Wednesday, August 13, 2008

यहीं कहीं आसपास..

यहीं हूं.. आसपास.. मुझे भी ख़बर है शहर की इन आवाज़ों में कहीं नज़दीक ही अपना स्‍वत्‍व है.. ओह, सब कितना अकूत सुंदर है.. सपनीला.. नहीं, लेकिन कहां है?..




लंगड़ाये पैरों से उचकता तीन कदम पीछे आकर देखता हूं.. इन फुसफुसाहटों के बीच अपना सुर कहां है.. है?.. है तो फिर पकड़ में क्‍यों नहीं आता? सामने उनींदे सुरों में घूमता रहता है फिर नज़र क्‍यों नहीं आता?..


6 comments:

  1. मधुर संगीत के लिए आभार।

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  2. डूब लिए आसपास.

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  3. apna sur kahan hai????hai to pard mein q nahin aata...achee lines hain..lakin afsoos audio nahin sun paya

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  4. द‍इया रे, हमको तो कुछ बुझ‍इबे नहीं किया... थोड़ी मदद कीजिए ना। ई का है?

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  5. @सिद्धार्थ प्‍यारे, वही है जो पढ़े, सुने. उससे ज़्यादा अगर कुछ है तो हमारी भी पकड़ में कहां आ रहा है?

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  6. ऊपर वाली क्लिपिंग सुनकर लगा जैसे किसी तेज लहर में बैठ गए हो

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