज़रा सा दूध तक नहीं सहेज सकता. दो दिन पहले ऐसे ही नहीं रहा होगा कि खिड़की के नीचे लगाकर रखे एब्‍सोलूत की आधी बोतल को जाते-जाते गिराकर तोड़ती गयी थी. दूध न पाने की झुंझलाहट बेचारी बिल्‍ली आखिर कबतक बर्दाश्‍त करती. मंजरी कबतक करेगी?

- ऐसे क्‍या दिक़्क़त है, मंजी? सेटल होने से क्‍या बदल जायेगा? ऑफिस में सबको मालूम है-

- मैं शादी के लिए नहीं कह रही तुमसे! सपने मत देखो. ऐसे ही कम परेशानी नहीं कि तुमसे शादी रचाके अपनी मुसीबत बढ़ाऊं!

मैंने राहत की सांस ली. ऊपर बुरा मानने की एक्टिंग करते हुए कहा- फिर किस बात की तक़लीफ़ है? तुम्‍हारे फ्लैट के सोफ़े पर बैठकर दुनिया-जहां की सब तस्‍वीरें दिखती हैं, बस एक दुल्‍हनवाले लिबास में तुम्‍हारी फ़ोटो की कमी देखकर मेरा दिल भर आता है, और तुम हो कि कहती हो..

शायद शादी की ज़ि‍रह के बैकग्राउंड में जाने के उत्‍साह में मैं दो कदम आगे चला गया था. दुल्‍हनवाले लिबास का मेरा तंज़ ताड़कर मंजरी ने कटी नज़रों से मुझे घूरा, फिर चेहरा झुकाकर अपने सेलफ़ोन को मेज़ पर दायें-बायें घुमाने लगी. धीमी, दबी आवाज़ में फुसफुसाकर बोली- वह बात नहीं है, अबरार. मेरी उम्र हो रही है. इस तरह अकेली, उदास ज़िंदगी से थक गयी हूं.. तुम समझ रहे हो?

नहीं, मैं नहीं समझ रहा था. कुछ दिनों तक नियम से अगर बिल्‍ली रसोई में मेरे बोतलों को तोड़ती रहे तो शायद मैं उसे समझने लगूं, लेकिन मंजरी की यह ‘ओह, बेचारी मैं!’ मेरे पल्‍ले नहीं पड़ेगा. ज़िंदगी में हर कोई अकेला होता है, और उदासी जीवन का स्‍थायी भाव है, डिपेंडिंग आप उसे किस एंगल से देख रहे हैं. मंजरी शायद मुझे किसी और एंगल से दिखाना चाहती थी.

- तुम सचमुच पैदल हो, यार. मैं बच्‍चा चाहती हूं, अबरार! मैं नहीं चाहती कि अब और लेट हो, समझते हो?

- बच्‍चा चाहती हो तो ले आओ बच्‍चा. उसमें क्‍या मुश्किल है. उसके लिए तो किसी एंगल की भी ज़रूरत नहीं, बस खास तरह से लेटकर कुछ दिनों कसरत करनी होगी, आ जायेगा बच्‍चा. अलबत्‍ता आकर ऐसी दुनिया में करेगा क्‍या वह दीगर सवाल है.

- उसके लिए तुम क्‍या करोगे?

- मैं क्‍या करूंगा मतलब? मुझे भी कुछ करना होगा?- मैंने भोलेपन में सवाल किया.

मंजरी सुलगती नज़रों से मुझे घूरती रही.

(जारी)

Tuesday, August 5, 2008

परछाइयों के उजास अंधेरों में दीदी..

साइकिल नहीं थी लेकिन साइकिल की तेजी से भी तेज भागकर मैं मैदान के इस छोर से उस छोर पहुंच जाता, फिर बिना हांफे बीस तक की गिनती के पहले उस बिंदु पर लौटकर खड़ा हो जाता जिसकी सीध में मैं भी उसी तरह दीदी के पैर के अंगूठे की नोक देख सकूं जैसे अधलेटी, सामने को पैर पसारे, ‘बंधे हाथ’ के मुमताज़ से सलवार-कमीज़ वाले प्रिन्‍ट में दीदी अपने पैरों के अंगूठों, और उसके नेल-पॉलिश की रोशनी में नहाये नज़दीक के घास को निरख रही होती. फिर भागकर जीवन क्‍यों महीन तागे से भी महीन, शरीफे के कोये से भी मीठा और सांप की परछाईं से भी इतनी लचकदार है के ख़्यालों को पलक झपकते में झटककर जामुन के पेड़ के सबसे ऊपरी शाख पर चढ़ जाता और वहां से देखता दीदी के आसपास की फैली रोशनी में दुनिया कैसी दिखती है!

फिर जामुन के पेड़ के सबसे ऊपरी शाख से ख़तरनाक तरीके से झूलता, चीखकर दीदी से पूछता नीचे आ जाऊं, दीदी? और दीदी बजाय मेरे सवाल का जवाब देने के, फुसफुसाकर पलट सवाल करती कि कोई कितना भी ट्राई कर ले, वहीदा रहमान नहीं हो सकती. और मुझे होना भी नहीं है! अपनी मिस शेफाली क्‍या कम हैं? कभी देखा है जब वह अपने खुले बालों पर हाथ फेरती, गुनगुनाती बरामदे में टहलती हैं? कितना गज़ब लगती हैं, गज़ब!

फिर दीदी के चेहरे पर एकदम से कैसी तो उदासी फैल जाती और वह आंखों को हाथ से ढांपे इस तरह चेहरा फेर लेतीं कि मैं बुरी तरह डर जाता और फटी आंखों हैरतनाक़ सोलह पैरोंवाली गिलहरी की तरह सनसनाता नीचे उड़ा आता, और घबराया दीदी से मिन्‍नत करता क्‍या बात है, दीदी, बोलो न? बता दो न, प्‍लीज़?

पता नहीं फिर कितनी देर तो अचल रहने के बाद दीदी चेहरे से हाथ हटाकर मेरी दिशा में मुंह मोड़ती भी तो उन नज़रों में ऐसी बीहड़ दूरी, इतना अजानापन होता कि मेरे दिल के टुकड़े-टुकड़े हो जाते, और मैं रुआंसी आवाज़ में किसी तरह तो कह पाता कि ऐसा मत करो, दीदी, प्‍लीज़, मैं तुम्‍हारे बाल बना दूंगा? चोटी गूंथ दूं? भागकर चमेली या गेंदा के फूल ले आऊं, बालों में लगा दूंगा, देखना, कितनी सुंदर लगोगी? सच्‍ची में!

दीदी के चेहरे पर एक फीक़ी मुस्‍कान चली आती, और वह बिना मुंह खोले मुझे याद दिलाती कि रंजु दी के बाल बनाने की ज़ि‍द के लिए चाचा की पिटाई मैं भूल गया हूं? और दीदी मेरे बालों में हाथ डालकर हल्‍के से उन्‍हें बिगाड़ देती और उसे मुस्‍कराता देख कैसे तो मेरा दिल बाग़-बाग़ हो जाता और मैं बेशर्मी से हंसता भागकर मैदान के दूसरे छोर चला जाता और वहां से चीखकर दीदी को इत्तिला करता कि एक दिन जब मैं बड़ा हो जाऊंगा तो वह खुद देख लेगी कि कैसे साधना, बबीता, मुमताज़ सब फेल हैं उसके आगे और मंजु मौसी की शादी में उसे देखनेवालों की भीड़ लग गयी है, और मंजु मौसी की ननद सबसे रो-रोकर शिकायत कर रही हैं कि इस लड़की से शाम को कहा था आलता लगाकर बाहर मत आना, मगर देखिये, आप लोग, कैसी फ़रेबी लड़की निकली!

दीदी कहती तुम्‍हें कुछ भी ढंग से याद नहीं रहता, ढुनमुन. तुम एक दिन बड़े होगे के पास्‍ट टेंस में नहीं बड़े हो चुकने के फ्यूचर टेंस में खड़े हो. मंजु मौसी की शादी में मैंने आलता नहीं लगाया था. मंजु मौसी की शादी में दरअसल मैं गयी भी नहीं थी क्‍योंकि उस दिन मुझे एक सौ तीन बुखार था. मंजु मौसी की शादी में दरअसल तुम भी नहीं गये थे और बुखार में पड़ी अपनी दीदी की देखरेख के लिए नहीं गए थे ऐसा नहीं था, हाथ की हड्डी तुड़वाये खोखोन की जगह जासपुर क्रिकेट टुर्नामेंट खेलने गए थे, अब याद आया?..

यानी दीदी से बात करता मैदान के दूसरी छोर पर खड़ा मैं ग़लत था? लेकिन मैं मैदान की छोर पर भी कहां खड़ा था? मैं तो जामुन के पेड़ के सबसे ऊपरी शाख पर ख़तरनाक़ तरीके से झूलता दीदी को चीख-चीखकर अपने नीचे आने की मिन्‍नत करने के लिए मजबूर कर देना चाहता था.

- दीदी तुम अच्‍छी नहीं हो! तुम्‍हें कोई हक़ नहीं इस तरह मेरी बात काटो! और तुम झूठ कह रही हो कि मंजु मौसी की शादी हो गयी है. और जब हुई तो तुम्‍हें बुखार में छोड़कर मैं जासपुर क्रिकेट खेलने गया था! तुम्‍हें बुखार में छोड़कर मैं क्रिकेट खेलने कैसे जाता, बोलो तो?..

दीदी के उलाहने, चीखने-चिल्‍लाने से नहीं, उसकी गुमसुम उदासी के शोक में ही मैं जामुन के पेड़ के सबसे ऊपरी शाख से, खुद को किसी तरह गिरने से बचाता, धीमे-धीमे नीचे उतर आया हूं. उस हिस्‍से में जहां अभी थोड़ा पहले तक रोशनी थी दीदी का कहीं पता नहीं था, उसकी यादों की परछाईं थी, पता नहीं कितना सही कितना ग़लत..

परछाइयों के पार तुम हो, दीदी?.. दीदी? दीदी?


Monday, August 4, 2008

दुनिया को कैसे देखें? देखना किस तरह सीखें?

यू रियली मीन दैट? से ईट अगेन..



तुम कहो.. मैं तुम्‍हें कहती हुई देखती रहूंगी..



हरे में चलें? कि भूरे में? गुजरे में.. संवरे में?



फोटोशॉप और पेंट पर खुरचन..

Friday, August 1, 2008

अबरार और मंजरी: एक

लड़की पर निगाह पड़ते ही मैंने खुद को कहते सुना- जय हिंद! या जय मां भवानी जैसा कुछ. मंजरी मेज़ के पीछे उंगलियां छिपाये किसी अंतरंग व्‍यापार में गहरे खोयी थी, मुझे देखा तो ऐसे देखती रही मानो कालाआजार या हैजा हूं, और मुझे देखते हुए आंखों को तक़लीफ़ हो रही हो. मैं घबराकर मुस्‍कराने लगा. वह चिढ़कर बोली- तो तुम अभी तक ज़िंदा हो? मुझे तो लगा था.. ऑफिस की याद कैसे आ गयी?

न चाहते हुए भी सुबह से चार जिरह में उलझ चुका था, इस नकचढ़ी और तबाह औरत के साथ अब पांचवे में उतरने की हसरत न थी, मंजरी को बेहयायी से जवाब दिया- तुम्‍हें देखने की तबीयत हुई, ऑफिस चला आया. तुम मन का गुबार निकाल लो, फिर वापस लौट जाऊंगा! मंजरी वापस अपने नाखूनों की सजावट में व्‍यस्‍त हो गयी थी, मेरा जवाब सुनकर तनी आंखों से मुझे घूरती रही, मानो मैं कोई चार्ल्‍स शोभराज हूं और जज के आगे मासूमी से बयान देते रंगे हाथों पकड़ा गया होऊं कि वियतनामी की कॉफ़ी में नशा मिलाने की बात सरासर झूठ है, मीलॉर्ड!

ज़हरघुली आवाज़ में लड़की ने कहा- दिन में किस वक़्त तुम सीरियस रहते हो, अबरार? कभी तसल्‍ली से बैठके हिसाब किया है दिन में क्‍या-क्‍या बकते हो? क्‍यों बकते रहते हो? अपनी उम्र का कोई होश है? मेरी उम्र का?

- तुम इतने खराब मूड में क्‍यों हो?

- अच्‍छे मूड में होने की एक वजह बता दो! थक गयी हूं मैं इन मरदूदों से!- छिनकते हुए पता नहीं क्‍या था जिसे अंदर ठेलकर मंजरी ने अपनी मेज़ का दराज बंद किया. मरदूद की गाली वह मुझे व अन्‍य मर्दों को नहीं, अपने नाखूनों को दे रही थी. पता नहीं क्‍या है मंजरी को हमेशा लगता रहा है जैसे ये नाखून ही उसकी ज़िंदगी की उदासी का सबसे बड़ा सबब हों.

- गुस्‍सा निकालना है, मुझ पर निकालो, उन बेचारों की जान को क्‍यों पड़ी हो? मुझे तो पसंद हैं..

- तुमसे तुम्‍हारी राय पूछी मैंने? फिर? मेरे आगे बकवास करने की ज़रूरत नहीं! तुम्‍हारी किसी बात का भरोसा है? हमेशा गायब होते रहते हो! एक मिनट कहोगे मैं प्‍यार के नशे में पागल हो रहा हूं, फिर दस दिन तुम्‍हारा कोई पता-ठिकाना नहीं. कोई तीसरा आकर ख़बर करता है तब बात खुलती है कि जनाब कहीं किसी की गेसू में घुसे हुए थे!

- अब ऊटपटांग तुम कह रही हो या मैं? मतलब क्या है इस तरह से तोहमत लगाने का? कहीं शैम्‍पू पर स्‍टोरी करने जाऊंगा तो गेसू के आसपास ही रहूंगा, ग्‍वालों की बस्‍ती में तो शैम्‍पू की स्‍टोरी नहीं होगी न? शैम्‍पुओं के तीन पैक लाकर तुम्‍हें दिया था, फिर भी मुझे जलील कर रही हो?

- तुम कभी सच कहते हो? अपनी अम्‍मी से भी कहा था? वो नागपुर से कौन खोजती हुई आयी थी तुम्‍हें? सक्‍सेना के कमरे में सारी दोपहर बैठी राह तकती रही, हिलने का नाम नहीं ले रही थी? उसके बारे में भी कहानी बनाओगे? बनाओ, बनाओ!

- वह कुछ लिखने-उखने का शौक रखती है, मंजी, मेरे पीछे पड़ी है, मैं उसे जानता भी नहीं! तुम खामख़्वाह तिल का ताड़ बना रही हो!

अचानक उस बेहूदा लड़की का जिक्र चले आने पर मैं सकपकाया, लेकिन मंजरी ने मेरी मुसीबत आसान कर दी. एकदम से उसकी आंखों में भारी-भारी आंसू चले आये थे, और वह सुबह के सवा ग्‍यारह बजे ऑफिस में सरेआम रो रही थी. ऐसा नहीं कि मंजरी को इस हाल में पाकर मैं निश्चिंत होता हूं, मगर जिस रास्‍ते वह निकल रही थी उसकी बनिस्‍बत यह ताज़ा सूरत निश्चित ही ज़्यादा सुकूनदेह थी. मैंने पुचकारती आवाज़ के दुलार में कहा- ये क्‍या करती हो, मंजी? तुम्‍हारे हाथ जोड़ता हूं, प्‍लीज़, बस करो अब? सब ठीक हो जायेगा. तुम भी जानती हो तुम्‍हारे बगैर मैं रह नहीं सकता!

बदहाल औरत ने एक साफ़-सुथरा करीने का तह किया सफ़ेद रुमाल बाहर किया और कुछ पलों तक उस पर नाक सुड़कती रही, उसके बाद मुझसे मुखातिब हुई- तुम एक मिनट के लिए सीरियस होगे?

- एकदम, यह भी पूछने की बात है?

- पूछने की है इसीलिए पूछ रही हूं. क्‍योंकि तुम्‍हारी किसी बात का भरोसा नहीं. ऊपरवाला भी नहीं जानता तुम्‍हारे मन में चलता क्‍या है. न तुम्‍हारे रहने का कोई पक्‍का ठिकाना है, न बैंक में पैसे हैं, न कहीं कुछ कर गुज़रने का जुनून है. और पता नहीं किन-किन चीज़ों के साथ मैं भी तुम्‍हारे लिए दिल-बहलाव की एक चीज़ भर हूं, बस! अड़तीस साल की उम्र हो रही है मेरी, अब सेटल नहीं होऊंगी फिर कब होऊंगी? इसके बारे में क्‍या जवाब है तुम्‍हारे पास? और पहेलियों में मत बात करो, मेरे सवाल का सीधा और ईमानदार जवाब दो, अभी

(जारी)