Thursday, August 7, 2008

अबरार और मंजरी: तीन

बच्‍चा लाने की मंजरी की बेकली को दीवार की कील पर टांगकर मैं इस औरत से सवाल करना चाहता था, या चाहता था मेरी कायरता पर रहम खाकर कोई और आये और पूछे इस औरत से बच्‍चा क्‍यों चाहती है? क्‍योंकि सक्‍सेना या बालन के घर पर बच्‍चों की किसी गैदरिंग या पार्टी में उनके लिए वह कभी गिफ्ट लेकर गयी हो, या बेचारों को अपने पास ही फटकने दिया हो मुझे याद नहीं पड़ता. बच्‍चों के लिए गिफ्ट कभी मैंने भी नहीं खरीदी मगर उसकी वजह मेरी आत्‍मा का कमीनापन नहीं रहा है. ठंडापन मेरे दिल की गर्म सांसों की नहीं, जेब की मुसीबत रही है. गिफ्ट तो अपने जन्‍मदिन पर भी मैं अटकी सांस लिए आखिर तक राह तकता रहा था कि दिन बीतते न बीतते खुद को कुछ खरीदकर दे सकूं. और नहीं तो कमज़कम एक बाथरुम स्‍लीपर ही सही.. जबकि अंत भूरी बिल्‍ली के लिए दूध का एक बाउल खरीदने से हुआ था (जिसे ढंग से भरा जा सके उतना दूध खरीदना फ़ि‍लहाल अभी तक बाकी है!).

बच्‍चों की संगत में मैं खासा चहकता पाया जाता रहा हूं. जबकि मंजी के साथ वह बात नहीं है. बहुत बार किसी बच्‍चे के साथ मुझे हंसता देख मंजी ने हैरत से ऐसे मुंह बिचकाया है मानो फिर इसका भेद पा गयी हो कि मेरी तनख़्वाह उसकी तनख़्वाह के मुकाबले आधी से भी कम क्‍यूं है.

ऐसे मौकों पर मंजी के अंदर कभी लाड़ उमड़ता तो मेरे कंधे अपनी ठोड़ी धंसाकर फुसफुसाकर कहती- बच्‍चे बुरे नहीं अगर दूसरों के हों. या एकाध घंटे खेलने के लिए बुरी चीज़ नहीं.

- एकाध घंटे खेलने के लिए मैं ही कहां बुरी चीज़ हूं!- बेशर्मी से दांत दिखाकर मैं मंजी के कड़वे ऑब्‍ज़र्वेशन की लगाम कसता, और वह कड़वा सा मुंह बनाकर मुझसे परे हट जाती.

ऐसी मंजी बच्‍चा लाना चाहती है! एकाध घंटे नहीं रोज़-रोज़ आंखों के आगे एक खिलौना बना रहे के लिए बच्‍चा चाहती है? बची हुई ज़िंदगी के सालों के अकेलेपन, उदासी को पूरने का सेंटिमेंटल क्‍युअर चाहती है मंजी? सेंटीमेंट्स समझती है? इस औरत का कैसा भी क्‍युअर कभी संभव है?

मेरा बस चलता तो मंजरी की जगह सामने मेज़ पर भरे हुए बाउल से बिल्‍ली को दूध पीता सुकूनदेह देखता होता, और फ़ुरसत के किसी पल उंगलियों में जलती सिगरेट की राख झाड़ बिल्‍लीरानी से सवाल करता उदासी और अकेलापन हरण के लिहाज़ से दुनिया में बच्‍चा लाने के बाबत उसकी राय क्‍या है. बिल्‍ली चौंककर बाउल से अपना मुंह हंटाती, एक ओर ज़रा सा गर्दन झुकाकर नीची नज़रों से मुझे ताड़ती, फिर तक़लीफ़ और असमंजस में जबड़ा कसकर बुदबुदाती कि मैंने उसे दूध पीने को न्‍यौता था, या अकेलेपन और उदासी के सवालों में उलझाने को?

मैं मुस्‍कराकर बिल्‍लीरानी से माफ़ी मांग लेता, और फिर कुछ देर तक हम दोनों ख़ामोश एक दूसरे को चुपचाप देखते बैठे होते. फिर बिल्‍ली बाउल में सिर डालकर खुद को मुझसे छिपा लेती. फिर अचानक एकदम से चेहरा बाहर करके चौंकी आंखों मुझे तकती, फिर धीमे-धीमे अपने एक-एक शब्‍दों को तौलती कहती- यू नो, ज़िंदगी जीभ पर ईल मछली का स्‍वाद है.. लेकिन अकेलापन.. अकेलापन और उदासी वह समूचा समुंदर है जिसमें ईल मछलियां रहती हैं.. मुझे मालूम नहीं मैं कितना साफ़-साफ़ कह पा रही हूं जो कहना चाहती हूं.. बट रफ़ली यू गेट द पिक्‍चर..

इतना कहकर बिल्‍लीरानी अपने अगले दोनों जुड़े हुए पैरों पर चेहरा गिरा के भोलेपन से मुझे देखती, मानो मुझसे भोले को कुछ भी समझाने की कोशिश कितनी बेमतलब है. मैं भूरी बिल्‍ली की बात का बुरा मानने की जगह मंजी के सवाल का जवाब देता- नहीं, नहीं, मेरे जैसे ओछे और ऑर्डिनरी बीइंग को ऐसी बड़ी ज़ि‍म्‍मेदारी मिलेगी इसका यकीन नहीं हो रहा था इसीलिए.. दैट्स व्‍हाई..

- दैट्स व्‍हाई व्‍हॉट?- मंजी अभी भी चिढ़ी हुई थी. ज़हरघुली ज़बान. ज़हरपियी नज़र.

मैंने संभलकर, संभालकर धीरे-धीरे समझदारी से कहा- नहीं, नहीं, इट्स ऑल फाईन विद् मी. तुम हुक़्म करो मुझे क्‍या करना है. कब करना है.

(जारी)

6 comments:

  1. हम्म आज का कोटा भी हो गया .....

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  2. बहुत ही उम्दा, इंतजार रहेगा अगले पन्नों की स्याही का।

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  3. हम लगातार इस आधुनिक लोककथा को पढ़ रहे हैं..पहली कड़ी
    से ही आपका नायक अबरार मंज़री को "ज़हरघुली ज़बान. ज़हरपियी नज़र." जैसी उपमाओं से नवाज़ रहा है तो फिर साथ साथ क्यों ?

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  4. मंजरी की जगह धीरे-धीरे बिल्ली ले रही है। क्या माजरा है?

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  5. aapkaa nayak.....janey dijiye...ab kya kahen...aap to aagey padhvaaiye..

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  6. नो, ज़िंदगी जीभ पर ईल मछली का स्‍वाद है.. लेकिन अकेलापन.. अकेलापन और उदासी वह समूचा समुंदर है जिसमें ईल मछलियां रहती हैं..
    great imagination Sir !
    - L

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