Friday, August 22, 2008

अबरार और मंजरी: पांच

ऐसा नहीं है कि रूहानी, गहरे इश्किया असमंजस व चोटों का मंजरी को पहली मर्तबा अनुभव हुआ था, और मेरी मार्फ़त हो रहा था. मेरी मार्फ़त अन्‍नोयेंस भले जेनरेट हो रहा हो मगर वजह मैं इश्किया इंतिहा होऊं इसका इस खाक़सार ने कभी यकीन नहीं किया. जहां तक मंजरी की बात है तो वह बहुत पहले आशा भोंसले का ‘चैन से हमको कभी आपने जीने ना दिया..’ अपनी आंखों में गा और जी चुकी थी..

मेरी जानकारी में अनंत नाम के जिस पहले शख़्स को वह सीरियसली चाहती रही थी, वह कुछ अर्से बाद उससे भी ज़्यादा सीरियसनेस से किसी दूसरी लड़की के पीछे परीशां और उदास-उदास रहने लगा था. इस हक़ीक़त से रूबरू होते ही पहले तो मंजरी सन्‍न रह गयी थी, शायद पहली दफ़े देख रही थी कि मीठे तजुर्बों का कोई ऐसा कड़वा एंगल भी हो सकता है, फिर सरेऑफ़ि‍स अपने सांवरिया बालम की वह ऐसी की तैसी की और इतनी की थी कि वह भलामानस अनंत अपनी नौकरी व ठिकाना बदलने को मजबूर हो गया था. उस वक़्त भी मंजरी सन्‍न ही रही थी, और अपनी सन्‍नता से बाहर न आने व खुद को नये हालातों के मद्देनज़र बदल न पाने की मजबूरी में फिर लंबी छुट्टी लेकर घर बैठ गयी थी..

कोई मिलने पहुंचता (नावेद, खोसला और ताप्‍ती पहुंचते थे, बाकी किसमें इतना हिम्‍मत और हौसला था) तो वह दरवाज़ा नहीं खोलती. कभी एहसान करके खोल ही देती तो महज़ इसे जगज़ाहिर करने के लिए कि देखो, ऐ ज़मानेवालो, मैं किस कदर ज़ार-ज़ार रोती रही हूं, इतने और उतने दिनों से मुंह में अन्‍न का एक निवाला नहीं डाला है!

इस लंबी गैरहाज़ि‍री को आड़ बनाकर सक्‍सेना, मंगेश, तपासे सब लड़की को बाहर करवाने की जुगत में लगे रहे (बेचारे तपासे को मंजी ने आजतक माफ़ नहीं किया है, इतने वर्षों बाद वह अब भी उससे बात करने से इंकार करती है, और इकलौता एक वाक्‍य जो कभी तपासे की सुन सकने के हद में इस्‍तेमाल करती भी है तो वह तपासे और कोयले के रंग में कितनी समानता है की बाबत होता है!), अलबत्‍ता नैयर साहब की दयानतदारी और मंजरी के भीतरी पुराने सॉलिड जोड़तोड़ का करम था कि उसकी लंबी गैरहाज़ि‍री उसकी नौकरी छिनने का सबब नहीं बनी..

एनीवेज़, तो इस तरह मंजी दीदी की ‘आह, अनंत!’ की यह कहानी कुछ लंबी खिंची. लड़की की छुट्टि‍यों के दिन खिंचते चले. एक दिन ताज़ा-ताज़ा डेटॉल से हाथ धोकर मैं बाथरुम से ‘जंगल में मोर नाचा किसने देखा..’ गुनगुनाता, चहकता बाहर चला आ रहा होऊंगा कि मंजी आपा अपनी मेज़ के गिर्द मुस्‍कराती दिखीं. चपल चुहल से सारे दिन सबका हाल-चाल लेती रहीं. और लोगों के आगे-पीछे मैंने भी सलाम बजाने की रवायत पूरी की. अनंत संज्ञा का एक मर्तबा ज़ि‍क्र तक नहीं आया. न लवाने की किसी दूसरे की किसी कोशिश की आपा ने सूरत निकलने दी. दिन बीता. उसके पीछे फिर और-और दिन बीते. बीच-बीच में नावेद फ़ाइलों को दुरुस्‍त करता बेग़म अख़्तर को गुनगुनाता ‘इश्‍क तेरे अंज़ाम पे रोना आया..’, और उसके इस गुनगुनाने पर किसी ने सर्द सांसें भले भरी हों, किसी ने उसे गालियों से नहीं नवाजा. गालियों की गोली मेरे हिस्‍से आनी थी!

एक दिन गलियारे में सिगरेट की राख झाड़ता जाने बाहर ऐसा क्‍या खुशनुमा देखकर मैं रफ़ी साहब की आवाज़ में बहक रहा था ‘बहारें फिर भी आयेंगी..’ कि अचानक पांच हाथ की दूरी पर जनाना आवाज़ में गालियों का बरसना शुरू हुआ. बाद को ख़बर हुई मेरे बहारों के फिर भी आने के फ़लसफ़े पर मंजी आपा को सख़्त एतराज़ था. इस बाबत सोचकर पहले मुझे ताज़्ज़ुब हुआ फिर नहीं भी हुआ. सीधी बात थी मंजी दीदी मेरे गाने का कैसा भी इंटरप्रिटेशन करतीं, वह जायज़ होता. इससे ज़रा आगे की एक और सच्‍चायी यह भी थी कि दीदी और मेरे बीच कभी बनी नहीं. मुझे वह निहायत बहारहीन व्‍यक्ति समझतीं. उससे ज़्यादा मुझे सोचने के काबिल समझा तो आवारा और असामाजिक समझतीं. रही मेरी बात तो मैं बहुत सीधे-सीधे अपनी और उनकी दुनिया के फ़ासले और फर्कों को समझता, और उस लिहाज़ से संभालकर चलता था. तभी उन दिनों सीन में मेरे पुराने अहमदाबदिया आर्टिस्‍ट दोस्‍त रंजीत देसाई की एंट्री हुई..

शहर में उसकी पेंटिंग की एक्जिबिशन लगी तो भावुकता के उत्‍साह में मैंने दफ़्तर में भी कुछ लोगों को ओपनिंग के इनविटेशन लेटर दिये. मंजरी को ख़बर करूं ऐसा ख़्याल भी नहीं आया था, मगर ओपनिंग के दौरान नावेद को इंट्रोड्यूस करने की खातिर मैं रंजीत को लेकर उसके पास पहुंचा तो देखता हूं मंजरी मैडम उसके पीछे खड़ी हैं और हमारी तरफ़ देखकर मुस्‍करा रही हैं. तीन दिन बाद देर रात फ़ोन पर रंजीत से बात करते हुए ख़बर हुई कि वह होटेल से सामान हटवाकर किसी हसीना के यहां टिका हुआ है, और हसीना कोई और नहीं अपनी मंजरी मैडम हैं! मैं शायद सीरियसली डिसओरियेंट हुआ होऊंगा जभी हिंदुस्‍तानी में 'इश्‍क तेरे अंजाम पे रोना आया' की जगह स्‍पानी गुनगुनाने लगा होऊंगा. या गुनगुना कोई पुराने बुर्ज़ूग रहे होंगे, मैं फकत आंखें फाड़े सुन रहा होऊंगा..



(जारी)

5 comments:

  1. achha likha hai. badhayi sweekaren

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  2. ये स्पेनिश तो कतई समझ में नहीं आई लेकिन आप के लिखे को मैं दो या तीन बार पढ़ने के बाद ही पूरी तरह से समझ पाता हूं।

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  3. मँजरी दीदी तो वाकई कमाल हैँ !
    - लावण्या

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  4. बहुत दिन बाद आराम से बिना हड़बड़ाये आपका लिखा पढ़ा, अच्छा लगा।

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