Wednesday, August 20, 2008

हरे हरे घाव हरे!..

जो बंधुवर नियम से अदबदाकर मेरे ब्‍लॉग चले आया करते हैं, फिर भले घबराकर सत्‍तावन सेकेंड बाद चले भी जाया करते हैं, मैं उन सभी उदारमना (या मनी?) व उजबकधनियों से क्षमाप्रार्थी हूं. क्‍योंकि विगत चंद दिनों की सच्‍चायी रही है कि मैं स्‍वयं अदबदाकर, घबराकर, या गोड़ सहेज-संभालकर भी अपने ब्‍लॉग तक नहीं आ सका हूं. दरअसल सच्‍चायी यह है कि खाने के लिए, या खानों की जुगत भिड़ाने के लिए कहीं जाने से अलग मैं कभी भी नहीं जा सका हूं. घुटने में दो कौड़ी की एक चोट क्‍या लग गयी उसको जतन से संभालते-संभालते फ्लोरेंस नाइटिंगिल हो रहा हूं. अभी पूरी तरह से नहीं हुआ हूं, नहीं तो स्‍वाभाविक था इन पंक्तियों को बीच में रोककर आपके लिए ‘नाइटिंगिल, नाइटिंगिल लिटिल स्‍टार!’ का नर्सभरी गीत गाने लगता. आप उजबकधनी न होते तब भी सत्‍तावन सेकेंड से पहले ही कहीं जाने लगते. या खदबदाने. कुछ मुंह बिराने लगते. उनके लिए कहनेवाले दिलदार कह गये हैं खिसियानी बिलार खंभा नोचे. मैं गोड़ पर सेवलॉन मिला रुई बोरता, और फिर सहेज-सहेजकर घुटने पर यूं पट्टी चढ़ाता मानो बंबई के इस बरसाइल उमगते मौसम में नहीं सुलगते कश्‍मीर की खाजखायी देह पर चढ़ा रहा हूं! ओह, व्‍हाट ए पट्टी टाईम!

मगर पट्टि‍यों की दुलराहट, व इस बेमतलब अकुलाहट को दरकिनार करके कहें तो पूछनेवाली बात है कि आदमी घुटने न तुड़वाकर भी अंतत: कहीं पहुंचता है? कहां पहुंचता है? पहुंचता होगा हज़ार-लाख वर्षों में, एक अदद तुरईभर जीवन में पड़ोस की जनाना या लोकल थाना के अंतरंग दीवाने-खास तक भी पहुंच जाये, ससुर, मदमाकर मोहम्‍मद रफ़ी होने लगता है, बकिया मुकेशवाला बालकिशनी गाते रहते हैं, पहुंचते कहां हैं? इदर वे- विथ टूटा हुआ घुटना ऑर विदाऊट. लाइफ़ हैज सच स्‍ट्रेंज पैथोज़. ऑर पैथेटिक पैटर्न्‍स. उनके पीछे हम संभल-संभलकर चलते रहते हैं, या आंखें मूंदे. नतीजा कुलजमा वही होता है पहुंचते कहीं नहीं हैं. या पहुंचकर अदबदाहट में मोहम्‍मद रफ़ी वाला गाने भी लगें, जल्‍दी ही मुकेशवाले- ‘दुनिया बनानेवाले क्‍या तूने दुनिया बनायी..’ पर लौट पर ही आते हैं.

दूधनाथ सिंह की एक किताब का शीर्षक है- ‘आ, लौट आ ओ धार!’. शीर्षक गलत होगा तो दूधनाथ के पुराने छात्र-प्रियवर बोधिसत्‍व करेक्‍ट करेंगे (नहीं होगा तो भी करेक्‍ट कर सकते हैं). इन दिनों अलसाये, उनींदेपने में अचकचाकर लगता है शीर्षक मेरे आंतरिक प्रार्थनाओं की ही कुहरीली गुहार है, छिपा हुआ आत्‍मावलोकन का प्रोवोकेटिव पैम्‍फलैट है. मैं कन्‍फ्रंट करने की जगह घुटने की पट्टी करता फ्लोरेंस नाइटिंगिलपने में संतत्‍व प्राप्‍त कर रहा हूं. जबकि कश्‍मीर के साथ-साथ मेरी आत्‍मा जल रही ही है. लेकिन अपनी छुद्र चिंताओं में दहला हुआ मैं पता नहीं उचित मात्रा में उबल क्‍यों नहीं रहा. दो कौड़ि‍या फिलॉसफ़ाई में स्‍वयं को सिंपलीफाई, फिर सहजता से जस्टिफाइ किये जा रहा हूं? बहल रहा हूं. उगलने की जगह सिर्फ़-सिर्फ़ निगल रहा हूं. एक अदद घुटने के पीछे ब्‍लॉग क्‍या मैं समूचा गिरा हुआ हूं?

शायद कहनेवाले समझदार इसी को कहते हैं ठहरे हुए समय का सुर. या बेसुरा संगीत. कहनेवालों ने नहीं भी कहा तो घबराकर मैं कह दे रहा हूं!

9 comments:

  1. तुरंत चले आईये , नये घुटनो की खेप आई हुई है , इससे पहले की लोग घुटना दो प्याजा ,या घुटना मुसल्लम बना कर खा जाये . जितने मर्जी उतने घूतने बदलवाये.

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  2. गुरुवर आज आप कुछ दूसरे मूड में लगते है......

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  3. गुरुदेव, हम तो यही कहेंगे- जेके पांव न फटे बिवाई, उ का जाने पीर पराई :)

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  4. घुटना जल्दी ठीक हो। लिखना फ़िर शुरू हो। लिखा समझ आए या न आए सत्तावन सैकेंड तो देने ही हैं।
    घुघूती बासूती

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  5. हम एक मिनट तक यहाँ रह कर दुआ करके जा रहे है कि आप

    का घुटना जल्दी ठीक हो...वैसे आपके घुटने का दर्द किसी ओर के के दर्द की याद दिला रहा है...

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  6. घुटना बोल गया-धत्त्!! अब क्या!! अजदकी की जगह उजबकी?? :)

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  7. आपकी पोस्ट पढ़कर मेरे मन में जो कुहराम कलैया मार रहा था, घुघूती जी ने उसे सहज शब्दों में कह दिया...। क्या लिखते हैं गुरुजी? थोड़ा हम मन्थर बुद्धि वालों का भी खयाल कीजिए... हमें तो अपने हाज़में पर शुबहा होने लगता है। अब गुरू को गरिष्ट कह-कह कर कब तक अपने मन को मनातें रहें। ...लेकिन इस बात से थोड़ा कन्फुजिया जाते हैं कि दूसरे रेस्तराँ ऐसी विकट स्थिति पैदा नहीं होने देते।

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  8. इलाहाबादी इस किताब का नाम रखे थे...लौटाओ उधार...
    लेकिन सही
    शीर्षक है लौट आ ओ धार

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  9. पोस्ट पढ़ चुके थे। घुटने की चोट अब ठीक हो गयी होगी। जल्दी
    दौड़ने लायक बनें यही शुभकामनायें हैं।

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