Sunday, August 10, 2008

अस्तित्‍वरहित?..

तेईस वर्ष की चढ़ती उम्र में बोर्खेस ने सात पृष्‍ठों का एक छोटा लेख लिखा था (बाद के वर्षों में गागर में सागर की उनकी शैली और-और निखरती ही गयी). लेख था- ‘द नथिंगनेस ऑफ़ पर्सेनैलिटी’. लेख में ज़रा आगे चलने पर एक पंक्ति आती है - “..What is not carried out does not exist;” इस निहायत सरल, निर्दोष-सी पंक्ति पर आकर मैं एकदम से अटक गया. अभी तक उसी में अटका, उलझा पड़ा हूं..

भगवान ही जानता है जिस अकेले काम को जीवन में अंजाम दिया है वह सिर के बालों की सफ़ेदी करवाने, और देह पर की चर्बी चढ़ाने की रही है, बकिया के तो सारा कुछ ब्‍लूप्रिंट और खाक़े ही बनते रहे हैं (और ठीक से बनें इसके पहले आमतौर पर बिगड़ते ज़्यादा रहे हैं!).. मगर इतने तो काम हैं. पता नहीं कितने हैं. लेकिन, चूंकि निष्‍पादित नहीं हुए तो उनका अस्तित्‍व नहीं? फिर एक्सिस्‍ट क्‍या करता है? महज़ मेरे सफ़ेदी रंगे मेरे बाल और बेहूदा वज़न?

ठीक इतवार के ऐसी बात याद कराना सही है, बोर्खेस?

11 comments:

  1. सही है....हर ऐसी बात जिसे अंजाम नहीं दिया उसका अस्तित्व नहीं है...

    सोच से भाव और फिर विचार....सिर्फ विचार का अस्तित्व है...या नहीं?!
    ...प्रिंट का तो है....ब्लूप्रिंट का नहीं?! पूरे किये इमारतों का अस्तित्व है...उनके डिज़ाइन का...?!

    सच तो यह है अस्तित्व सिर्फ विचार का है....आप कितनी ऊर्जा देकर उसे अपने perceptional dimensions में जिंदा कर सकते हैं....वह तय करता है आप इस विचार के अस्तित्व को महसूस कर सकते हैं कि नहीं....।

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  2. आपकी उलझन को क्रमबद्ध करने में शायद अस्तित्ववाद(existentialism) का दर्शन मददगार हो जो मोटे तौर पर यह मानता है:-
    Every one of us, as an individual, is responsible—responsible for what we do, responsible for who we are, responsible for the way we face and deal with the world, responsible, ultimately, for the way the world is.
    It is, in a very short phrase, the philosophy of 'no excuses!' We cannot shift that burden onto God, or nature, or the ways of the world. --Professor Robert Solomon

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  3. गुरूजी प्रणाम.
    आगे समाचार ये कि यंहा सब कुशल मंगल है और आपकी कुशलता की भगवान् से सदैव प्रार्थना है.
    बाकी सब बहुत कठिन-कठिन है.
    सो अलग रख छोड़ा है.

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  4. @दोस्‍तो, विचारवैभव डाकदर बोरखी, डाकदरनी बेजी ईरानी, राबर्ट सुलेमान, बाबू किशन पॉल सब सहिये कह रहे हैं. एक हम ही हैं, सही का फेर नहीं पा रहे हैं. फेलियरायी सी गहन अनुभूति हो रही है. हो रही है क्‍या, है.

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  5. हम्मौ नहीं पा रहे हैं कुछ. एक दिन एक ठो कह गये कि वर्तमान कछु हइये नहीं- सब या तो भूत है या भविष्य-या तो अस्तित्व है या विचार. सुन लिए और बेवकूफ की तरह ताकते ताकते कल्ले बड़ी मुश्किल से उबर पाये और आज आप!! एक ठो नई माचिस की डिब्बी लिए खड़े हैं. हद्द है भईये!! खैर, इसे भी बार लेते हैं.ज्यादा त ज्यादा, हम भी पटखनी खाये पड़े रहेंगे.

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  6. लेकिन आपको यह सब इतवार को ही पढ़ाने को मिला था। कल पढ़ाते/ चढ़ाते जब हमारे पास पढ़ने की फ़ुरसत न होती।

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  7. well - morbid/ cynical twist is - after the time I will be carried out, I shall cease to exist as well - rgds manish

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  8. हँ तो भाई दे्खीए की अज़दक जी परमोद एकटो भारी भरकम किताब पढ़े हैं,
    सो उनसे बदहज़मी के चलते ईहाँ आकर उगिला गया है, जना दिये हैं कि हम
    पनीर बटर मसाला और दूपियाज़ा कैटेगरी के हैं ।
    हाज़मा की दवाई ईहाँ है लेकीन पहोंचायेगा कउन ?

    ए भाई तनि ठीक से चिबा चिबाके काहे नहीं पढ़ते हैं, ऊ चउथे पेज़ पर खुलासा का इशारा कर दिये हैं, अउर आप हदिया के आगे टप गये हैं ।
    ईहाँ घटिया ब्लागर सब का रांग नम्बर न-नू डायल करीये ।

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  9. .

    अब आप मानी मातलब सब का एप्रूभलो दिजियेगा,
    दुर, हम बेकारे ईहाँ अपना माथा चोथा रहे हैं, जाते हैं !

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  10. सही कहते हैं, डाक साहब.

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  11. गुरूजी प्रणाम.
    बधाई बधाई बधाई
    ऐसे ही नहीं ना आपको गुरु माने है.
    साठ तो अपनी भी हो गई.
    बाकी क्या है?
    सेलेब्रेशन भी होगा, जरुर होगा आपकी हजारवीं होते-होते अपन भी सौवी कर डालेंगे.

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