Tuesday, August 5, 2008

परछाइयों के उजास अंधेरों में दीदी..

साइकिल नहीं थी लेकिन साइकिल की तेजी से भी तेज भागकर मैं मैदान के इस छोर से उस छोर पहुंच जाता, फिर बिना हांफे बीस तक की गिनती के पहले उस बिंदु पर लौटकर खड़ा हो जाता जिसकी सीध में मैं भी उसी तरह दीदी के पैर के अंगूठे की नोक देख सकूं जैसे अधलेटी, सामने को पैर पसारे, ‘बंधे हाथ’ के मुमताज़ से सलवार-कमीज़ वाले प्रिन्‍ट में दीदी अपने पैरों के अंगूठों, और उसके नेल-पॉलिश की रोशनी में नहाये नज़दीक के घास को निरख रही होती. फिर भागकर जीवन क्‍यों महीन तागे से भी महीन, शरीफे के कोये से भी मीठा और सांप की परछाईं से भी इतनी लचकदार है के ख़्यालों को पलक झपकते में झटककर जामुन के पेड़ के सबसे ऊपरी शाख पर चढ़ जाता और वहां से देखता दीदी के आसपास की फैली रोशनी में दुनिया कैसी दिखती है!

फिर जामुन के पेड़ के सबसे ऊपरी शाख से ख़तरनाक तरीके से झूलता, चीखकर दीदी से पूछता नीचे आ जाऊं, दीदी? और दीदी बजाय मेरे सवाल का जवाब देने के, फुसफुसाकर पलट सवाल करती कि कोई कितना भी ट्राई कर ले, वहीदा रहमान नहीं हो सकती. और मुझे होना भी नहीं है! अपनी मिस शेफाली क्‍या कम हैं? कभी देखा है जब वह अपने खुले बालों पर हाथ फेरती, गुनगुनाती बरामदे में टहलती हैं? कितना गज़ब लगती हैं, गज़ब!

फिर दीदी के चेहरे पर एकदम से कैसी तो उदासी फैल जाती और वह आंखों को हाथ से ढांपे इस तरह चेहरा फेर लेतीं कि मैं बुरी तरह डर जाता और फटी आंखों हैरतनाक़ सोलह पैरोंवाली गिलहरी की तरह सनसनाता नीचे उड़ा आता, और घबराया दीदी से मिन्‍नत करता क्‍या बात है, दीदी, बोलो न? बता दो न, प्‍लीज़?

पता नहीं फिर कितनी देर तो अचल रहने के बाद दीदी चेहरे से हाथ हटाकर मेरी दिशा में मुंह मोड़ती भी तो उन नज़रों में ऐसी बीहड़ दूरी, इतना अजानापन होता कि मेरे दिल के टुकड़े-टुकड़े हो जाते, और मैं रुआंसी आवाज़ में किसी तरह तो कह पाता कि ऐसा मत करो, दीदी, प्‍लीज़, मैं तुम्‍हारे बाल बना दूंगा? चोटी गूंथ दूं? भागकर चमेली या गेंदा के फूल ले आऊं, बालों में लगा दूंगा, देखना, कितनी सुंदर लगोगी? सच्‍ची में!

दीदी के चेहरे पर एक फीक़ी मुस्‍कान चली आती, और वह बिना मुंह खोले मुझे याद दिलाती कि रंजु दी के बाल बनाने की ज़ि‍द के लिए चाचा की पिटाई मैं भूल गया हूं? और दीदी मेरे बालों में हाथ डालकर हल्‍के से उन्‍हें बिगाड़ देती और उसे मुस्‍कराता देख कैसे तो मेरा दिल बाग़-बाग़ हो जाता और मैं बेशर्मी से हंसता भागकर मैदान के दूसरे छोर चला जाता और वहां से चीखकर दीदी को इत्तिला करता कि एक दिन जब मैं बड़ा हो जाऊंगा तो वह खुद देख लेगी कि कैसे साधना, बबीता, मुमताज़ सब फेल हैं उसके आगे और मंजु मौसी की शादी में उसे देखनेवालों की भीड़ लग गयी है, और मंजु मौसी की ननद सबसे रो-रोकर शिकायत कर रही हैं कि इस लड़की से शाम को कहा था आलता लगाकर बाहर मत आना, मगर देखिये, आप लोग, कैसी फ़रेबी लड़की निकली!

दीदी कहती तुम्‍हें कुछ भी ढंग से याद नहीं रहता, ढुनमुन. तुम एक दिन बड़े होगे के पास्‍ट टेंस में नहीं बड़े हो चुकने के फ्यूचर टेंस में खड़े हो. मंजु मौसी की शादी में मैंने आलता नहीं लगाया था. मंजु मौसी की शादी में दरअसल मैं गयी भी नहीं थी क्‍योंकि उस दिन मुझे एक सौ तीन बुखार था. मंजु मौसी की शादी में दरअसल तुम भी नहीं गये थे और बुखार में पड़ी अपनी दीदी की देखरेख के लिए नहीं गए थे ऐसा नहीं था, हाथ की हड्डी तुड़वाये खोखोन की जगह जासपुर क्रिकेट टुर्नामेंट खेलने गए थे, अब याद आया?..

यानी दीदी से बात करता मैदान के दूसरी छोर पर खड़ा मैं ग़लत था? लेकिन मैं मैदान की छोर पर भी कहां खड़ा था? मैं तो जामुन के पेड़ के सबसे ऊपरी शाख पर ख़तरनाक़ तरीके से झूलता दीदी को चीख-चीखकर अपने नीचे आने की मिन्‍नत करने के लिए मजबूर कर देना चाहता था.

- दीदी तुम अच्‍छी नहीं हो! तुम्‍हें कोई हक़ नहीं इस तरह मेरी बात काटो! और तुम झूठ कह रही हो कि मंजु मौसी की शादी हो गयी है. और जब हुई तो तुम्‍हें बुखार में छोड़कर मैं जासपुर क्रिकेट खेलने गया था! तुम्‍हें बुखार में छोड़कर मैं क्रिकेट खेलने कैसे जाता, बोलो तो?..

दीदी के उलाहने, चीखने-चिल्‍लाने से नहीं, उसकी गुमसुम उदासी के शोक में ही मैं जामुन के पेड़ के सबसे ऊपरी शाख से, खुद को किसी तरह गिरने से बचाता, धीमे-धीमे नीचे उतर आया हूं. उस हिस्‍से में जहां अभी थोड़ा पहले तक रोशनी थी दीदी का कहीं पता नहीं था, उसकी यादों की परछाईं थी, पता नहीं कितना सही कितना ग़लत..

परछाइयों के पार तुम हो, दीदी?.. दीदी? दीदी?


17 comments:

  1. मासूम याद वैसी ही पिरोई है जैसे पिरोया जाना चाहिए था ...

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  2. क्या बात है..! बहुत खूब!

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  3. भाव-भीगी, सुंदर प्रस्तुति.
    ===================
    आभार
    डा.चन्द्रकुमार जैन

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  4. अति सुंदर, प्रमोद जी.

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  5. आपकी इस पोस्‍ट ने भावुक कर दिया।

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  6. बचपन की धूप-छांह की हिस्सेदार रहीं ऐसी दीदियां जाने के बाद बहुत उदास कर जाती हैं . और तब परछाइयों के अंधेरे-उजाले में दिपदिपाती-टिमटिमाती रहती हैं .

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  7. और तुम झूठ कह रही हो कि मंजु दीदी की शादी हो गयी है...
    मेरे ख्याल से दीदी की जगह मौसी होना चाहिए था। बाकी जामुन की डालियों पर खेलते बच्चे से लेकर दीदी की उलाहना, मौसी की शादी, आलता... सब कुछ इतना सार्वभौमिक है कि हम जैसों को बीसियों साल पुरानी यात्रा पर लेकर चला जाता है, भावुक बना देता है।

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  8. @अनिल, गलती हो गयी थी, सुधार लिया है. शुक्रिया.

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  9. उपयोगी तथा ग्यान वर्धक लेख लिखा है। आभार।

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  10. पता नहीं कितना सही समझी कितना गलत। हाँ, दीदी शब्द की मधुरता एक बार फिर ताजा हो गई।
    ये दीदियाँ कहीं जाती नहीं हैं, हम व हमारे घरवाले स्वयं उन्हें ऐसी जगह छोड़ आते हैं, जहाँ से वे कभी न लौटें।
    घुघूती बासूती

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  11. अतीत की यादोँ को समेटे,
    दीदी को तलाशती
    ये लघु कथा ,
    बेहद प्रभावी लगी -
    - लावण्या

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  12. बेहद भावुक कर देने वाली मर्मस्पर्शी पोस्ट।

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  13. सारी रोशनियाँ परछाईयों के पार ही हैं..अगर हैं /ज़रूर होंगी -मनीष

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  14. सुंदर पोस्ट।
    एक मित्र की ग़ज़ल का शेर याद आ रहा है...

    सोचती है क्या पता क्या हर घड़ी जिज्जी
    मां कहे है अब सयानी है बड़ी जिज्जी

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  15. भावभीनी बयार...भावुक कर गये महाराज!!

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