Tuesday, August 12, 2008

दिल चाहता है..

कान में कनफूल खोंसे उदयपुरिया उद्यमी जो घिसे नीले पॉलीथीन के नीचे ज़रा देर को थमी बरसात में तेज़ी से चाकू पर धनिया और सेज़वान चटनी फेरता मसालेदार सैंडविच उगलता, आईटी इंडस्‍ट्री के भुखाये बच्‍चों की भूख तोड़ रहा, और अपना भविष्‍य जोड़ रहा है.. उसके ठेले पर इकट्ठा भीड़ की दयानतदारी से नाउम्‍मीद होकर एक देसी भूरा कुत्‍ता सरककर सड़क पर मसालेदार दो कौड़ि‍या नमकीन के रैपर से जूझ रहे छोटे बच्‍चे की ओर आ गया है.. घड़ी भर पहले तक हाथ में नमकीन का रैपर दबोचे बच्‍चा उन्‍मुक्‍तभाव मुदित होना चाह रहा था, अब अचानक इस बिनबुलाये हसरतज़दा कुत्‍ता-मेहमान की संगत में सकुचाया, घबराकर बेबस हो रहा है. रैपर खोलते बन रहा है न मां की छत्रछाया को सौंपकर आसन्‍न हमले की आशंका से निश्चित हो लेने की तबियत हो रही है. और बड़ी-बड़ी आंखों में निर्दोष हसरत की आंच जलाये कुत्‍ता बेशर्म है कि बच्‍चे की छांह से छंट नहीं रहा, हट नहीं रहा. बच्‍चा दहल रहा है. बीच सड़क अशिक्षित देहाती मां खिसिया रही है. निर्दर्द्वंभाव कुत्‍ते को दुरदुराने से खुद को बचा रही है. बच्‍चा रैपर नहीं खोल रहा लेकिन कुत्‍ते का दिल टूट नहीं रहा. कुत्‍ते का दिल कह रहा है..

भीगी शाम के पियराये अंधेरे में मंजुकुट्टी सड़क लांघकर अपने रेस्‍टोरेंट की तरफ़ आता है, और साइनबोर्ड पर उड़ती सी नज़र पड़ते ही इकतालीसवर्षीय मंजुकुट्टी के मन में फिर एक दबा दर्द उभर आता है. अभी पिछले हफ़्ते ही बत्तियां रिप्‍लेस की थी, मगर बोर्ड पर रोशनी फेंकने को लगे तीन बल्बों में सिर्फ़ एक ही जल रहा है. बोर्ड के तीनों बल्‍ब जल रहे हों मंजुकुट्टी ने आखिरी मर्तबा ऐसी चमकती शाम कब देखी थी, मंजुकुट्टी को याद नहीं. मंजुकुट्टी का मन करता है..

सत्‍यस्‍वरूप नहीं जानते उनका मन क्‍या करता है. रूटिन से बंधे दिन के घंटों के फैलाव से स्‍वयं को गुज़ारकर एक निश्चित समय में कमरे में अंधेरा करके दिन ख़त्‍म हुआ स्‍वीकार लेने की उन्‍होंने आदत बना ली है.. नियम से रोज़ सुबह पोते को स्‍कूल पहुंचाना, बहु की ऐसी और वैसी शिकायतों को न चाहते हुए भी सुनते रहना, दवाइयों के रैपर सहेजना और कभी सुचित्रा मुस्‍कराते हुए कैसी दिखती थी की याद करके हैरत में पड़ जाना- जीवन के बचे हुए वर्षों के दिनों के बीतने-बिताने का ऐसा ही जीवन जीना उनकी किस्‍मत में लिखा है जैसी सोच सोचकर सत्‍यस्‍वरूप आश्‍वस्‍त रहते हैं. हालांकि कभी यह भी ख़्याल आता है कि शायद कभी बहु लंबी छुट्टी में अपने मायके जाये तो वह फ़ुरसत में रामचरितमानस पढ़ना चाहेंगे, माने दिल चाहता तो है..

नीला नहीं चाहती कि मनोज से रोज़ चिखचिख हो. मनोज भी नहीं चाहता, लेकिन नीला मानती नहीं.. फ़ैक्‍टरी में सब जानते हैं सेठ ने उसे बटन टांकने के काम पर क्‍यों रखा है, मगर फिर भी नीला फ़ैक्‍टरी का काम छोड़कर घर बैठ जाये ऐसा नहीं कर रही, रोज़ नौ घंटे घर से बाहर रहती है.. मनोज दिन भर झुंझलाया आपे से बाहर रहता है. शाम को दारु पीकर लौटता है, तब और भी आपे में नहीं रहता. रात के खाने पर बिना नागा दोनों एक दूसरे को ज़हर परोसना शुरू करते हैं. हालांकि दोनों चाहते हैं..

कुत्‍ते का दिल भी चाहता है..

ज़िंदगी का दिल.. चाहता है..

3 comments:

  1. यदि वह हो जाए जो दिल चाहता है तो अगले ही क्षण दिल कुछ नया चाहना शुरू कर देगा। वैसे कुत्ते के दिल की चाह ही ऐसी है जो शायद पूरी हो जाए और यदि पूरी हो जाए तो कुछ पल को ही सही, उसका दिल खुश भी हो जाए।
    घुघूती बासूती

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  2. रात के बारह बज चुके हैं। ब्लॉगर ने आधे से अधिक reader feed निपटा दी है। काफी कुछ टिपिआया भी है। लेकिन अभी बहुत सा छूटा पड़ा है। उधर बिस्तर पर कोई इन्तज़ार करके सो गया है। चाहता है कि वहाँ भी सबकुछ ठीक रहे और यहाँ ब्लॉगरी भी ‘उड़न-तश्तरी’ बन जाय। बस दिल चाहता है…लेकिन?

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  3. @सिद्धार्थ प्‍यारे, वही है जो पढ़े, सुने. उससे ज़्यादा अगर कुछ है तो हमारी भी पकड़ में कहां आ रहा है?

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