Friday, August 15, 2008

फ़ि‍ल्‍म ओ फ़ि‍ल्‍म!..

जुसेप्‍पे ने मेरे सवाल को अनसर नहीं किया. उसने मेरी बात नहीं सुनी, या सुनी तो उसे जवाब के काबिल नहीं समझा. रैक पर बिखरे पुराने अगड़म-बगड़म के बीच उंगलियां फेरता जाने क्‍या ढूंढ़ता रहा. जुसेप्‍पे को जब कभी डिटैच्‍ड, गुमसुम, जाने किस भाव में इस तरह आत्‍मलीन देखता हूं तो मेरे भीतर अंतरंग एक दूसरा कोहराम उठ खड़ा होता है. इच्‍छा होती है उसके पीठ के पीछे ईज़ल सजाकर एक्रीलिक से अंतर्लोक की मीठी उदासियों के गहरे भूरे, घनेरे लैंडस्‍केप उकेरता चलूं.. बड़े शीट पर रंगों का कुछ ऐसा जादू उतार डालूं कि जुसेप्‍पे की अस्थिर, अनमनस्‍क आंखें भी उसकी मिठास में भीग जायें!

- जुसेप्‍पे! जुसेप्‍पे!

हूं?- जुसेप्‍पे ने मेरी दिशा में उड़ती सी एक नज़र डाली, फिर रैक से अदूर गोपालकृष्‍णण पर एक पतला-सा मोनोग्राफ़ उठाकर पलटने लगा.

मैंने उसकी उदासी नज़रअंदाज़ करके कहा- कुछ पेंटिंग करें? तुम कुछ लसान्‍या बना लेना, या उल्‍टी-सीधी खिचड़ी ही सही, मैं पेंटिंग करता हूं, क्‍या कहते हो?..

जुसेप्‍पे चुप रहा, कुछ पलों बाद इंकार में सिर हिलाया, फिर मोनोग्राफ़ पर आंख गड़ाये-गड़ाये मुझे इत्तिला दी- तुम कभी फ़ि‍ल्‍मेमेकर नहीं बनोगे. तुममें वह मैडनैस नहीं है. छोटे-छोटे स्‍केचेज़ उकेरकर तुम सुखी हो जाते हो. छोटे-छोटे ब्‍लॉक्‍स में धीमे-धीमे एक बीहड़ संसार बुनो, ऐसा पर्सिसटैंस तुममें नहीं है, व्‍हाई?..

मेरा सारा उत्‍साह काफ़ूर हो गया. मुंह में बिना शक्‍करवाली काली स्‍ट्रॉंग फिल्‍टर्ड कॉफ़ी की कड़वाहट उतर आयी- मुझे झगड़े के लिए प्रोवोक मत करो, जुसेप्‍पे. इट्स नॉट अबाउट आइडियाज़, फ़ि‍ल्‍ममेकिंग इज़ एन एक्‍सपेंसिव मीडियम एंड यू नो व्‍हाट मनी आई हैव ऑर डोंट..

मेरी बात के खत्‍म होने के पहले ही जुसेप्‍पे ने असहमति में सिर हिलाना शुरू कर दिया. मानो ऐसे तर्कों को उसने पहले भी दसियों मर्तबे सुना हो और बहुत पहले उन्‍हें गंभीरता से लेना बंद कर चुका हो. बुदबुदाहटों में कहता रहा- मनी इज़ नेवर ए प्रॉबलम. नॉट फ़ॉर यूअर क्‍लास ऑफ़ पीपल. दिक़्क़त दूसरी है. आंतरिक है. कमज़ोरी की, कायरता की. इनिशियेटिव लेने से सकुचाते रहने की. घबराते रहने की. उससे यही होगा कि दिमाग में फ़ि‍ल्‍में बनेंगी, बनती रहेंगी; छोटी, बड़ी, किसिम-किसिम की, वास्‍तविक जीवन में उनकी मेकिंग नहीं होगी!

मैं चिढ़कर कमरे से बाहर निकल आया. कातर मन एकदम खट्टा हो गया. इच्‍छा हुई पलटकर जुसेप्‍पे को दो तमाचे लगाऊं.. या जाकर दीवार पर सिर मार लूं..

अच्‍छा तमाशा है फ़ि‍ल्‍ममेकिंग! क्‍या करना है मुझे फ़ि‍ल्‍मों का.. न खुलकर सामने आता है.. और नहीं आता तो न आये, फिर पूरी तरह गायब ही क्‍यों नहीं हो जाता? और ऊपर से दोस्‍ती ऐसी कि आपकी अंतरंग पपड़ाये तक़लीफ़ पर तेजाब उड़ेले! अच्‍छा हुआ मैंने रात का ख़्वाब जुसेप्‍पे से कहा नहीं था.. वर्ना बैठे-बिठाये वह भी प्रहसन-प्रसंग बनता! ओह, दिमाग़ में उन इमेज़फ्रेम्‍स को घुमाते हुए कैसा तो अनूठा आनंद हुआ था.

काले स्‍क्रीन पर सफ़ेद टाइटल्‍स के बाद के घुप्‍प अंधेरे में एक लड़की के उदास चेहरे का बड़ा क्‍लोज़अप. या एक बच्‍चे की भटकी हुई आंखें. और नेक्‍स्‍ट कट- स्‍ट्रेट जंप इन टू द हार्ट ऑफ़ हिस्‍टरी. न नर्व, नोडल पॉयंट ऑफ़ अवर टाईम, अवर मिज़री.. समथिंग लाइक दैट.. इन इमेज़ेस के जक्‍स्‍टापॉज़ि‍शन से कैसी तो अभूतपूर्व खुशी हुई थी, उसके आगे फ़ि‍ल्‍म में क्‍या-क्‍या होता उसे सोचने का सब आनंद अभी छूटा पड़ा था मगर जुसेप्‍पे ने ऑनेस्‍ट कंटेप्‍लेशन के चक्‍कर में सब गोबर कर दिया!..

(जारी)

8 comments:

  1. अमा, एक कहानी आधी छोड़कर दूसरी शुरु कर दी? ये अच्छी बात नहीं है। हम कन्फ़ूज़िया जाएंगे। मैं तो अबरार और मंजरी और बिल्ली की किश्तें पढ़ने को बेताब था। खैर… ये भी अच्छी बनती दिख रही है।

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  2. आजाद है भारत,
    आजादी के पर्व की शुभकामनाएँ।
    पर आजाद नहीं
    जन भारत के,
    फिर से छेड़ें, संग्राम एक
    जन-जन की आजादी लाएँ।

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  3. स्वतंत्रता दिवस की बहुत बधाई एवं शुभकामनाऐं.

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  4. आज़ादी का मंत्र जप रहे ब्लॉगर भाई।
    मेरी भी रख लें श्रीमन् उपहार बधाई॥
    बाकी आपकी दिमागी यात्रायों में साथ चलना आसान नहीं है। मन्जरी को कहाँ झोड़ आए?

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  5. मैं चिढ़कर कमरे से बाहर निकल आया. कातर मन एकदम खट्टा हो गया. इच्‍छा हुई पलटकर जुसेप्‍पे को दो तमाचे लगाऊं.. या जाकर दीवार पर सिर मार लूं..
    न , न! अच्छे ब्लागर हिंसा नहीं करते प्रमोद जी।

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  6. काले स्‍क्रीन पर सफ़ेद टाइटल्‍स के बाद के घुप्‍प अंधेरे में एक लड़की के उदास चेहरे का बड़ा क्‍लोज़अप, क्या खूब लिखा है। पढ़कर अच्छा लगा, लगा कि फिल्म की स्क्रीप्ट पढ़ रहा हूं।

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  7. बरबाद बुद्धिजीवी, कुछ ऐसा लिखो कि निम्म मध्यवर्ग का चाय में बिस्कुट डुबा कर खाने वाला. मसाला फांकने वाला. फिल्मस डिवीजन की प्रचार फिल्मों किवां लंगड़ी धोबिनिया से सिनेमा का परिचय पाने वाला हिंदी ब्लागर भी कुछ प्राप्त कर सके।

    वैसे इस पोस्ट के लिए- हाय गजब कहीं तारा टूटा।

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  8. बरबाद बुद्धिजीवी,

    यह तो पराठे में लिपटी आइसक्रीम है.
    कुछ ऐसा लिखिए कि चाय में बिस्कुट डुबो कर खाने वाला, मसाला फांकने वाला, लंगड़ी धोबिनियां या नदिया के पार से सिनेमा से परिचित होने वाला ब्लागर या पाठक भी कुछ आप से पा सके। जिन रचनात्मक पागलपन का तस्करा है वह उस संकोची, छद्म उजबक में भरपूर है बस भाषा चाहिए जो उसे समझ में आ जाए। वह अंतरलोक जानता है एक्रेलिक नहीं जो उसके भीतर काफी मात्रा में जनम से मौजूद है।
    यह बस बिनमांगीसलाह है जो कायदसेदेनीनहींचाहिए थी। बाकी अपना-अपना पंद्रह अगस्त तो है ही।
    वैसे इस पोस्ट के लिए सादर- हाय गजब कहीं तारा टूटा।

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