Wednesday, August 27, 2008

अन्‍यतम के अनंतर..

अनामदास हमारे मित्र हैं. अन्‍यतम अंतरंग हैं (कहने का मतलब हमारे जीवन में जो तम है, और जिस-जिससे है, उसमें वह नहीं हैं, अन्‍य हैं. दूसरे, हमारे अंत का क्‍या रंग होगा इसकी उन्‍हें ख़बर है, और वैसा अंत किसी तरह से अपने जीवन के समीप न आने दें, उनके व्‍यक्तित्‍व में यह समझदार दुनियादारी है, और इसके लिए वह सराहना के पात्र हैं). अपने नौकरीदाताओं की रंगदारी का सजग समझदारी से टैकलिंग करने का जिम्‍मा अपने कांधे लिये रहना शायद वजह है कि इन दिनों वह अपने ब्‍लॉग पर बहुत लिख नहीं पा रहे. बीच-बीच में लिखते हैं तो भावुकता का पुराना बेना झलते दीखते हैं. जैसे फिर उन्‍होंने ‘हाथी पादो, आया भादो का कादो!’ लिख मारा है. क़ायदन होना चाहिये था मैं भादो की बड़ी-बड़ी बूंदों की सोचकर भावुक हो उठता, मगर हो नहीं पा रहा हूं. हो सकता है अन्‍यतम अंतरंगता आड़े आ रही हो. पहचान के एक जल-इंजीनियर लड़के ने पटना पहुंचकर आसपास बाढ़ की तबाही के कुछ लौमहर्षक वृतांत भेजे हैं. दिल्‍ली के एक अन्‍य सांस्‍कृतिक पत्रकार मित्र ने चार दिन पहले पटना से जल-भराव, व मन के हीनभाव की कुछ वैसी ही अप्रीतिकर रिर्पोट प्रेषित की थी (कि कालीदास रंगालय में नाट्यमंचन चल रहा था, दर्शकदीर्घा के सीटों की अगली पांच पांते जलमग्‍न थीं, नाटक के साथ-साथ पैरेलली मोटर से जल बहरियाने, व सक्रिय अभि‍नेताओं के ठीक बाजू में किसी छोटे बच्‍चे का पानी में दह गये अपने चप्‍पल-खोजन का मंचन भी चल रहा था!).

बिहार की बाढ़ का पता नहीं राष्‍ट्रीय अख़बार कैसा कवरेज़ कर रहे हैं. पटना से इंजीनियर बच्‍चे ने बताया मृतकों की सरकारी गिनती पचहत्‍तर से डेढ़ सौ के बीच घूम रही है, जबकि कहनेवाले दो हज़ार लोगों की मौत कह रहे हैं. पटना की सड़कों पर रिक्‍शे में टहलते हुए दिल्‍ली के पत्रकार मित्र की टिप्‍पणी थी कि जिधर देखो, गंदगी का अंबार नज़र आता है, लगता था मानो लोगों ने सबकुछ देख-देखकर बर्दाश्‍त करते रहने का आंखों को अभ्‍यस्‍त कर लिया है. यहां-वहां कुछ लोग होंगे जो नितिश कुमार की इस और उस कसरत की गुण-व्‍याख्‍या कर रहे थे, बकिया के ज़्यादों ने जैसे भविष्‍य के बारे में किसी तरह के आशावाद को निरर्थक मानकर जीवन जीते रहने की घुट्टी पी रखी हो.

मैं अनामदास की भावुकता को कनखियों से देखकर उंगलियों से तौल नहीं रहा. उन चंद लोगों में एक वह भी हैं जिनका लिखा पढ़ना मुझे अच्‍छा लगता हैं. मगर यह भी सच्‍चायी है कि हाथी के पादों व बड़ी-बड़ी बूंदों वाले भादो की रससिक्‍तता में बहकर भी मैं भावुक नहीं हो पा रहा. झुंझलाइल और गुस्‍साइल फ़ील कर रहा हूं. बिहार में, उड़ीसा में, पड़ोस के बांग्‍लादेश में ज़रा सा पानी क्‍या नहीं बरसता, तड़ातड़ तबाहियों का चार्टलिस्‍ट तैयार होने लगता है. सभ्‍यता जम्‍बोस्‍पीड से दन्‍न् से पांच सौ वर्षों पीछे चली जाती है. एक अदद जीवन हाथ से तिल-तिल छीन रहे व्‍यक्ति का मन यह जान ही जाये तब्‍बो कहां से प्रमुदित होगा कि देश में तरक़्क़ी हो रही है, छिहत्‍तर शहरों में कॉलसेंटर खुले हुए हैं, पीछे-पीछे सपना मॉलसेंटरों का है. बाढ़-वध का पता नहीं कहां सेंटर है.

जलहारे, बाढ़-बुहारे बिहार में एक बेचारे हाथी की पदाई भी कैसी कड़वायी हो गयी है! अंतरंगता अपने साथ कभी-कभी कैसे बीहड़ तक़लीफ़ लेकर आती है..

(ऊपर की तस्‍वीर बाढ़ग्रस्‍त बांग्‍लादेश की है, बीबीसी के सौजन्‍य से)

4 comments:

  1. ''देश में तरक़्क़ी हो रही है, छिहत्‍तर शहरों में कॉलसेंटर खुले हुए हैं, पीछे-पीछे सपना मॉलसेंटरों का है. बाढ़-वध का पता नहीं कहां सेंटर है.''

    कॉलसेंटरों में 'राजकाज की अंग्रेजी महारानी' की चलती है, जलहारे बाढ-बुहारे लोगों की जीवन-नैया 'राजकाज की हिन्‍दी नौकरानी' के सहारे कटती है। इस स्थिति में बाढ़-वध संबंधी संवादहीनता तो रहेगी ही।

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  2. आजकल शहर में रहता हूं . तो संबंध खाली टूंटी के पानी से बचा है या फिर बीच-बीच में होने वाली वर्षा के गोड़-डुबाऊ जल-जमाव से.

    क्या करूं ? आपकी तकलीफ़ में शामिल होऊं ?

    कि बाढ के संबंध में आम आदमी की जिजीविषा को रेखांकित करती किसी मूर्धन्य कवि की कविता का रूमान ठेल कर ज्ञानीधर्म निभा दूं ?

    नहीं ! इस आवर्ती आपदा के संबंध में सरकारी उदासीनता और आपदा-प्रबंधन के पिछले सरकारी प्रयासों की पृष्ठभूमि में आपकी मनःस्थिति समझ सकता हूं .

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  3. vidambana hi hai ki bihar ke liye baadh jeevan ka hissa ban gaya hai.nhar saal hota hai par phir agle saal... wahi !

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  4. नदी को नही कुछ लेना-देना इस गूढ़ साहित्य से। उसे रोकना है नामुमकिन। उसे एक रास्ता देना होगा। अपनी बस्ती को बचाने के लिए बाँध बनाना होगा उसके किनारों पर, न कि उसके रास्ते में।

    सुना है कोषी नदी तोड़ती है हर साल अपना बाँध जो उसके रास्ते में है। किनारों पर नहीं। यह इन्जीनियरिंग की विफलता है। शासकों का घटियापन भी।

    आपकी पोस्ट फिर भी अन्यतम है...

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