Sunday, August 24, 2008

कितना नहीं लजाइये? खाली थेथरई में गाल बजाइये?..

अल्‍लसुबह से लाऊडस्‍पीकरों पर ‘आला रे!’, ‘ग्‍वाला रे!’ के बम फूट रहे हैं. पीछे-पीछे कान्‍हा के पुण्‍य प्रसूत कीचड़ और कमरबल के शहादती बाने में मटकियां फोड़ रहे हैं. या साढ़े चवालीस फीट की ऊंचाई पर मटकियों तक पहुंचने से पहले ही, कर्तव्‍यविमूढ़ता की एक ख़ास प्रौढ़ता के असर में अदबदाकर लड़खड़ा जा रहे हैं. मटकियां फूटने से रह जा रही हैं, आसपास के छतों, मुंड़ेरों पर विराजे दर्शकजनों का जुगुप्‍सापीड़ि‍त बालसुलभ मन टूट जा रहा हैं, या चंद अभागों का बालसुलभ मटकानुमा सिर. फूट रहा है. मैंने कल ही फोड़ लिया था. कायदे की मटकी नहीं थी, मेरे पापसुलभ हसरतों की छोटी भड़ुकी थी; छोटी ही रही होगी जभी शायदा ने टिप्‍पणी की थी बस?- मगर भड़ुकी में दही नहीं, मेरे पापमयी मन का फटा दूध था और शर्तिया वही था, जभी शुकुल पंडिजी ने इशारा किया कि ससुर, क्‍या लिखते हैं (मतलब अंडबंड क्‍यों लिखते हैं कि ऐसी मातमी उदासी फैल जाये?)..

शायदा के तंज की मैं ठीक-ठीक कितनी थाह पा सका नहीं कह सकता, लेकिन शुकुलजी की उदासी समझ आयी वाजिब है. किसी पर लात चला लेने के अरमान, किसी पर थूक सकने की इच्‍छाओं के गौरवगान की पतनशील, या कैसी भी शील-शॉलविहीन, ठुमरी-ठप्‍पा कुछ भी क्‍यों होनी चाहिये? लोग लाड़ में ज़रा सा गोद में चढ़ा लेते हैं इसका मतलब हम सब-कहीं गीलाई फैलाना शुरू करें? हक़ बनता है? किसने दिया है?.. पड़ोस के दोस्‍त तक से मिलना आज के दिन दुश्‍वार बना रहता हो, तब वर्चुअली जो हम पर गाहे-बगाहे आकर स्‍नेह का लोटा ढुलका जाते हैं, उनपर हमारा अपना फटा दूध उड़ेलना ज़ायज है? कहां तक है? इतना बालसुलभ मैं भी नहीं कि नहीं जानता नहीं है, मगर जैसाकि घुघूतीजी बासुतीजी बीच-बीच में नियम से हमें याद दिलाती रहती हैं कि हमारा लिखा आकर पढ़ भले जाती हों, समझ नहीं पातीं, हम भी उन्‍हें याद कराना चाहते हैं कि बीच-बीच में अकबकाकर, घबराकर मटकी फोड़नेवाले ही अपने सिर का मटका नहीं फोड़ते, हमें भी अपना फुट अपने मुंह में डाल लेने की बीमारी है, और पतितावस्‍था के दर्शन सिर्फ़ बाहर की दिशा में देख-देखकर ही नहीं होता रहता, अपनी दिशा में देखते हुए भी बहुत बार सिर नवाकर पता नहीं कहां छुपा लेने की छटपटाहट होने लगती है. सिंक से लेकर बाथरुम और सिरहाने के तकिये सब कहीं फटे दूध और फटे दही की महक छूटने लगती है और देर तक छूटती रहती है, हम घबराकर चिंतित होते रहते हैं कि रचना ने हमें गिन-गिनकर गालियां क्‍यों नहीं दी. या सुजी ने चप्‍पल फेंककर मारा क्‍यों नहीं. या बेजी ने तमककर कहा क्‍यों नहीं कि इसी तरह से तुम्‍हारे पैर, बाल और उसके बाद खाल खींचूं तो? आईंदा मेरी कठपुतलियों की तरफ मत आना, नालायक, क्‍योंकि आओगे तो मेरे ब्‍लॉग पर काला कपड़ा गिरा मिलेगा!

बेजी कहेगी तो गलत नहीं कहेगी. क्‍योंकि गुस्‍सा पारुल को नहीं आया समय की इतनी दूरी पर सोचकर मुझे आ रहा है. मटकियों को फोड़ने का तो समय निकल गया मगर सोचता हूं सिर पर काला कपड़ा चढ़ाकर दीवार पर सिर फोड़ने का शायद अभी बचा हुआ है. भीतरी झल्‍लाहट पर शायद उससे कुछ रहमी छींटें पड़ें! पड़ेंगे? तीन-तीन बच्‍चों की मां हुई लड़कियां मुझ निर्बुद्धि के छंटाक भर के सेंस ऑफ़ ह्यूमर पर क्‍या बच्‍चादार हंसी हसेंगी. याकि मैं ही बुर्जू़गवार रोऊंगा?

17 comments:

  1. आप कित्ती फ़ोडे ? किस किस की मटकी फ़ोडे लिस्टवा दीजीयेगा, हो सके तो चंदा भी , भाइ अब मटकी खरीद कर वापिस भी करना प्डेगा ना :)

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  2. मन का क्या है ?
    ...सारा आकाश कम है !
    आप वाकई,
    बहुत अच्छा लिखते हैँ
    - लावण्या

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  3. ओह...तंज़ तो हरगिज़ नहीं था सर।

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  4. Postva 'left alligned' rakhiye ,anyatha Mozila walon ko ko akshar chhitraya hua dikhta rahega.Saprem.

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  5. "तीन-तीन बच्‍चों की मां हुई लड़कियां"
    भाई कमाल है! अभी तक आप उन्हें लड़कियां ही कह रहे हैं... और एक हम है जो लड़कियों को भी आंटी कह देते हैं !

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  6. @अफलू भैया, मैं तो मोत्‍ज़ि‍ला में ही लिखता-देखता हूं, मुझे तो छितराया नहीं दिखता.. लेफ़्ट अलाइन्‍ड से अपनी फॉरमैटिंग का तो बाजा बज जायेगा?

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  7. हमारा राग अलग ही चलेगा....

    प्रमोद सिंह , राऊरकेला, उडीसा की पैदाइश... बाद में छोटे-बडे अलग-अलग शहरों में राजनीतिक, सांस्‍कृतिक लड़कपने के खेल... पिछले दस वर्षों से बंबई में पटखनी खाये पडे हैं.
    हमें कब तक झांसे देते रहेंगे।
    बाट तकत....
    अजित

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  8. @बड़े नरवर साहेब,

    यही तो चक्‍कर है, अजीत प्रताप सिंह, स्‍वयं फंसे हुए आदमी के बारे में आपको लगता है फांसा और झांसा दे रहा है! कितना ले रहा है यह सोचकर सहानुभूति नहीं होती? या सिहरानुभूति?

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  9. तीन-तीन बच्‍चों की मां हुई लड़कियां मुझ निर्बुद्धि के छंटाक भर के सेंस ऑफ़ ह्यूमर पर क्‍या बच्‍चादार हंसी हसेंगी. याकि मैं ही बुर्जू़गवार रोऊंगा? तो क्या तय हुआ फ़ाइनली?

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  10. इत्ती बात पर इत्ता कन्टम्प्लेशन....गुरुवर आपके ही बस का है...

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  11. यहाँ पर बैठके लिखते तो शायद कहते ""तीन-तीन पोते पोतियों की मां हुई लड़कियां"

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  12. दस लोगों ने पसंद किया देखकर आये थे लेकिन सब सिर से हव्वा हो गया। अब पता होता कौन कौन पसंद किये हैं तो उनसे ही जाकर मतलबवा पूछते।

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  13. @तरुण,
    तुम पता नहीं क्‍यों किससे जाकर क्‍या पूछते, क्‍योंकि कुछ तो लोग कहते ही, क्‍योंकि किशोर कुमार ने भी इतना पहले कहा ही था कि लोगों का काम है कहना; मगर मैं तुमसे ज़रूर पूछता कि अरे, ओह, तुमने पसंद नहीं किया, कैसे किया, क्‍यों किया एटसेट्रा.

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  14. हा हा हा बहुत सुन्दर लिखा है। आज सचमुच यही दशा है समाज की। बधाई स्वीकारें।

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  15. चप्पल वैसे ही घिसी हुई है , आप पर फेंक कर अपना नुकसान करना है क्या। व्हाई शुड आई वेस्ट माई चप्पल ऑन यू....
    वैसे कुछ ख्वाहिशें हमारी भी हैं...अगली पोस्ट चढाती हूँ उसी पर !

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  16. @suji, hum par buldozar mat chadhana, hamara dimaag waise hi chadha hua hai..

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  17. आप तो बड़े गुरू टाइप आदमीं हैं जी! ....अच्छा, याद आया...आपको तो कई लोग ‘गुरुदेव’ कहते भी हैं। लेकिन आप माताओं में भी लड़की की ही प्रधानता देखते हैं, यह क़ाबिले ग़ौर है।

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