Saturday, August 23, 2008

हसरतें..

होने को किसी टीवी सीरियल का टाइटल हो सकता था, फ़ि‍लहाल हमारी इच्‍छाओं का है. इच्‍छाओं से ज़्यादा कहिये इच्‍छाओं के गिल्‍टी प्‍लेज़र्स. हालांकि गिल्‍टी प्‍लेज़र्स में लोग छुप-छुपके प्‍लीज़ होते हैं, मुझे छिपने की बहुत वजह नहीं दिख रही. या हो सकता है मुंह, व मुंह से जुड़े देह के अन्‍य हिस्‍सों को, छिपा पाने के पर्याप्‍त जगहाभाव को मैं वजहाभाव में छुपा रहा होऊं? वैसे अपनी सारी चिरकुटइयां छिपा जाऊं, साथ ही सार्वजनिक तौर पर मलंग, ट्रांसपरेंट छवि भी बनी रहे, एक हसरत तो ससुर यही है, लेकिन ये जेनेटिक है, मेरे निज की ऑथेंटिक नहीं है. पोस्‍ट उस ऑथेंटिक संसार, हसरती मलांबार का स्‍केच उकेरने को लिख रहा हूं..

पहली हसरत तो यही है कि मैं लात चलाऊं, लोगों के सिर पर थूक दूं और वे बुरा न मानें. अपनी गलती या चिरकुटई से बुरा मान भी लें तो पलटकर मुझे गाली न दें. गाली दें भी तो उन चंद पलों के लिए उनके मुंह में पिल्‍लू व मेरे कान में सहज बहिरपना उभर आये. पारुल घबराकर इधर-उधर सबको सफ़ाई देती फिरने लगे कि हमने खुली क्‍या बंद आवाज़ में भी नहीं गाया था, जाने अज़दकजी बहिरपना की बीमारी कहां से उठा लाये! नर्स बेजी छिनककर बोले मैं भी बिहार में रही हूं तो हमको पट्टी मत पढ़ाओ, पारुल कुमारी. इतने दिनों से देख रही हूं गा-गाकर अज़दक का जीवन हलकान की हो (मैं कठपु‍तलियां बना-बनाके नहीं की हूं), बीच ट्रैफिक में खड़े होकर भी हमारे मन का वेवलेंग्‍थ कैच कर लेते थे, अच्‍छा-खासा कान हुआ करता था पता नहीं क्‍या राग गा दी हो कि हमारे हाथ से निकल गया है..

नर्स और गवाइन में जमके चिकचिक होती, मैं छत पर लौंकी के बचके चुभलाता, तेज़पत्‍ते की चाय की चुस्कियों में मुंह बनाता, बाल‍सुलभ को अपनी कवितायें डिक्‍टेट कराता, या दूसरों की ऐसी की तैसी कराता, मज़े में गोड़ डोलाता चहक रहा होता; पड़ोस के छत पर स्‍वर्णलता घोषाल अपने खुले केश काढ़ती उदास उलाहना देती कि लोडशेडिंग में वैसे भी दिन कहां कट पाते थे, तुम्‍हारे विरह में तो मैं ही रोज़ कटी-कटी जा रही हूं, दिन नहीं कट पा रहे, आमार मोनेर शामी? मैं फुदककर उफनता कि चुप कर, चोट्टी! अपने बाल देखी है? और मेरा रूप? तेरी हिम्‍मत कैसे हुई खुले में इस तरह मुझे प्रोपोज़ करने की? स्‍वर्णलता घोषाल इस पर बिलखती, मुझे गालियां देती, जोकि मुझे सुनाई नहीं पड़ता, मासी मां के पास भागी-भागी मेरी शिकायत लेकर जाती. जबकि मासी मां सर्द आह भरकर कहतीं शोब कोसूर तोहादेर, शोर्णलोता, वह तो लाखों में एक है, बेटी! इस तरह मेरे हसरतों को पंख मिलते. या मैं उन्‍हें पंखा झलता.

चिढ़कर मेरे बच्‍चों का ट्यूशन करने आयी सुजाता से शिकायत करता कि यही सब सिखाया है तुमने लड़कियों को कि हर कोई हमें खुल्‍लमखुल्‍ला प्रोपोज़ करता रहता है? सुजाता अपने दर्दीले सिर, या विचारों पर हाथ फेरती थकी आवाज़ में कहती मैं तुम्‍हारे बच्‍चों व तुम्‍हारी पतनशीलता दोनों से थक गयी हूं, प्‍लीज़ मेरे तीन महीनों का हिसाब करो, मैं आईंदा इस छत पर फिर पैर रखना नहीं चाहती! मैं एकदम से फैलकर उठ खड़ा होता- तो ये बात है छम्‍मक छल्‍लो? सारा संबंध पैसों का था, सारा प्रेम.. ? पता नहीं कहां से उड़कर (अरुणाचल से?) प्रत्‍यक्षा पहुंच जाती और सुजाता को पीछे खींचते हुए कहती अरे, ऐसे गंदे आदमी से मुंह लगाकर कोई फ़ायदा नहीं, सुजी, मैंने पार्क में पानी के लिए एक सौ पचहत्‍तर दिये हैं, तेरे तीन महीनों की मेहनत का नहीं दे सकती? तू हट यहां से..

मैं सन्‍न होकर सोचता आजतक हमारी खातिर एक हवाई चप्‍पल तक नहीं खरीदा इसने और ज़रा बात करने का इसका तरीका देखो? और उसी सन्‍नावस्‍था में बालसुलभ को हतप्रभ देखता रहता कि इसी और ऐसियों से न मिल पाने के ग़म का तुम, ससुर, पोस्‍टर छाप रहे थे, शर्म आनी चाहिये तुम्‍हें!

नहीं आती. बालसुलभ को शर्म क्‍या कुछ भी नहीं आता. मुझपर दीवानापन चढ़ता रहता. अरमान परवान चढ़ते रहते. हसरतें उड़ती रहतीं.

आप सुलगते रहते. मैं चमकता रहता.

11 comments:

  1. ई सब पढ कर हमारा फर्ज बनता कि कहें -- हजारों ख्वाहिसें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले ! बहुत निकले मेरे अरमान लिकिन फिर भी कम निकले ...वगैरह वगैरह,..

    ReplyDelete
  2. सही है गुरुवर.......

    ReplyDelete
  3. बढ़िया है !
    हाँ टीवी सीरियल का का नाम होता तो क.. हसरतें होता :-)

    ReplyDelete
  4. खुदा करे, यूं ही परवान चढ़ती रहें आपकी हसरतें।
    और हम मुंह बिसुरते इन्हें पूरा होते देखते रहें....

    ReplyDelete
  5. क्या कहूँ सर जी?! आप तो बड़ी जबरदस्त जलेबी छानते हैं। वह भी ऐसी कि काटने पर जरूरी नहीं कि मीठी ही लगे।... अलबत्ता इस बात की गारण्टी है कि मुँह का स्वाद बदल जरूर जाएगा।

    तभी तो बिना नागा यहाँ आने का प्रयास जरूर करता हूँ। जमाए रहिए।

    ReplyDelete
  6. आपकी पीड़ायें पढ़कर मन उदास सा हो गया। क्या लिखते हैं।

    ReplyDelete
  7. ha ha ha..ek to aap halkaan bahut jaldi hotey hain...

    ReplyDelete
  8. यह पतनशीलता के हाथ में जो कल्पनाशीलता की डोर थमाई है...हसरतों की लैग्थ कुछ ज्यादा नहीं है...?!!!

    ReplyDelete
  9. अरे , महाराज ई का का लिख दीन्ह हो , अबी पढा ।दो दिन ब्लॉगिंग से दूर क्या गयी ... अरे रे रे,कैसन इच्छाएँ हैं ...

    ReplyDelete

  10. दिनांक 17/03/2013 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    -----------
    अनाम रिश्ता....हलचल का रविवारीय विशेषांक...रचनाकार-कैलाश शर्मा जी

    ReplyDelete