Thursday, August 14, 2008

आज़ादी- एक नव इंटरप्रिटेशन..

आपकी किस्‍मत फूटी होगी जभी आप कल के दिन भारतीय तिरंगा नहीं लहरायेंगे. किस्‍मत फूटी होगी तब भी ज़्यादा संभावना है लहराने से बाज नहीं आयेंगे. देशप्रेम होता ही ऐसा प्रेम है. इस कदर अंधा होता है कि अंधे भी हकबकाकर पलक झपकाने लगते हैं. कहने का मतलब अनूठा प्रेम होता है और सुजाता, नंदिनी, मंजुश्री सबों के प्रेम को दबाकर, और साथ न चलनेवालों को अमूमन दहलाकर स्‍वयं को व्‍यक्‍त करता है. आज़ाद हुए मुल्‍क के सुघड़ नागरिक अपनी तबाहियों से उबरने के सम्‍यक उपायों की ठीक-ठीक प्राथमिक शिक्षा भले प्राप्‍त न कर पावें, राष्‍ट्रप्रेम की संपूर्ण प्राप्ति करते हैं. और सरकारी शिक्षण संस्‍थाओं में इस लक्ष्‍यप्राप्ति की समुचित व्‍यवस्‍था होती हो ऐसा नहीं, गैर-सरकारी स्‍कूल भी इतना देशप्रेम हंसते-खेलते बेच लेते हैं. लब्‍बोलुआब यह कि आठवीं में तीन वर्षों तक फेल होते रहनेवाला गड़ेरिया छात्र भी देशप्रेम का पाठ मज़े-मज़े में कंठस्‍थ करके स्‍कूल त्‍याग करता है. या स्‍कूल उसका त्‍याग कर देती है.

जैसे शाहरूख ख़ान हैं माइक हाथ में आते ही रटे हुए अंदाज़ में बोल देते हैं- ‘मुंबई इज़ ए ग्रेट‍ सिटी!’ या बबीबा बोलते-बोलते रह जाती हैं- ‘लाइफ़ इज़ सच अ बिच, ऑर बिग पिस ऑफ़, ऑर बोथ!’. जबकि सच्‍चायी शाहरूख भी जानते होते हैं कि फ्यूचर ग्रेट सिटी में नहीं, गल्‍फ के किसी महलनुमा मकान में गुज़ारना है, और सार्वजनिक रूप से ज़ाहिर कभी भले न किया हो, इसका बबीता को भी अंदाज़ रहता है ही कि रंधीर की जगह मेरे संग फेरे लिये होते तो ऐसी ग़ुमनामी का जीवन जी रही होती न दिल के गहरे से ऐसे दिलदार वाक्‍य फूटते होते! लेकिन लफड़ा यही है कि साठ साल की आज़ादी ने सार्वजनिक और निजी जीवन के हमें दोहरे मानदण्‍ड दे दिये हैं. या हमने ले लिये हैं. और फिर लिये रखा है. बहुत सारे भलमनई होंगे जो कल शाहरूख की चतुराई, या बबीता की भोलाई से टीवी पर एक ऊलजुलूल राष्‍ट्रीय संदेश सुनकर भावुक होने लगेंगे. ऊपर-ऊपर की आदमी की चमड़ी देखेंगे, अंदर-अंदर का सियारी-सार देखने से बच जायेंगे. स्‍वातंत्र्यसार की कड़वी समीक्षा में उतरनेवाले को ‘गद्दार-गद्दार!’ पुकारने के बालकिशनी उत्‍साह में पुलकित होने को मतवाले होने लगेंगे..

जबकि मुझे लगता है समय आ गया है हम इस आज़ादी की सही-सही समीक्षा करें. पुनर्परिभाषित करें इसके पहले कि अंबानी एंड अमर सिंह टाइप्‍स इस ग्‍लोरियस फर्टिलिटी को फर्टाइल इकॉनमिक यूटिलिटी में बदल डालकर हमसे कुशासितों को सम्‍पूर्ण निष्‍कासित कर डालें!

हमारे चिरचुहलबाज संगी मतिमंथर उपाध्‍याय ने देखिये ई-मेल में आज़ादी की क्‍या नवव्‍याख्‍या की है, ग़ौर फ़रमायें:

‘अ’ मतलब अमीरी. नव-अमीरी. साथ लगे आकार का मतलब हुआ अमीरी का आकार दिनों दिन बढ़ रहा है. ‘ज’ माने जहालत. नुक़्ता इसे ज़्यादा पोयेंटेडनेस से ज़ाहिर करता है. ज के साथ के आकार का भी पूर्ववत पहले वाला ही मतलब समझा जाये. माने राष्‍ट्रीय सवालों को वाजिब तरीके से समझ सकनेवाली समझ की जहालत का आकार महाविकरालावस्‍था को अग्रसर है. रही बात आखिर के ‘दी’ की. इसका मतलब क्‍या हुआ? इसका सीधा मतलब बड़ा स्‍पष्‍ट और प्रकट है. हमने आज़ादी ठीक से लिया भी नहीं कि वापस कर दी.

ठीक-ठीक किसको की, और कितनी मात्रा में की इसका सार-संग्रहण चालू आहे.

7 comments:

  1. bahut sahi likha aapne khaaskar dohre maandandon ki baat.badhai aapko bebak post ki

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  2. बालकिशनी उत्साह लिए हम भी कहेंगे...

    शाहरुख़ इज ग्रेट
    बबिता इज ग्रेट
    एंड सो इज मतिमंथर उपाध्याय

    इंडिया इज ग्रेट
    इंडियागेट इज ग्रेट
    एंड सो इज प्रणब मुखोपाध्याय

    शानिया इज ग्रेट
    शानिया मानिया इज ग्रेट
    एंड सो इज दुःख का अध्याय

    नव इंटरप्रिटेशन इज ग्रेट
    आर प्रीटेंशन इज ग्रेट
    एंड सो इज आर स्वाध्याय

    जय आज़ादी....

    देख लीजिये...जरा भी नहीं लजाये...खूब टिपियाये...-:)

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  3. सही कह रहे हैं आप, आजादी की 61वीं साल गिरह के मौके पर हमें सिर्फ आजादी ही नहीं बहुत सी चीजों के बारे में फिरसे सोचना होगा।

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  4. आपने बहुत सही लिखा है। हम लोग अतीत का गुणगान करते है पर वर्तमान को नहीं सुधारते। एक सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई।स्वतंत्रता दिवस की आपको बहुत-बहुत बधाई।

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  5. हमने आज़ादी ठीक से लिया भी नहीं कि वापस कर दी.

    --बालकिशनी नहीं -विकट व्याख्या कहलाई.

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  6. ''आपकी किस्‍मत फूटी होगी जभी आप कल के दिन भारतीय तिरंगा नहीं लहरायेंगे. किस्‍मत फूटी होगी तब भी ज़्यादा संभावना है लहराने से बाज नहीं आयेंगे.''
    यही सत्‍य है।
    रही बात आजादी की समीक्षा की तो वह तो आजादी के तुरंत बाद ही शुरू हो गयी थी, महात्‍मा गांधी के द्वारा भी। यह समीक्षा इतिहासविदों, साहित्‍यकारों व दूसरे लोगों द्वारा लगातार जारी है। लेकिन इसे पढ़ता-सुनता कौन है। जिनके लिए आजादी बोझ है, वे इसे पढ़-सुन सकते थे, लेकिन उन्‍हें इसी लिए तो काला अच्‍छर चिन्‍हने लायक बनाया ही नहीं गया।

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  7. " आज़ादी "-
    "सिर्फ एहसास है ये
    रुह से महसुस करो,
    आज़ादी को आज़ाद ही
    रहने दो,
    कोई नाम ना दो !
    वँदे मातरम !
    - लावण्या

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