Monday, August 11, 2008

छक्‍का!

पाप मनसा, दुराचारी दिव्‍यदृष्टि वाले कृपया इसे अपने, या मेरे- प्रति प्रयुक्‍त संज्ञा न समझें. निष्‍पापी मानसों से भी कुछ ऐसा ही विनम्र निवेदन है. अलबत्‍ता बाल की खाल निकालनेवाले, व अपनी चार पैसे की टकसाल संभालनेवाले स्‍वयं को किसी भी रूप में सुशोभित करने को स्‍वतंत्र हैं ही. मैं उनकी नाल नहीं थाम सकता, न ही बाल खींच सकता हूं. बाल जो है इन दिनों अपनी ही खींच रहा हूं. वैसे खींचने से ज़्यादा नोंच रहा हूं कहना ज़्यादा अर्थगर्भित होगा (हालांकि खींचने से ऐसा नहीं हो रहा कि अर्थ पा जा रहा हूं. पैसे तो ख़ैर, नहीं ही पा रहा हूं)..

लब्‍बोलुआब यह कि (लब्‍बोलुआब सही लिखा है न? क्‍या वडनेरकर वर्ड मास्‍टर, इज़ इट करेक्‍टली स्‍पेल्‍ड? अभय भैया? डाक्‍टर बेजी ईरानी?) शीर्षक किन्‍हीं भी दुराचारी आग्रहों से मुक्‍त, महज छह सौवें पोस्‍ट के सेलिब्रेशन में लिखा है. और सेलिब्रेशन मोड में इसलिए आ गया हूं कि पता नहीं आगे आने की स्थिति बने, न बने. अब जैसे कल ही जिस तरह स्‍वयं का अस्तित्‍व तक संशयप्रश्‍न हो गया था, न अचीव करने की घिग्‍घी बंध गयी थी, आगे किन-किन बिंदुओं पर व कहां-कहां बंधता रहूंगा, कौन जानता है? कौन जानता है कल सेलिब्रेशन हो न हो? ससुर शाहरूख हमेशा नहीं रहनेवाले हैं तो हमारे पोस्‍ट ही इस सवाल पर छिनकते हुए उस दृश्‍य विशेष का अवलोकन करते हुए हज़ार और पोस्‍ट-हज़ार पहुंचेंगे थियरेटिकली मानने को मैं हमेशा आत्‍मविश्‍वासी दंभ में मानता रहा हूं, मगर वह मनन अब हिचकोले खा रही है, उस बालकिशनसुलभ आत्‍मविश्‍वास में दरारें पड़ रही हैं. हजारीप्रसाद या हज़ारीपोस्‍ट हूंगा ही में अब स्‍ट्रॉंग डाउट्स हो रहे हैं..

मां कहती थी सूप तो हंसली त् हंसली, चलनियो हंसली जेमे बहत्‍तर गो छेद, तो बहत्‍तर एंड स्टिल काउंटिंग छेदों का मनभावन जीवन-यापन करते हुए स्‍वाभाविक है मैं कल को छेद से दस कदम आगे जाकर मिस्‍टर गड्ढा बन जाऊं, हज़ारी बनने के अरमान अडवाणी के प्रधानमंत्रित्‍व का सपना भर बना रह जाये? वैसे यह भी सही है कि हज़ारों पोस्‍टें ऐसी कि हर पोस्‍ट पर दम निकले! मगर इसी सच्‍चायी के ऊपर हरजायी यह भी है कि फ़ि‍लहाल दमदार छेदों के नीचे कचुमर निकल रहा है. और आज की महानगरीय कचुमरमार महासच्‍चायी है कि अगर आपके हाथ में बिग बाज़ार का भरा हुआ झोला नहीं और जेब में झोले को भरने लायक तीन सुलगते-चमकते डेबिट-क्रेडिट कार्ड नहीं तो आप पोस्‍टों की दे-दनादन शेरो-शायरी वाली हर्षिल मन:स्थिति की जगह आसानी से सियारवाली मुरझाइल, मुर्दिल मोड में पहुंच सकते हैं! छेदों की छुअन, चुभन में उमगता मैं वहीं पहुंच रहा हूं. अनुभूति लगभग वही वाली है. हजारीप्रसाद वाली नहीं ही है.

तो फ़ि‍लहाल टीम के टिनहे स्‍कोर में एक अपना भी छक्‍का जुड़ गया है तो सेलिब्रेट कर लेने में क्‍या हर्ज है? क्‍योंकि, जैसाकि पहले कहा ही था, कौन जानता है कल को सेलिब्रेशन हो न हो?

12 comments:

  1. खूब जमा सेलेब्रेशन और छ सौवीं पोस्ट. आप हज़ार पोस्ट जल्दी ही पूरी करें, ऐसी कामना है..... दमदार छेदों के नीचे कचूमर! छेदों में कहाँ का दम आता है? टीम का टिनहा स्कोर में सारा कुछ तो यही है. बाकी तो किसने क्या बनाया? कोई दुवौ रन नहीं बना सका.

    आप तो एक-एक ओवर में छ-छ छक्के लगाते रहें.

    और ई जोकरवा कौन है?

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  2. हमें आप यह बतायें ...यह ब्लॉगिंग हुआ...पतनशील क्यों नहीं?!

    600 पोस्ट पढ़ कर भी देखोजी इत्ता ही आत्मसात किया है!!
    correct spellings at your end!

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  3. अरे गुरुवर ६०० ...कुछ सचिन को भी कहिये ...आजकल बहुत अटक रहे है

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  4. सेलिब्रेशन hotey rahne chahiye is sey insaan ke zinda honey ka ehsaas bana rahta hai....badhaayi...

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  5. बधाईयाँ जी बधाईयाँ..

    रही बात लब्बो-लुआब की तो प्रचलित तो यही है तो सही है.. पर लुग़त के अनुसार लुब्बे-लुबाब शुद्ध है!

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  6. मेरी तरफ से भी बधाईंयाँ टिका लो और शुभकामनाऐं तो हैं ही हैं. :)

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  7. इस ‘छक्के’ को सलाम। ...करना पड़ता है भाई! शायद कभी अपनी बारी भी आ जाय। (आत्ममुग्ध मुस्कान)

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  8. छै सौ!
    गज़ब का दम है हजूर।
    बधाई हो, पाल्टी बनती है न ;)

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  9. हे माननीय षष्ठशतकाधिराज, नमन - आप पाँच सौ निन्यानवे के फेर से निकले इसकी भी बधाईयां, [हज़ार अभी गिन लें पोस्ट भी होंगी (:-)]- सादर मनीष

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  10. छक्का और बहत्तर छिद्ग चिंतन ! सही है।
    लुब्बे लुबाब ही सही है। बाकी जो वापरें वो भी सही है। अड़ते आना चाहिए। हिन्दी ज़िदाबाद।

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