Friday, August 1, 2008

अबरार और मंजरी: एक

लड़की पर निगाह पड़ते ही मैंने खुद को कहते सुना- जय हिंद! या जय मां भवानी जैसा कुछ. मंजरी मेज़ के पीछे उंगलियां छिपाये किसी अंतरंग व्‍यापार में गहरे खोयी थी, मुझे देखा तो ऐसे देखती रही मानो कालाआजार या हैजा हूं, और मुझे देखते हुए आंखों को तक़लीफ़ हो रही हो. मैं घबराकर मुस्‍कराने लगा. वह चिढ़कर बोली- तो तुम अभी तक ज़िंदा हो? मुझे तो लगा था.. ऑफिस की याद कैसे आ गयी?

न चाहते हुए भी सुबह से चार जिरह में उलझ चुका था, इस नकचढ़ी और तबाह औरत के साथ अब पांचवे में उतरने की हसरत न थी, मंजरी को बेहयायी से जवाब दिया- तुम्‍हें देखने की तबीयत हुई, ऑफिस चला आया. तुम मन का गुबार निकाल लो, फिर वापस लौट जाऊंगा! मंजरी वापस अपने नाखूनों की सजावट में व्‍यस्‍त हो गयी थी, मेरा जवाब सुनकर तनी आंखों से मुझे घूरती रही, मानो मैं कोई चार्ल्‍स शोभराज हूं और जज के आगे मासूमी से बयान देते रंगे हाथों पकड़ा गया होऊं कि वियतनामी की कॉफ़ी में नशा मिलाने की बात सरासर झूठ है, मीलॉर्ड!

ज़हरघुली आवाज़ में लड़की ने कहा- दिन में किस वक़्त तुम सीरियस रहते हो, अबरार? कभी तसल्‍ली से बैठके हिसाब किया है दिन में क्‍या-क्‍या बकते हो? क्‍यों बकते रहते हो? अपनी उम्र का कोई होश है? मेरी उम्र का?

- तुम इतने खराब मूड में क्‍यों हो?

- अच्‍छे मूड में होने की एक वजह बता दो! थक गयी हूं मैं इन मरदूदों से!- छिनकते हुए पता नहीं क्‍या था जिसे अंदर ठेलकर मंजरी ने अपनी मेज़ का दराज बंद किया. मरदूद की गाली वह मुझे व अन्‍य मर्दों को नहीं, अपने नाखूनों को दे रही थी. पता नहीं क्‍या है मंजरी को हमेशा लगता रहा है जैसे ये नाखून ही उसकी ज़िंदगी की उदासी का सबसे बड़ा सबब हों.

- गुस्‍सा निकालना है, मुझ पर निकालो, उन बेचारों की जान को क्‍यों पड़ी हो? मुझे तो पसंद हैं..

- तुमसे तुम्‍हारी राय पूछी मैंने? फिर? मेरे आगे बकवास करने की ज़रूरत नहीं! तुम्‍हारी किसी बात का भरोसा है? हमेशा गायब होते रहते हो! एक मिनट कहोगे मैं प्‍यार के नशे में पागल हो रहा हूं, फिर दस दिन तुम्‍हारा कोई पता-ठिकाना नहीं. कोई तीसरा आकर ख़बर करता है तब बात खुलती है कि जनाब कहीं किसी की गेसू में घुसे हुए थे!

- अब ऊटपटांग तुम कह रही हो या मैं? मतलब क्या है इस तरह से तोहमत लगाने का? कहीं शैम्‍पू पर स्‍टोरी करने जाऊंगा तो गेसू के आसपास ही रहूंगा, ग्‍वालों की बस्‍ती में तो शैम्‍पू की स्‍टोरी नहीं होगी न? शैम्‍पुओं के तीन पैक लाकर तुम्‍हें दिया था, फिर भी मुझे जलील कर रही हो?

- तुम कभी सच कहते हो? अपनी अम्‍मी से भी कहा था? वो नागपुर से कौन खोजती हुई आयी थी तुम्‍हें? सक्‍सेना के कमरे में सारी दोपहर बैठी राह तकती रही, हिलने का नाम नहीं ले रही थी? उसके बारे में भी कहानी बनाओगे? बनाओ, बनाओ!

- वह कुछ लिखने-उखने का शौक रखती है, मंजी, मेरे पीछे पड़ी है, मैं उसे जानता भी नहीं! तुम खामख़्वाह तिल का ताड़ बना रही हो!

अचानक उस बेहूदा लड़की का जिक्र चले आने पर मैं सकपकाया, लेकिन मंजरी ने मेरी मुसीबत आसान कर दी. एकदम से उसकी आंखों में भारी-भारी आंसू चले आये थे, और वह सुबह के सवा ग्‍यारह बजे ऑफिस में सरेआम रो रही थी. ऐसा नहीं कि मंजरी को इस हाल में पाकर मैं निश्चिंत होता हूं, मगर जिस रास्‍ते वह निकल रही थी उसकी बनिस्‍बत यह ताज़ा सूरत निश्चित ही ज़्यादा सुकूनदेह थी. मैंने पुचकारती आवाज़ के दुलार में कहा- ये क्‍या करती हो, मंजी? तुम्‍हारे हाथ जोड़ता हूं, प्‍लीज़, बस करो अब? सब ठीक हो जायेगा. तुम भी जानती हो तुम्‍हारे बगैर मैं रह नहीं सकता!

बदहाल औरत ने एक साफ़-सुथरा करीने का तह किया सफ़ेद रुमाल बाहर किया और कुछ पलों तक उस पर नाक सुड़कती रही, उसके बाद मुझसे मुखातिब हुई- तुम एक मिनट के लिए सीरियस होगे?

- एकदम, यह भी पूछने की बात है?

- पूछने की है इसीलिए पूछ रही हूं. क्‍योंकि तुम्‍हारी किसी बात का भरोसा नहीं. ऊपरवाला भी नहीं जानता तुम्‍हारे मन में चलता क्‍या है. न तुम्‍हारे रहने का कोई पक्‍का ठिकाना है, न बैंक में पैसे हैं, न कहीं कुछ कर गुज़रने का जुनून है. और पता नहीं किन-किन चीज़ों के साथ मैं भी तुम्‍हारे लिए दिल-बहलाव की एक चीज़ भर हूं, बस! अड़तीस साल की उम्र हो रही है मेरी, अब सेटल नहीं होऊंगी फिर कब होऊंगी? इसके बारे में क्‍या जवाब है तुम्‍हारे पास? और पहेलियों में मत बात करो, मेरे सवाल का सीधा और ईमानदार जवाब दो, अभी

(जारी)

13 comments:

  1. रोचक एवं प्रेरक दास्तान है।

    ReplyDelete
  2. ये हुई न बात। दनादन पोस्ट शुरू। मगर ये कहानी आगाज़ पर ही छोड़ दी? किस्तों में ला रहे हैं क्या?

    ReplyDelete
  3. @मस्‍त महेन,

    ऐसी कहानियां कहीं एक पोस्‍ट में ठिलती हैं भला?

    ReplyDelete
  4. न चाहते हुए भी सुबह से चार जिरह में उलझ चुका था, इस नकचढ़ी और तबाह औरत के साथ अब पांचवे में उतरने की हसरत न थी......फिर भी

    वह घिघिया रहा है ....
    ऐसा अक्सर होता है ...
    और ...

    मंजरी ने मेरी मुसीबत आसान कर दी. एकदम से उसकी आंखों में भारी-भारी आंसू चले आये थे,

    ऐसा भी अक्सर होता रहा है ....
    .....
    थोड़ा कहा , बहुत समझा !! रोने को स्त्री का हथियार बताने वाले जानते हैं कि यही उसकी कमज़ोरी है और यहीं से पहाड़ फूटता है और मीठे झरने तक पहुँचा जा सकता है !!

    ReplyDelete
  5. और महामंत्री जी को इसमें जाने क्या प्रेरक दिखाई पड़ गया है !!

    ReplyDelete
  6. सोच रहा था कि गुरुदेव भी अब बड़ी पोस्ट ठेलने लगे है क्या ?शुरू किया तो लगा एक पोस्ट में ख़त्म नही होगी.....दिलचस्प है....इंतजार रहेगा...

    ReplyDelete
  7. ufff soch rahi huun..manji khisiyati hui ..kulmula rahi hogi...

    ReplyDelete
  8. अब़रार की मनोदशा और सोच अगर इसी लाइन पर आगे बढ़ती रही तो इस श्रृंखला पर भी एक घमासान अवश्यम्भावी दिखता है। चोखेर-बालियाँ ध्यान दें। ...ओहो! सुजाता जी तो पहले से ही यहाँ मौज़ूद हैं। अगली कड़ियों की प्रतीक्षा है।

    ReplyDelete
  9. सैटल होना ? कोई हो पाया है आज तक ?
    कैसे भ्रम में जी रही है मंजी ? कहीं से सुन लिया होगा सैटल का कुछ रूमानियत भरा मतलब !!!!

    ReplyDelete
  10. बच के रहिये..संभलिए..

    ReplyDelete
  11. ३८ में ही सेटल? अरे कम से कम ६८ की तो हो जा भागवान!

    ReplyDelete
  12. चीन यात्रा काहे नहीं लिख रहे हैं? नया नया सीरिज शुरु किये जा रहे हैं. पुरनका को भुलाइयेगा नहीं.

    ReplyDelete