Wednesday, August 6, 2008

अबरार और मंजरी: दो

लड़की सीधा और ईमानदार जवाब चाहती है. दे दूं, तो पचायेगी? पचा सकेगी? सतरह वर्षों की नौकरी और समाजी मेलजोल में मैंने एक सबक सीखा है कि लोग सीधा और ईमानदार जवाब नहीं चाहते. दो तो सन्‍न हो जाते हैं. बातचीत बंद हो जाती है, जमे हुए रिश्‍ते खत्‍म हो जाते हैं. और ऐसा नहीं है कि मंजरी यह सब नहीं जानती. न जानने जितनी भोली होती तो इस मेज़ पर नहीं बैठी होती जहां ज़रूरत के हिसाब से दुखयारी, और मौका बनते ही खुद से नीचे के खिलाफ़ हिक़ारत का सख़्त लिबास पहन लेती है. मेरी परेशानी के पलों में मुझे कभी याद दिलाना नहीं भूलती कि अपनी मौजूदा (या कहूं हमेशा की) पिटी हुई हालत के लिए और कोई नहीं सिर्फ़ मैं और मैं ही ज़ि‍म्‍मेदार हूं, और यह कि ज़िंदगी में राहत आसमान से नहीं बरसता, उसके लिए ख़ून और पसीना बहाना पड़ता है. अलबत्‍ता मंजरी भी जानती है कि इस दफ़्तर में ख़ून किसी ने नहीं बहाया, और पसीना बहाने के लिए- मैं न भी चाहता रहा होऊं- तो छांटकर, खींचकर हमेशा मुझे ही अगली पांत में खड़ा किया गया है.

लेकिन मंजरी से मैं यह सब कह नहीं सकता. कहूंगा तो वह न केवल मुझे काम से जी चुरानेवाले खुदगर्ज़ होने की गाली देगी, बल्कि गाहे-बगाहे बाहर के हमारे खाने (और मेरे पीने) का पैसा चुकाते हुए जो वह अपनी दयानतदारी की वैनिटी जीने का सुकून पाती है, थोड़ी-बहुत सहूलियत का वह मौका भी मैं गंवा बैठूंगा.

तुम सीधा और ईमानदार जवाब सुन नहीं सकतीं, मैं मंजरी से कहना चाहता हूं लेकिन बजाय ऐसी बेवक़ूफ़ी करने के, उसकी मेज़ पर कुहनी टिकाकर मुस्‍कराने लगता हूं. फट से लड़की की भौंहें चढ़ जाती हैं, तमककर फूटती है- देखा? देखा तुमने? ये है तुमसे सीरियसली बात करने का नतीजा!

मैं मंजरी के गुस्‍से का बुरा मानने की एक्टिंग नहीं करता, जेनुइनली उसकी तमकती आंखों को पढ़ने की कोशिश करता हूं. क्‍या है इन आंखों में, कहां जाना चाहती हैं ये आंखें? तीसरे-चौथे मेरे बरामदे के सूराख़ से होकर रसोई में तांकझांक करने आनेवाली भूरी बिल्‍ली और मंजरी की आंखों का क्‍या फर्क़ है? मंजरी की ही तरह बिल्‍ली भी मुझसे दु:खी रहती है कि उसकी खातिर मैं ज़रा सा दूध तक नहीं सहेज सकता. दो दिन पहले ऐसे ही नहीं रहा होगा कि खिड़की के नीचे लगाकर रखे एब्‍सोलूत की आधी बोतल को जाते-जाते गिराकर तोड़ती गयी थी. दूध न पाने की झुंझलाहट बेचारी बिल्‍ली आखिर कबतक बर्दाश्‍त करती. मंजरी कबतक करेगी?

- ऐसे क्‍या दिक़्क़त है, मंजी? सेटल होने से क्‍या बदल जायेगा? ऑफिस में सबको मालूम है-

- मैं शादी के लिए नहीं कह रही तुमसे! सपने मत देखो. ऐसे ही कम परेशानी नहीं कि तुमसे शादी रचाके अपनी मुसीबत बढ़ाऊं!

मैंने राहत की सांस ली. ऊपर बुरा मानने की एक्टिंग करते हुए कहा- फिर किस बात की तक़लीफ़ है? तुम्‍हारे फ्लैट के सोफ़े पर बैठकर दुनिया-जहां की सब तस्‍वीरें दिखती हैं, बस एक दुल्‍हनवाले लिबास में तुम्‍हारी फ़ोटो की कमी देखकर मेरा दिल भर आता है, और तुम हो कि कहती हो..

शायद शादी की ज़ि‍रह के बैकग्राउंड में जाने के उत्‍साह में मैं दो कदम आगे चला गया था. दुल्‍हनवाले लिबास का मेरा तंज़ ताड़कर मंजरी ने कटी नज़रों से मुझे घूरा, फिर चेहरा झुकाकर अपने सेलफ़ोन को मेज़ पर दायें-बायें घुमाने लगी. धीमी, दबी आवाज़ में फुसफुसाकर बोली- वह बात नहीं है, अबरार. मेरी उम्र हो रही है. इस तरह अकेली, उदास ज़िंदगी से थक गयी हूं.. तुम समझ रहे हो?

नहीं, मैं नहीं समझ रहा था. कुछ दिनों तक नियम से अगर बिल्‍ली रसोई में मेरे बोतलों को तोड़ती रहे तो शायद मैं उसे समझने लगूं, लेकिन मंजरी की यह ‘ओह, बेचारी मैं!’ मेरे पल्‍ले नहीं पड़ेगा. ज़िंदगी में हर कोई अकेला होता है, और उदासी जीवन का स्‍थायी भाव है, डिपेंडिंग आप उसे किस एंगल से देख रहे हैं. मंजरी शायद मुझे किसी और एंगल से दिखाना चाहती थी.

- तुम सचमुच पैदल हो, यार. मैं बच्‍चा चाहती हूं, अबरार! मैं नहीं चाहती कि अब और लेट हो, समझते हो?

- बच्‍चा चाहती हो तो ले आओ बच्‍चा. उसमें क्‍या मुश्किल है. उसके लिए तो किसी एंगल की भी ज़रूरत नहीं, बस खास तरह से लेटकर कुछ दिनों कसरत करनी होगी, आ जायेगा बच्‍चा. अलबत्‍ता आकर ऐसी दुनिया में करेगा क्‍या वह दीगर सवाल है.

- उसके लिए तुम क्‍या करोगे?

- मैं क्‍या करूंगा मतलब? मुझे भी कुछ करना होगा?- मैंने भोलेपन में सवाल किया.

मंजरी सुलगती नज़रों से मुझे घूरती रही.

(जारी)

7 comments:

  1. सही बहाव है..आगे बतायें..याने जारी रहें.

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  2. लगता नहीं कि यह इन दोनों का पहला प्यार है (अगर इसे प्यार कहा जाए तो)। ऐसा खेल कोई पहले प्यार में ही खेलने लगे, मुश्किल है।
    वैसे मुझे पक्का यकीन है कि अबरार कहानी के खत्म होते न होते ज़रूर पिटेगा। ;)

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  3. @महेन,

    सही बात. लाजमी है. पिटना. एक चप्‍पल मैं भी लगाता. मगर सिर्फ़ अबरार मियां के ही नहीं लगाता, मोहतरमा मंजरी के भी लगाता.

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  4. हम तो चिपक कर पढ़ते गये। अगली कड़ी भी जल्दी भेजें।

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  5. bechari ladki kahaan to fansii...abuu miyan kitney chilbissey kism ke insaan hai aakhir?

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  6. जारी रखिये .....पढ़ रहे है...

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  7. बेहद सजीव लेखन है आपका
    - पढ रहे हैँ
    -लावण्या

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