Thursday, August 28, 2008

मौसमी बुखारी बयारों के बीच हाईकू..

नज़रे-इनायत हमीं पर हुई है सोचकर हीरोइन की साड़ी खींचने के बाद हीरो से कुचवाये मदन पुरी और प्रेम चोपड़ा की तरह इतरा रहा था, फिर ख़बर हुई कि आसपास और लोग भी हैं, ज़्यादा खांस-खखार रहे हैं, नाक सुड़ककर, या फिर तीन हाथ की दूरी पर नाक फटककर, बेदम हुए जा रहे हैं.. फिर फ़ाईल खोल ले रहे हैं, या फिर, मेरी तरह प्रतिभाशाली हुए तो, मन ही मन हाईकू दोहरा रहे हैं. ज़ाहिर है जो नहीं हैं वे कैसी भी हाई पाने की बजाय सिर्फ़ दर्द में दोहरे हो रहे हैं..

नाक सुड़कते हुए, या खांस-खांसकर दायें-बायें गिरते हुए एक सच से जो साक्षात हुआ वह यह है कि हाईकू लिखने के लिए आपको अज्ञेय की तरह ‘कितनी नावों में कितनी बार’ की यात्रायें नहीं करनी पड़ती, न लक्ष्‍मीधर मालवीय की तरह जापान में जाकर रहने की ज़रूरत होती है. नाक सुड़कते रहने की बेदमावस्‍था में भी आप हाई का क्‍यू और क्‍ल्‍यू पा सकते हैं. हां, शर्त सिर्फ़ इतनी सी है कि आप मेरी तरह प्रतिभाशाली हों!..

तो हाई काय कू की भूमिका-टूमिका के बाद नीचे अब असल माल संभालिये-
तुमसे मिलकर मैं कहां पहुंचा हूं. इतने वर्षों तैरती रहीं रहगुज़र में, घर पहुंची हो? कि अकुलाहट डोलता, सकुचाया पहुंचेगा किनारा तब भी यही दीखेगा कि चोट खायी डोंगी के साथ डर पहुंचा है?

सब जानते हैं, मालूम है बहुत ठेलम-ठेल हुर्रम रेलम-पेल, फिर भी शीश झुकाये, हाथ सटाये विनम्र प्रार्थना करता हूं हे रेल, इन्‍हीं जानी-पहचानी आततायी, सुहानी मनबवंडर छटाओं के बीच देती रह कहीं आगे ठेल, मन में बना रहे कौतुक, सतरंगी बहिरंग से होता रहे हेल-मेल, मन के अंतोनियन जेल से बाहर देखते रहें जीवन के हीरे, हारे-हत्‍यारे खेल!

चिरई रानी गोदी में सुला ले, बबुनी मेमना अपनी आंखों का झक्‍क् अंजोर पिला दे. बाबूजी हंसकर फ़ोन कर दें और प्रियंका चोपड़ा हमारे उधार पटा दे.

आपने हंसकर कहा आप हमारी तक़लीफ़ समझते हैं. हमने रो-रोकर जाना आप सचमुच समझदार हैं!

3 comments:

  1. कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना है
    सोहर के ढोलक पे प्यानो का गाना है
    अरे ओ मूढधनी दो कौड़ी का यही तेरा खज़ाना है ?

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  2. बढ़िया हायकू ठेले हैं। लेकिन ये हायकू क्यों आज!

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  3. क्या बात है !

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