Saturday, August 9, 2008

अबरार और मंजरी: चार

मेरी दो कौड़ी के सेंस ऑफ़ ह्यूमर का लड़की ने बुरा नहीं माना. मतलब मेरे मुंह में जलती हुई लकड़ी डाल देने की अकुलाहट में सुलगती नहीं दिखी. खुद को ज़रा पीछे ठेलकर इतमिनान से कुर्सी पर मुझे दूर नज़रों के कौतुक से देखती रही, फिर बोली- तुम क्‍या समझते हो, मैं जानती नहीं तुम अपने को कितना होशियार समझते हो?

मैंने जवाब नहीं दिया कि मैं अपने को कितना होशियार समझता हूं.

मेज़ से एक पेंसिल उठाकर उंगलियों के बीच ऐसे घुमाता रहा मानो मंजरी एक लाईन भी और कहेगी तो मैं सात साल के बच्‍चे की तरह बुरा मानकर कमरे से भाग खड़ा होऊंगा. यह मंजरी भी समझ रही होगी, इसीलिए एक लाईन और कहे बिना उससे रहा नहीं गया. दरअसल एक लाईन और के बाद उसने एक लाईन और, फिर उसके बाद और भी ढेरों लाईनें कहीं. और कोई भी लाईन मेरी तारीफ़ में नहीं था.

- मैं ही नहीं इस ऑफ़ि‍स में सब जानते हैं तुम अपने को जितना होशियार समझते हो! मगर मेरे जितना सब ये नहीं जानते व्‍हाट ए स्‍टुपिड डंबऐस यू आर,- इतना कहकर लड़की अपने आजू-बाजू ऐसे देखने लगी मानो सिगरेट खोज रही हो, मैंने लगभग रुंआसा होने की एक्टिंग करते हुए अपने पैकेट से निकालकर उसे एक सिगरेट ऑफर किया.

मंजरी ने सिगरेट के दो टुकड़े करके उसे अपने कचरा बास्केट के हवाले किया और अपने गाल को अपने दायें हाथ का दुलार देती हुई आराम से बोली- प्‍यार के दो बोल बोल लेती हूं, तुम्‍हारे लिए अफ़ेक्‍शन फ़ील करती हूं, एंड सी हाऊ यू ट्रीट माई फ़ीलिंग्‍स? किस बात का इतना घमंड है तुम्‍हें? होशियारी का? यू रियली थिंक यू आर सम होशियार, आं? लिफ़्ट के बाहर वो जो नेपाली लड़का बैठता है उसकी हैसियत भी तुमसे बेहतर है, एंड द फन्‍नी थिंग इज़ दैट ही ऑल्‍सो नोज़ इट. एंड द मोस्‍ट फन्‍नी थिंग इज़ दैट यू ऑल्‍सो नो दैट ही नोज़ इट, एंड एवरीबडी नोज़ इट!

मुहब्‍बतघुले खंज़र से छोटे-बड़े हर तरह के ज़ख़्म करती मंजरी पल भर को ख़ामोश हुई, फिर एकदम से हंसने लगी.

मैंने बिना किसी तंज के कहा- तुम्‍हें इतना फनी लगता है तो कहो तुम्‍हारे साथ मैं भी हंसने लगूं.

थोड़ी देर तक इसी तरह अटक-अटककर खुशी ज़ाहिर करते रहने के बाद लड़की बोली- व्‍हाई डोंट यू बाइ मी ए ड्रिंक फॉर ए चेंज, तुम्‍हारे बारे में मैं तुम्‍हें कुछ इंटरेस्टिंग बातें बताना चाहती हूं.

- आई एम सॉरी, बट आई एम नॉट इन ए पॉज़ि‍शन टू अफॉर्ड सच ए चेंज, और इंटरेस्टिंग बातें तो तुम यहां बिना सिगरेट और दारु के असर में यूं ही हंसते-हंसते बता रही हो, इतनी सी बात के लिए बाहर जाकर पैसा खराब करने की क्‍या ज़रूरत है.

- ओह, पुअर अबरार, व्‍हाई डोंट यू स्‍टार्ट क्राइंग? प्‍लीज़, गो अहेड, मैं तुम्‍हारे आंसूं पोंछ दूंगी, तुम्‍हारा सिर अपने कंधे पर रखकर थपकी दे दूंगी? कम ऑन, रोओ ना..

मैंने चेहरा घुमाकर बेरूखी से कहा- जाने दो. मैं तुम्‍हारे कपड़े खराब करना नहीं चाहता.

मेरा जवाब सुनकर मंजरी फिर हंसने लगी. मैं फिर ख़ामोश बना रहा.

आसपास भूरी बिल्‍ली होती, और उसे दूध पिलाकर संतुष्‍ट करने लायक मेरी जेब में पैसे होते तो मुझे पक्‍का यकीन है उसने भी छूटकर यही सवाल किया होता कि ऐसी औरत आख़ि‍र तुमसे बच्‍चा चाहती क्‍यों है? और मैंने भी छूटकर यही जवाब दिया होता कि आई डोंट हैव ए क्‍ल्‍यू.

इच्‍छा हुई मंदीप को फ़ोन करके कहूं मुझे दूध खरीदने को कुछ पैसे चाहिए. फिर साथ ही यह भी याद आया कि मेरा सेलफ़ोन काम नहीं कर रहा.

(जारी)

3 comments:

  1. अगली कड़ी का इंतज़ार--

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  2. ये क्या लिख रहे है जी इस पर आपके हस्ताक्षर नजर नही आते :)
    वाकई मे एक बहुत खूब सूरत रचना. वैसे मुझे इसका शीर्षक देखकर लखनऊ दूरदर्शन पर आतए एक प्रोगाम की लाईने याद आ गई : अब आपके सामने है "अम्मार मंजरी का घर चौबारा" यानी मंजरी जोशी और अम्मार रिजवी ग्रह मंत्री , बाकी आप ज्यादा जानते है जी :)

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  3. वाह साहब! कथा की बुनावट तो काफ़ी इन्टरेस्टिंग होती जा रही है!

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